सांकेतिक तस्वीर
नीलेश द्विवेदी, भोपाल मध्य प्रदेश
गोस्वामी श्री नाभादास जी के हाथों जब ‘श्री भक्तमाल’ प्रकट हुआ, जब उन्होंने पहली बार इसे लिखा, तो इसका नाम उन्होंने ‘भक्तदाम’ रखा था। यह बात श्रृंखला की पिछली कड़ी में बताई जा चुकी है। तो अब यहाँ जिज्ञासा हो सकती है कि उन्हें इस ग्रंथ को लिखने की प्रेरणा कैसे हुई? इसके उत्तर में एक रोचक कहानी बताई जाती है। गीता प्रेस द्वारा प्रकाशित ‘श्री भक्तमाल’ ग्रंथ और इसी तरह के सभी ग्रंथों में यह कहानी समान रूप से कही गई है।
कहते हैं, एक बार श्री नाभादास जी अपने गुरु जी श्री अग्रदास जी की सेवा लगे हुए थे। श्री अग्रदास जी ध्यान में थे। ध्यान की स्थिति में वह भगवान श्री सीताराम जी की मानसी-सेवा कर रहे थे। पूजा-उपासना कर रहे थे और श्री नाभादास जी उनके पास खड़े होकर हाथ के पंखे से उन्हें हवा कर रहे थे। अभी यह क्रम चल रहा था कि श्री नाभादास जी ने देखा कि गुरु जी का ध्यान किसी कारण से बार-बार भंग हो रहा है। उनके चेहरे पर थोड़ी बेचैनी दिखाई दे रही है। इसका कारण क्या है, इस बारे में वह सीधे गुरु जी से कुछ पूछ नहीं सकते थे। सेवा की अपनी मर्यादा होती है। इसलिए, श्री नाभादास जी ने वहीं खड़े-खड़े ध्यान लगाया और यह जानने की कोशिश की कि आखिर गुरु जी के ध्यान-भंग का कारण क्या है? अपनी ध्यान-साधना से उन्होंने थोड़ी ही देर में कारण का पता लगा लिया और तुरंत उसका निदान भी कर दिया।
दरअसल, हुआ यूँ था कि श्री अग्रदास जी महाराज के एक अन्य शिष्य और श्री नाभादास जी के गुरु-भाई पानी के जहाज से दूर देश की यात्रा पर गए थे। बीच समुद्र में उनका जहाज भँवर में फँस गया था, और वह अपनी रक्षा के लिए गुरु जी को याद कर रहे थे। उनकी उस स्थिति का भान गुरु जी को तुरंत ही हो गया, इस कारण वह बेचैन हो रहे थे कि कैसे अपने शिष्य की जान बचाएँ? किस तरह मदद करें? इसी से उनके ध्यान में बाधा पड़ रही थी। तब श्री नाभादास जी ने अपने तप-बल से उन गुरु-भाई की मदद की और जिस पंखे से वह गुरु जी की सेवा कर रहे थे, उसी की हवा से उन्होंने अपने गुरु-भाई के उस जहाज को एक झटके से बाहर निकाल दिया, जो समुद्री भँवर में फँसा था। यह सब इतनी तेजी से हुआ कि गुरु जी को भी सहसा अनुभव नहीं हो पाया। समस्या टल जाने पर श्री नाभादास जी ने उन्हें बताया, “गुरु जी, वह जहाज फिर चल पड़ा है। अब आप निश्चिंतता से फिर श्री सीताराम जी की मानसी-सेवा में लग सकते हैं।”
इतना सुनते ही श्री अग्रदास जी महाराज ने आँखें खोल दीं और पूछा, “कौन बोला”? तब श्री नाभादास ने कहा, “महाराज वही आपका दास, जिसे आपने अपना प्रसाद दे-देकर पाला है।” श्री नाभादास की बात सुनकर श्री अग्रदास जी महाराज के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। वह मन ही मन सोचने लगे कि यह शिष्य तो कितनी ऊँची स्थिति में पहुँच चुका है? यह मेरे ध्यान, मेरी मानसी-सेवा के भीतर तक पहुँच गया और मेरे ध्यान-भंग का कारण जान लिया! इतना ही नहीं, यहीं बैठे-बैठे इसने दूर समुद्र में फँसे जहाज को भँवर से निकाल दिया और मेरे शिष्य के प्राण भी बचा लिए!! गुरु जी मन ही मन अपने शिष्य नाभादास की उस स्थिति से प्रसन्न हो रहे थे। वह समझ गए कि संतों की सेवा और उनके प्रसाद को पाने की ही यह महिमा है कि नाभादास इतनी उच्चतम स्थिति में पहुँच चुका है। उसी कारण इसे यह दिव्य दृष्टि, दिव्य शक्ति मिली है। यह कोई साधारण बात नहीं है। यह कोई सामान्य शिष्य भी नहीं है। जरूर श्री हरि प्रसन्न हैं इस पर।
बस फिर क्या था, उन्होंने श्री नाभादास जी की आगे की कार्य-भूमिका तय कर दी। उन्हें आज्ञा दी, “या भई तो पै साधु कृपा, उन्हीं को रूप-गुन, कहो हिए भाव को।” मतलब- यह जो कुछ भी तुम कर पाए हो बेटा, वह साधु-संतों की कृपा और उनके प्रसाद के बल पर कर सके हो। इसलिए अब तुम उन्हीं साधु-संतों के, भगवान के भक्तों के रूप, गुण और मन के भावों का वर्णन करो। गुरु जी की ऐसी आज्ञा हो गई। इसे श्री नाभादास को पूरा करना ही था। लेकिन करें कैसे? यह उनके मन में दुविधा थी। सो उन्होंने हाथ जोड़कर गुरु जी से ही पूछ लिया, “प्रभु, भगवान के चरित्र, उनकी लीलाएँ, उनके चरित्र तो मैंने पढ़-सुन रखे हैं। इसलिए उन्हें तो मैं फिर भी गा सकता हूँ। परंतु भगवान के भक्तों के चरित्र और उनकी लीलाओं का तो ओर-छोर पाना ही बड़ा कठिन है। भला मैं उनके रहस्यों को कैसे समझ सकता हूँ?”
