टीम डायरी
अभी दो साल पहले यानि 2024 में अगस्त के महीने में एक लेख प्रकाशित हुआ था। सनसनी नहीं थी, उसमें सरोकार था। जाहिर तौर पर इसीलिए उसे ‘बड़े कहे जाने वाले मीडिया समूहों’ ने अपने प्रकाशन मंचों पर बहुत जगह नहीं दी थी। हालाँकि वह लेख आज तक प्रासंगिक है, और दिनों-दिन अधिक होते जाने वाला है। वह लेख क्या था? देश के उन बुजुर्ग माता-पिताओं के बारे में, जिन्हें उन्हें नाशुक्र औलादें सड़कों पर या वृद्धाश्रमों में छोड़ देती हैं। उस लेख में कुछ सच्ची कहानियों के साथ बताया गया था कि माता-पिता को ईश्वर के समान मानने वाले देश भारत को कैसे पश्चिम की संस्कृति से प्रभावित बहुसंख्य लोगों का समूह ‘राष्ट्रीय शर्म’ की वजह बना रहा है।
‘राष्ट्रीय शर्म’, हाँ यही विशेष्ण दिया गया था लेख में। और यकीनन सही था, क्योंकि इस मसले से जुड़े आँकड़े भी इसी विशेषण का समर्थन करते हैं। गौर कीजिए, देश में करीब 15-20 लाख वृद्धजन इस वक्त वृद्धाश्रमों में रह रहे हैं। जबकि हालत यह है कि अगर आज ही साढ़े तीन से चार लाख वृद्धाश्रम नए बन जाएँ तो वे भी पूरे भर जाएँगे। यानि इतने सारे लोग तैयार बैठे हैं, अपने बुजुर्गों को घर से निकाल बाहर करने के लिए! यकीनी तौर पर ऐसा करने वाले कुछ लोगों की कोई मजबूरी होती होगी। लेकिन क्या सबकी? नहीं, बिल्कुल नहीं। बुजुर्ग माता-पिता को वृद्धाश्रमों में भेज देने वाले अधिकांश लोग वास्तव में कृतघ्न और गैरजिम्मेदार की श्रेणी में ही आते हैं।
लिहाजा, ऐसे लोगों के लिए तेलंगाना सरकार ने एक नया कानून बनाया है। इसमें इंतजाम किया है कि यदि कोई वृद्ध माता-पिता सरकारी प्राधिकारी (जिस-जिस को सरकार ने अधिकृत किया है) को लिखित में शिकायत देते हैं कि उनकी संतान उनका पालन ठीक से नहीं करती, तो सरकार दखल देगी। ऐसे कर्मचारियों, चाहे वे सरकारी हों या निजी क्षेत्र के, की तनख्वाह का 15 प्रतिशत हिस्सा या 10,000 रुपए (दोनों में जो कम हो) काटकर सीधे उसके माता-पिता के बैंक खाते में जमा करा देगी। इस बीच अगर बुजुर्ग माता या पिता का निधन होता है, तो मासिक कटौती वाली रकम जीवित अभिभावक के खाते में दी जाने लगेगी। साथ ही, स्वर्गवासी अभिभावक के खाते में अगर कोई रकम पहले वाली जमा है, तो वह भी उनके जीवित जीवनसंगी के बैंक खाते में भेज दी जाएगी। इस तरह, कर्मचारी का वेतन कटने की यह प्रक्रिया तभी रुकेगी, जब माता-पिता दोनों का स्वर्गवास हो चुका होगा।
तेलंगाना सरकार के इस कानून निश्चित रूप से स्वागत किया जाना चाहिए। लेकिन सवाल फिर भी शेष रहता है कि क्या ऐसे कानूनी उपायों से पश्चिम की संस्कृति के पीछे आँखें बंद करके चलने वाले लोगों की सोच बदलेगी? नहीं, यह नहीं हो पाएगा। अलबत्ता निश्चित रूप से बुजुर्गों के भविष्य, उनकी वृद्धावस्था के जीवन को वित्तीय सुरक्षा मिलेगी। मगर कानूनी उपाय सामाजिक सोच को नहीं ही बदल सकेंगे। सोच को बदलने के लिए हमें अपनी संस्कृति की जड़ों की ओर लौटना होगा। हमें मनुस्मृति जैसे ग्रन्थों के चिंतन को आत्मसात करना होगा, जिनमें कहा है-
उत्थानं वृद्धसेवा च वाक्यं च मधुरं हितम्।
तपो भवातिथ्यं च एतत् धर्मस्य लक्षणम् ॥
अर्थ : वृद्धों की सेवा करना, विनम्र और मधुर वाणी बोलना, तपस्या, अतिथियों का सत्कार करना- ये सब धर्म के रूप हैं।
इसके साथ यह भी –
अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम्॥
अर्थ : जो लोग वृद्धों की सेवा करते हैं और नित्य उनका अभिवादन (प्रणाम) करते हैं, उनकी चार चीजें बढ़ती हैं – आयु, विद्या, यश और बल।
