हिन्दी पत्रकारिता और पत्रकारों से जुड़े संयोग-दुर्योग की कहानी!

नीलेश द्विवेदी, भोपाल मध्य प्रदेश से; 31/5/2021

ये सिर्फ़ दो-तीन मिसालें ही हैं। लेकिन शुरुआत से अब तक हिन्दी पत्रकारिता और उसके पत्रकारों के साथ लगभग स्थायी भाव से जुड़े संयोग-दुर्याोगों की मुकम्मल कहानी कहती हैं। एक-एक कर इन्हें समझने-देखने की कोशिश करते हैं।

1. उदन्त मार्त्तण्ड, नारद जयन्ती और तथ्यों का घालमेल :

बिल्कुल, सब घालमेल ही है। हिन्दी पत्रकारिता की शुरुआत से अब तक। लगातार। तथ्य है कि हिन्दी पत्रकारिता की औपचारिक शुरुआत 30 मई 1826 से हुई। दिन मंगलवार। कानपुर, उत्तर प्रदेश के मूल निवासी पंडित जुगल किशोर सुकुल (शुक्ल) ने कोलकाता, बंगाल में इस दिन-तारीख़ से एक साप्ताहिक अख़बार शुरू किया। नाम था, ‘उदन्त मार्त्तण्ड’। यानी ‘उगता हुआ सूर्य’ अथवा बाल्यकाल का सूरज, जिसके अभी दाँत नहीं आए हैं। उदन्त है। बहरहाल, आगे चलकर जब इस तारीख़ को ‘हिन्दी पत्रकारिता दिवस’ के रूप में मनाया जाने लगा तो यह तथ्यात्मक रूप से सहज, स्वाभाविक ही था। 

लेकिन मामला गड्डमड्ड होने का आधार भी जाने-अनजाने यही अख़बार बन गया। तब जबकि बीते कुछ सालों से एक वर्ग-विशेष यह बताने लगा कि जुगल किशोर जी ने हिन्दी का पहला अख़बार निकालने के लिए ‘नारद जयन्ती’ की तिथि को चुना था। क्योंकि सनातन हिन्दु परम्परा में देवर्षि नारद को पहला समाचारवाहक माना जाता है। इस आधार पर यह दलील भी दी जाने लगी कि नारद जयन्ती की तिथि पर ‘हिन्दी पत्रकारिता दिवस’ मनाना चाहिए, न कि अंग्रेजी कैलेंडर की 30 मई की तारीख़ को। वर्तमान में हिन्दी पत्रकारिता के बड़े नामों में शुमार प्रोफेसर संजय द्विवेदी का नाम भी इस वर्ग से जुड़ता है।

संजय द्विवेदी विशुद्ध रूप से हिन्दी के पत्रकार हैं। यानि वे किसी अन्य भाषा से हिन्दी में नहीं आए हैं। उसी कानपुर क्षेत्र के हैं, जहाँ से जुगल किशोर जी ताल्लुक रखते थे। ख़ुद खूब पढ़ने-लिखने वाले भी माने जाते हैं। वर्तमान में पत्रकारिता की शिक्षा देने वाले देश के सबसे बड़े ‘भारतीय जनसंचार संस्थान’ (IIMC) के निदेशक हैं। भोपाल, मध्य प्रदेश के माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (संस्थान) के कार्यवाहक कुलपति रहे हैं। देश के कई नामी हिन्दी अख़बारों में सम्पादक भी रह चुके हैं। उन्होंने इसी 26 मई को ‘नारद जयन्ती’ पर एक लेख लिखा। कई अख़बारों, वेबपोर्टलों ने इसे प्रकाशित किया।

‘लोक मंगल के संचारकर्ता हैं नारद’ शीर्षक वाले इस लेख में संजय द्विवेदी लिखते हैं, “भारत के प्रथम हिन्दी समाचार-पत्र ‘उदन्त मार्त्तण्ड’ के प्रकाशन के लिए पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने देवर्षि नारद जयन्ती (30 मई, 1826/ ज्येष्ठ कृष्ण द्वितीया) की तिथि का ही चुनाव किया था।” इसमें यह तिथि गौर करने लायक है। ‘ज्येष्ठ कृष्ण द्वितीया’। गौर करने के कुछ कारण हैं। पहला- हिन्दु पौराणिक ग्रन्थों में देवर्षि नारद की जयन्ती ज्येष्ठ कृष्ण प्रतिपदा को मानी जाती है। यानि हिन्दी पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष का पहला दिन। जबकि द्वितीया दूसरी तिथि होती है। इस साल ज्येष्ठ कृष्ण प्रतिपदा 27 मई को पड़ी थी। अब दूसरा कारण- मान लिया कि जिस दिन ‘उदन्त मार्त्तण्ड’ पहली बार प्रकाशन के लिए गया, उस दिन प्रतिपदा तिथि और नारद जयन्ती रही होगी। जबकि द्वितीया तिथि पर वह लोगों के हाथ में पहुँचा होगा। लेकिन इस मान्यता पर भी ज्योतिष शास्त्र के प्रामाणिक समझे जाने वाले स्रोत के हिसाब से प्रश्नचिह्न लगता है। यह स्रोत है- ‘द्रिक पंचांग’ मूल रूप से दक्षिण भारत के ज्योतिषियों द्वारा यह निर्मित और संचालित है। उत्तर भारत के मथुरा आदि में भी इसकी शाखाएँ हैं। इसके मुताबिक साल 1826 में नारद जयन्ती न तो 30 मई को थी और न 29 को ही। बल्कि यह 22 मई के पड़ी थी। अगला दिन मंगलवार ही था, अलबत्ता।

