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पर्यावरण दिवस, ईंधन बचाने की बातें और निजी कारों का ऐसा तमाम-जाम, दिलचस्प है न?

निकेश जैन, इन्दौर, मध्य प्रदेश

मैं बेंगलुरू में जहाँ रहता हूँ, वहाँ अपने घर के सामने रोज इस तरह का नजारा देखता हूँ। देख-देखकर सोचता रहता हूँ कि हम पेट्रोल-डीजल आखिर कैसे बचाएँगे इस तरह, जब कम्पनियाँ हर दिन अपने कर्मचारियों को दफ्तर बुला रही हैं? तस्वीर में यह जो तमाम-जाम दिख रहा है, ये सब ऑरेकल (अमेरिकी कम्पनी) के दफ्तर से आने वाले वाले लोग हैं। वह दफ्तर मेरे घर से करीब 400 मीटर की दूरी पर है। ये सब गाड़ियाँ आगे जाकर बाहरी रिंग रोड (ओआरआर) पर मिल जाने वाली हैं। वहाँ और भी बुरा हाल होता है। सभी वाहन एक-दूसरे इतने चिपक कर चलते हैं, कि जरा सी चूक हुई नहीं कि उनका आपस में टकराना, भिड़ना तय मानिए। 

ओआरआर में यातायात के ऐसे हाल-बेहाल क्यों हैं? क्योंकि यहाँ से करीब एक लाख कर्मचारी (निजी कम्पनियों के) रोज अपने दफ्तर आते-जाते हैं। खतरनाक है न? अब जरा कुछ आँकड़ों पर गौर कीजिए। भारत हर साल पेट्रोल-डीजल के आयात पर करीब 80 अरब डॉलर (76.35 खरब रुपए लगभग) खर्च करता है। और इस ईंधन का इस्तेमाल कहाँ-कैसे होता है? लगभग 25 अरब डॉलर (23.85 खरब रुपए) का ईंधन निजी वाहनों में और करीब 55 अरब डॉलर (52.49 खरब रुपए लगभग) का व्यावसायिक वाहनों में उपयोग किया जाता है। 

इसके अलावा, आज चूँकि पाँच जून को पर्यावरण दिवस है, तो इस लिहाज से एक और जानकारी जोड़ देता हूँ। यह कि भारत में लगभग 25-30 प्रतिशत वायु प्रदूषण वाहनों से निकलने वाले धुएँ से होता है, जो हमारे पर्यावरण की स्थिति को खराब कर रहा है। भारत दुनिया का पाँचवाँ सबसे बड़ा कार-निर्माता है। एक अनुमान के अनुसार देश में वर्ष 2030 तक कारों की बिक्री मौजूदा 35 लाख सालाना से बढ़कर लगभग 1.50 करोड़ हो जाएगी। जाहिर तौर पर इससे वाहनों से निकल कर हवा में फैलने वाले जहरीले धुएँ में वृद्धि ही होगी।

अब सोचिए, हम सरकार को हर बात के लिए दोष देते रहते हैं। मगर क्या अपने हिस्से का कोई योगदान दे रहे हैं, हालात को सँभालने में? सामान्य सी समझ की बात है कि अगर हम स्वेच्छा से निजी कारों का इस्तेमाल कम कर दें तो एक साथ दो मोर्चों पर अपना योगदान दे सकते हैं। पहला- ईंधन की बचत में और दूसरा- पर्यावरण संरक्षण में। लेकिन अफसोस कि ऐसा हो नहीं पा रहा! बस बातें हो रही हैं। दिलचस्प है न?