तब श्री अग्रदास जी ने प्रेम से नाभादास जी को समझाया। वह बोले, “जिन्होंने तुम्हे मेरी मानसी-सेवा में प्रवेश कराया। जिन्होंने तुम्हें समुद्र में जहाज दिखाया। जिन्होंने तुम्हारे माध्यम से यहीं से हाथ के पंखे की हवा से समुद्र में फँसे जहाज को आगे बढ़ा दिया, भँवर से निकाल दिया। वही भगवान तुम्हारे मन में बैठकर तुम्हें अपने भक्तों के रहस्यों को खोलकर दिखाएँगे।” काफी समय बाद जब श्री प्रियादास जी ने श्री भक्तमाल की टीका लिखी, तो उसमें उन्होंने इस प्रसंग को कुछ इस तरह लिखा, “कही समुझाइ, वोई ह्रदय आइ कहैं सब, जिन ने दिखाय दई सागर में नाव को।” तो इस तरह गुरु जी ने श्री नाभादास जी की दुविधा दूर कर दी और उन्हें सिर्फ आज्ञा ही नहीं, प्रोत्साहन दिया और प्रेरणा भी कि भगवान के भक्तों के चरित्र प्रकट करो।
इस तरह, श्री नाभादास जी ने गुरु जी की आज्ञा मानकर भक्तमाल ग्रंथ को लिखना शुरू कर दिया। उन्होंने अपने मूल ग्रंथ के चौथे दोहे में लिखा भी है, “श्री गुरु अग्रदेव आग्या दई, भक्तन को जस गाउ। भवसागर से तरन को नाहिन और उपाउ।।” अर्थात्- श्री अग्रदेव जी ने मुझे आज्ञा दी है कि भक्तों के चरित्र का वर्णन करो, उनका यशोगान करो। क्योंकि इस संसार सागर से पार जाने का कोई और उपाय नहीं है। कोई अन्य रास्ता नहीं है। यहाँ ध्यान दिला दें कि श्री अग्रदास जी को ही अग्रदेव भी कहा जाता था। तो, इस तरह ‘श्री भक्तमाल’ प्रकट हुआ।
अभी के लिए बस इतना ही… अगली कड़ी में हम श्री नाभादास जी का जीवन-परिचय देखेंगे और यह भी जानेंगे कि उन्हें हनुमान-वंश का क्यों माना जाता है?
श्री राधाकृष्णार्पणम् अस्तु…, श्री राधाकृष्णाभ्याम् नम:। श्री राधा-कृष्ण को समर्पित। श्री राधा-कृष्ण को प्रणाम।
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नोट : यह श्रृंखला गीता प्रेस की आधिकारिक पुस्तक ‘श्री भक्तमाल’ में उल्लिखित कथा-प्रसंगों पर आधारित है। इसके प्रकाशन-प्रसारण के पीछे हमारा उद्देश्य सिर्फ इतना है कि गीता प्रेस के ऐसे उच्च स्तर के ऐतिहासिक, पौराणिक महत्त्व के ग्रंथ के प्रचार-प्रसार में #अपनीडिजिटलडायरी की ओर से थोड़ा योगदान हो सके। साथ ही #डायरी से जुड़े पाठकों को इसका लाभ हो। बहुत जल्द हम इसी श्रृंखला को #अपनीडिजिटलडायरी के यूट्यूब चैनल पर भी शुरू करने का इरादा रखते हैं।)
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श्रृंखला की पिछली कड़ियाँ
5 – ‘सरल भक्तमाल’-5…: तुलसीदास के ‘रामचरित मानस’ जैसा नाभादास का ‘भक्तमाल’
4 – ‘सरल भक्तमाल’-4…: असाधारण ग्रंथ, जिसकी कहानियाँ भगवान भी मन लगाकर सुनते हैं!
3 – ‘सरल भक्तमाल’-3…ठाकुर जी ने ‘अप्रत्यक्ष प्रोत्साहन’ दिलाया श्रीराजेन्द्रदास जी महाराज से!
2 – ‘सरल भक्तमाल’-2…ठाकुर जी ने भक्तमाल की सेवा में मुझे कैसे लगाया?
1- सरल भक्तमाल’-1…आखिर इसकी जरूरत क्यों?
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