दूसरा एक और दिलचस्प तथ्य इसी से जुड़ा। हर साल जब भी ‘हिन्दी पत्रकारिता दिवस’ पर कुछ रटी-रटाई बातों का विभिन्न प्रकाशनों में दोहराव होता है, तो कहीं कहा जाता है कि ‘उदन्त मार्त्तण्ड’ का प्रकाशन चार दिसम्बर 1826 को बन्द हो गया। जबकि कहीं प्रकाशन बन्द होने की तारीख़ 19 दिसम्बर 1827 बताई जाती है। जबकि अख़बार के आख़िरी अंक में हिन्दी महीने की जो तिथि लिखी गई वह थी ‘मिति पौष बदी १’ यानि पौष महीने के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि। द्रिक पंचांग के अनुसार, उस दिन तारीख़ थी चार दिसम्बर और दिन मंगलवार, जिस रोज अख़बार प्रकाशित होता था।

2. भाषायी मिश्रण और सरकार का रवैया :

यही कोई 19 महीने तक 79 अंक निकालने के बाद जब ‘उदन्त मार्त्तण्ड’ का प्रकाशन बन्द किया गया तो उसके दो कारण बताए गए। पहला- सरकार का रवैया। उसने अख़बार के संचालकों को प्रकाशन की अनुमति तो दी। लेकिन बार-बार अनुरोध के बावजूद डाक दरों में उसे इतनी भी रियायत देने को तैयार नहीं हुई कि अख़बार थोड़े कम पैसे में सुदूर पाठकों तक पहुँचाया जा सके। इतना ही नहीं, सरकार के किसी विभाग को इस अख़बार की एक प्रति ख़रीदना भी मंज़ूर नहीं था। नतीज़ा अख़बार के संचालक आर्थिक संकट में फँसते गए। जबकि अन्य सत्ता समर्थक प्रकाशनों को सरकार से इमदाद मिलती रही।  

दूसरा कारण इस अख़बार का प्रकाशन बन्द होने के पीछे यह बताया गया कि इसकी भाषा में घालमेल था। इसमें खड़ी हिन्दी और ब्रजभाषा का मिश्रण था। इससे वह न तो क्षेत्रीय भाषा के लोगों को जँचा और न हिन्दीभाषी लोगों का ही पसन्दीदा बन सका। 

3. सम्पादकीय समझ, सुविधा, संयोग और अफसोस :

इसके बाद एक अपेक्षाकृत नया किस्सा। हिन्दी के दो बड़े पत्रकारों के जीवन से जुड़ा। मध्य प्रदेश की माटी के शिवअनुराग पटैरया और राजकुमार केसवानी की ज़िन्दगी का। इसे इत्तिफ़ाक कहिए या दुर्योग। दोनों ही मई महीने की 12 और 21 तारीख़ों को इस दुनिया से विदा ले गए। पहले पटैरया जी और फिर नौ दिन बाद केसवानी जी। अपने पीछे छोड़ गए तमाम अमिट यादें, वाक़ये और सीखें। आने वाली पीढ़ी के लिए। दोनों राजधानी भोपाल की शिवाजीनगर कॉलोनी में आमने-सामने रहते थे। लेकिन ये आमने-सामने का सिलसिला कोई अभी-अभी का नहीं था। बल्कि 1980 के दशक से शुरू हुआ था। उस वक़्त पटैरया जी मध्य प्रदेश के छतरपुर जैसे छोटे शहर से निकलकर नए-नए इन्दौर पहुँचे थे। उस दौर के प्रतिष्ठित अख़बार ‘दैनिक नई दुनिया’ में उनकी नौकरी लगी थी। जबकि केसवानी जी अपने मूल भोपाल शहर में ही ‘रपट’ नाम का साप्ताहिक अख़बार निकालते थे। साथ में ‘शहरनामा’ नाम की साप्ताहिक पत्रिका भी। 