जबकि बहुत आसानी से यह काम किया जा सकता है। मैंने खुद और अपनी कम्पनी पर यह तरीका लागू किया हुआ है। हम न तो रोज दफ्तर जाते हैं और न अपने कर्मचारियों को इसके लिए मजबूर करते हैं। यह बात मैं अपने पिछले लेखों में बता चुका हूँ। दूसरी कम्पनियाँ भी यही तरीका अपना सकती हैं। सप्ताह में तीन दिन कर्मचारियों को बारी-बारी से दफ्तर बुलाएँ, और बाकी दिनों में उन्हें उनके घर से काम करने की अनुमति दी जाए। इससे कर्मचारियों को ही नहीं, देश की अर्थव्यवस्था, हमारे पर्यावरण को भी राहत की साँस मिलेगी। 

मगर दुख की बात है कि भारत में संचालित बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के दफ्तर में शीर्ष पर बैठे लोगों के पास निर्णय लेने का कोई अधिकार नहीं है। वे छोटे-छोटे निर्णयों के लिए भी अमेरिका या अन्य देश में स्थित कम्पनी के मुख्यालय पर निर्भर हैं। वहाँ की अनुमति के बिना वे कोई बड़ा बदलाव लागू नहीं कर सकते। 

मोदी जी, हम क्या करें, घर से काम करने की आपकी सलाह मानने के लिए भी हम अमेरिका पर निर्भर हैं! हैं न?

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निकेश का मूल लेख

I see this scene daily right in front of my house in Bangalore….

How are we going to save petrol and diesel if companies are calling employees to office everyday!

This traffic is coming from Oracle office (which is 400M away) and trying to join ORR.

You will find bumper to bumper traffic on ORR as well because this area brings around one lakh employees daily to office!! Crazy!

India spends around $80B on petrol and diesel import every year. This includes around $25B on private vehicles and around $55B on commercial (which includes office buses/shuttle as well).

We can keep blaming government for everything but are we doing our part?

The solution is no brainer to me – implement hybrid work – 3 days in office will also bring so much respite to your employees and it will help economy.

But unfortunately our GCC leaders have no decision making power so unless their US HQ permits them they can’t implement such big change….

Modiji, on this WFH decision also unfortunately we are dependent on US 🙂

Thoughts? 

—-

(निकेश जैन, मूल रूप से इंदौर के रहने वाले हैं। व्यावसायिक सुविधा के लिहाज से बेंगलुरू में भी उनका निवास है। वह सूचना-तकनीक क्षेत्र की कंपनी- एड्यूरिगो टेक्नोलॉजी के सह-संस्थापक हैं। उनकी अनुमति से उनका यह लेख अपेक्षित संशोधनों और भाषायी बदलावों के साथ #अपनीडिजिटलडायरी पर लिया गया है। मूल रूप से अंग्रेजी में उन्होंने इसे लिंक्डइन पर लिखा है।)

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निकेश के पिछले 10 लेख

84 – गैरत बची हो तो अमेरिका से भारत लौट आओ भाई, यहाँ कोई तुम्हें फुटबॉल नहीं बनाएगा!
83 – हम ईंधन बचाते हैं और अपना समय भी, क्योंकि हमें अमेरिकी महँगाई भारत नहीं लानी!
82 – पुणे और बेंगलुरू के यातायात के लिए आज अगर कोई उम्मीद है, तो वह मेट्रो!
81 – दूसरे देशों में गए भारतीय पेशेवर भारत लौटे भी, तो क्या सच में कोई लाभ होगा?
80 – वो भी क्या दिन थे, ये भी क्या दिन हैं, …क्योंकि वक्त हमेशा बदलता है!
79 – सोचिए, अगर दो-ढाई करोड़ युवा सड़कों पर बेरोजगार घूमते रहते, तो क्या होता!
78 – बिना इंजन वाला भारतीय जहाज ‘कौण्डिन्य’ मस्कट पहुँच गया, तो इससे क्या हासिल हुआ?
77 – इन्दौर : आपने हमें विफल कर दिया, साफ शहर में गन्दे पानी से मौतें, शर्मनाक!
76 – इण्डिगो संकट : क्या भारत सरकार अब वन्दे भारत ट्रेनों की संख्या बढ़ाने के बारे में सोचेगी?
75 – कुछ बड़ा करने के लिए सबसे जरूरी है खुद पर भरोसा, ऋग्वेद के उदाहरण से समझें

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