क्या हम भारतीयों को सार्वजनिक नियम-कायदे मानने की तमीज नहीं? अभी बहस तो यही है!

टीम डायरी

अभी एक-दो दिन से मीडिया-सोशल मीडिया में यह बहस चल रही है कि हम भारतीयों को सार्वजनिक नियम-कायदे मानने की तमीज नहीं है? जाने-माने कारोबारी हर्ष गोयनका ने इस बहस को हवा दी है। असल में, वियतनाम गए कुछ भारतीय नागरिकों का एक वीडियो सोशल मीडिया पर आया। उसमें विमान से नीचे उतरते ही ठीक उसके पास वे लोग समूह में गरबा करते दिखाई दे रहे हैं। इस पर हर्ष गोयनका ने टिप्पणी की और अपना एक पुराना अनुभव साझा किया। वह 2019 की उनकी स्विट्जरलैण्ड की यात्रा का अनुभव था।  

हर्ष गोयनका के मुताबिक, “यदि भारत को सच्ची वैश्विक महाशक्ति बनना है, तो उसके लिए भारतीयों को दूसरों के प्रति सम्मान और नियम-कायदे की समझ से जुड़ी अपनी आदतों की छाप दुनिया पर छोड़नी होगी। जापान ने अपनी शिष्टता और नागरिक भावना के कारण ही वैश्विक प्रशंसा अर्जित की है। ठीक उसी तरह भारतीयों की नागरिक भावना (सिविक सेंस) को भी गंभीरता से उन्नत करने की आवश्यकता है।” उन्होंने आगे लिखा, “आज, रेस्तरां में गरबा, हवाई अड्डों पर जोर-जोर से बातचीत और विमान के केबिनों को पिकनिक स्थल में बदलने के वीडियो लगातार सामने आ रहे हैं। दावोस में तो एक भारतीय व्यवसायी ने क्लब में इतना तेज पंजाबी संगीत बजाया कि पूरे शहर को सुनाई दिया होगा। फिर इसे ‘सॉफ्ट पावर‘ भी बताया, जबकि इससे सभी को परेशानी हुई।” 

इसके साथ ही गोयनका ने अपना अनुभव साझा किया, जो निश्चित रूप से यह बताने के लिए था कि दुनिया में भारतीयों की छवि किस तरह की बन चुकी है। उन्होंने बताया, “एक बार स्विट्जरलैण्ड के एक होटल में भारतीय मेहमानों के लिए ‘विशेष नियमों’ की एक सूची को मैंने खुद देखा और देखकर दंग रह गया था।” उन्होंने उस होटल के निर्देशों की सूची भी साझा की। उसमें लिखा था, “भारत से आए प्रिय अतिथियो, स्टाड के होटल आर्क-एन-सील में आपका स्वागत है। आप अपनी छुटि्टयों का अच्छे से आनंद ले सकें, इसके लिए हम आपसे आग्रह करते हैं कि आप कृपया निम्नलिखित नियम-निर्देशों को ध्यान में रखें

1 – नाश्ते की मेज पर सुबह 7.30 से 10.30 बजे तक सभी अतिथियों का स्वागत रहेगा। वहाँ आपको ताजा बने हुए सभी तरह के व्यंजन मिलेंगे। उन्हें स्थानीय लोगों ने ही उगाया है। कृपया, इनमें से कुछ भी अपने साथ लेकर न जाएँ। अगर आपको दोपहर के भोजन के लिए कुछ चाहिए, तो हमें बताइए, हम आपके लिए अलग बंदोबस्त करेंगे। उसका आपको अलग से भुगतान करना होगा। 

2 – नाश्ते की मेज पर जो तश्तरी, कटोरी, चम्मच, आदि रखी जाएँ, कृपया उनका ही उपयोग करें। दूसरे अतिथियों को भी नाश्ते का आनंद लेने दें। 

3 – हमारे रेस्त्रां में दोपहर और रात का भोजन उपलब्ध है। शाकाहारी व्यंजन भी बनाए जाते हैं। यदि आप अपने किसी साथी के साथ मिल-बाँटकर इन व्यंजनों का आनंद लेना चाहते हैं, तो याद रखिए दो या उससे अधिक लोग होने पर प्रतिव्यक्ति पाँच स्विस फ्रैंक (स्विट्जरलैण्ड की मुद्रा) के हिसाब से भुगतान करना होगा। पेय पदार्थ के लिए प्रतिव्यक्ति एक स्विस फ्रैंक का भुगतान लिया जाएगा। 

4 – इसके अतिरिक्त यह भी ध्यान रखिए कि इस होटल में दुनिया के दूसरे देशों से आए मेहमान भी हैं। वे शांति चाहते हैं। इसलिए हम आपसे आग्रह करते हैं कि कृपया गलियारों से आने-जाने या और छज्जों में खड़े होने के वक्त शांति बनाए रखें। तेज आवाज में बातचीत न करें। धन्यवाद! 

गोयनका की तरह ही भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईपीएस) के अफसर अरुण बोथरा ने भी सोशल मीडिया पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने लिखा, “जिन लोगों का बर्ताव विदेश में देश का नाम खराब करता है, उन्हें इसके कुछ नतीजे भुगतने ही चाहिए। गंभीर मामलों में, कुछ सालों के लिए ऐसे लोगों की विदेश यात्रा पर रोक लगाने पर भी विचार किया जा सकता है। भारतीय पासपोर्ट होना सिर्फ एक अधिकार नहीं है। इसके साथ यह जिम्मेदारी भी आती है कि हम जहाँ जाएँ, वहाँ के स्थानीय कानूनों का सम्मान करें, सार्वजनिक जगहों पर सही बर्ताव करें और देश की छवि की रक्षा करें।” 

वैसे भारतीयों द्वारा नियम-कानूनों-कायदों की कद्र न करने की बात चली है, तो इस क्रम में कर्नाटक उच्च न्यायायल की टिप्पणी भी गौर करने लायक है। इसी मई महीने में एक मामले की सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों ने मौखिक टिप्पणी में कहा, “अपराध करना इतना आसान हो गया है क्योंकि कानून की पकड़ ढीली पड़ चुकी है। हम अपराधियों से सख्ती से नहीं निपटते। अगर अपराधियों के हाथ या पैर काटने की सजा दी जाने लगे, तो शायद तब लोगों को कानून का पालन करने की एहमियत समझ आएगी। चूँकि हमारे यहाँ लोकतंत्र है, इसलिए हर कोई इसे हल्के में लेता है।” 

सोचिए, क्या हम इस स्थिति में पहुँच गए हैं कि हमसे नियम-कानूनों-कायदों का पालन कराने के लिए मुस्लिम देशों के जैसी सजाओं का प्रावधान करने की बातें होने लगें? हमारे व्यवहार के कारण दूसरे देश हमें नीची नजर से देखने लगें? अगर वाकई ऐसा है, तो यह गंभीर चिंता का विषय है। इस पर विचार होना चाहिए। इसका समाघान होना चाहिए।   

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Neelesh Dwivedi

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Neelesh Dwivedi

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