इन दोनों का सबसे पहली बार इत्तिफ़ाकी आमना-सामना कराया भोपाल गैस त्रासदी ने। दिसम्बर, तीन 1984 को हुई इस भीषण त्रासदी से करीब ढाई साल पहले केसवानी जी ने अपने अख़बार ‘रपट’ में एक रपट (ख़बर) छापी थी। इसमें उन्होंने चेताया था कि शहर के बैरसिया इलाके में स्थित कीटनाशक उत्पादन संयंत्र ‘यूनियन कार्बाइड’ में किसी भी वक़्त बड़ी दुर्घटना हो सकती है। वहाँ सुरक्षा मानकों से जुड़ी गम्भीर लापरवाहियाँ हो रही हैं। और इसके बाद अन्तत: उनकी चेतावनी सही साबित हुई। इसके साथ ही पूरी दुनिया उनके नाम, उनके काम और उनके उस अनजान से अख़बार तक से वाकिफ़ हो गई। 

हालाँकि ये बात बहुत कम लोग ही जानते हैं कि ‘भोपाल गैस त्रासदी’ से जुड़ी पहली चेतावनी केसवानी जी ने नहीं, बल्कि पटैरया जी ने दी थी। साल 2001 में उनकी रिपोर्ताज़ का संकलन ‘समय की नदी’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ था। इसके पृष्ठ क्रमांक-39 पर एक आलेख है, ‘भोपाल मौत के क़रीब’। यह आलेख उन्होंने इसी सन्दर्भ में केसवानी जी की ख़बर प्रकाशित होने से कुछ महीनों पहले लिखा था। इसके लिए वे विशेष तौर पर इन्दौर से भोपाल आए थे। पुस्तक ‘समय की नदी’ के पृष्ठ क्रमांक 40, 41, 42 में अंग्रेजी की पत्रिका ‘इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया’ का एक लेख सन्दर्भ के लिए दिया गया है। यह लेख 1985 में प्रकाशित हुआ था। इसमें ‘नई दुनिया’ भोपाल के सम्पादकीय प्रमुख (Bureau Chief) मदनमोहन जोशी स्वीकार करते हैं कि उस समय अख़बार के उप-सम्पादक (Sub-Editor) शिवअनुराग ने गैस त्रासदी की चेतावनी वाली ख़बर दी थी। जोशी के मुताबिक, “मैंने अपने वरिष्ठ संवाददाता से ख़बर की पड़ताल कराई। उसने कम्पनी के प्रबन्धन से बातचीत की। सरकार के वरिष्ठ स्तर पर बात की। और ख़बर को गलत करार दिया। मुझे भी लगा कि यह कुछ ज़्यादा ही सनसनीख़ेज है। ऐसा कुछ कभी नहीं हो सकता। इसके बाद हमने उस ख़बर को प्रकाशित न करने का निर्णय लिया।”

आगे बातचीत में जोशी मानते हैं कि शिवअनुराग की “ख़बर न छापने का हमारा फ़ैसला गलत था। इसके लिए हमें अफ़सोस है और हमेशा रहेगा।” 

अफ़सोस पटैरया जी काे भी रहा जीवनभर कि काश! उनकी ख़बर प्रकाशित हुई होती। 

अफ़सोस पूरी ज़िन्दगी केसवानी जी को भी रहा कि काश! उनकी भविष्यवाणी सच न साबित हुई होती, तो उनके नाम के साथ यह भीषण मानवीय त्रासदी पहचान की तरह न चिपकती, हमेशा के लिए। 

….और अफ़सोस यक़ीनन हिन्दी पत्रकारिता और उससे जुड़े तमाम संज़ीदा पत्रकारों को भी होता ही होगा। इस बात का कि 195 साल का सफ़र बीत जाने के बाद भी अब तक तथ्यों को कसौटी पर परखकर लिखने वाले, भाषायी शुद्धता के लिए जूझने वाले, सरकाराें की बैसाखियों को झटक देने वाले, ख़बर की संज़ीदगी को लपकने वाले, न तो लोग बहुत हो पाए हैं और न ही संस्थान।

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(लेखक #अपनीडिजिटलडायरी टीम के सदस्य हैं। लेख में जहाँ भी अंडरलाइन के साथ बोल्ड वाक्यांश लिखे गए हैं, उन सभी जगहों पर स्रोत की लिंक है। इन जगहों पर क्लिक करने से स्रोत तक पहुँचा जा सकता है। लिखे गए तथ्यों की प्रामाणिकता को परखा जा सकता है।)  

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