अपशब्दों के प्रयाेग से लोकतंत्र की गरिमा को चोट पहुँचती है, राजनेता इसे क्यों नहीं समझते?

प्रियंका पवन जैन ‘घुवारा’, टीकमगढ़, मध्य प्रदेश

भारतीय लोकतंत्र में राजनेताओं की भाषा का स्तर लगातार गिरता जा रहा है। इसका प्रमाण है, बिहार विधानसभा चुनाव अभियान के दौरान देश के प्रधानमंत्री के लिए लगातार अपशब्दों का प्रयोग किया जाना। यहाँ तक कि एक मंच से तो किसी ने उनकी माँ के लिए भद्दी गालियाँ तक निकाल दीं। अभी ही एक वरिष्ठतम नेता ने प्रधानमंत्री को ‘देश का दुश्मन’ तक बता दिया है। सवाल है कि क्या कोई प्रधानमंत्री, भले ही वह किसी भी दल का हो, ‘देश का दुश्मन’ हो सकता है? तो फिर ऐसी भाषा का प्रयोग क्यों? 

लोकतंत्र में असहमति और आलोचना आवश्यक है, लेकिन जब यह अभद्रता और घृणा का रूप ले लेती है, तो समाज की आत्मा को चोट पहुँचती है। अपशब्दों और व्यक्तिगत हमलों का प्रयोग लोकतंत्र की गरिमा के लिए घातक है, यह बात राजनेताओं को समझनी चाहिए। संवाद में शिष्टता, संयम और सम्मान अनिवार्य हैं। वैचारिक मतभेद स्वीकार किए जा सकते हैं। असहमति और आलोचना का होना भी स्वाभाविक है। यह सब समाज को निरन्तर सुधार और विकास की ओर प्रेरित करता है। मगर अभद्रता? 

ध्यान रखने की बात है कि जब भारत ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की भावना लेकर विश्व पटल पर अपनी पहचान फिर बनाना चहता है, तब भाषा की महत्ता और भी बढ़ जाती है। लेकिन वैचारिक असहमति जब अभद्रता, कटुता और घृणा के रूप में प्रकट होने लगे, तब यह केवल राजनीतिक बहस नहीं रह जाती। यह समाज की आत्मा को चोट पहुँचाती है। इतना ही नहीं, अपशब्दों और अभद्रता की प्रवृत्ति का बड़ा खतरा ये है कि यह नई पीढ़ी के सामने भी गलत उदाहरण पेश करती है, जो समाज के नैतिक पतन का कारण होता है।

इसीलिए देश आज उन नेताओं को याद करता है, जिनके समय में राजनीतिक असहमति के बावजूद संवाद का स्तर उच्च रहा। वे अपने विपक्षियों का सम्मान करते थे। वैचारिक मतभेद होने पर भी व्यक्तिगत अपशब्दों का प्रयोग नहीं करते थे। उनका आदर्श यही था कि राजनीति का उद्देश्य केवल सत्ता नहीं, बल्कि समाज को शिक्षित, संगठित और सुसंस्कृत बनाना भी है। इसलिए वे भाषा की मर्यादा बनाए रखते थे। मगर आज राजनीति की भाषा में मर्यादा तो नदारद है ही, भाषाई मूल स्वरूप भी अनुपस्थित दिखता है।

जबकि यह समझना होगा कि भाषा केवल शब्दों का समूह मात्र नहीं है। यह विचारों का माध्यम, संस्कारों का प्रतिबिम्ब और सामाजिक दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति है। लेकिन जब यही भाषा अशोभनीय और अपमानजनक हो जाती है, तो वह न केवल व्यक्तियों को अपमानित करती है, बल्कि अपने स्तर से भी स्वयं नीचे गिर जाती है। साथ ही, समाज में आपसी विश्वास और सहयोग की भावना भी कमजोर करती है। 

इसलिए राजनेताओं को सजगता के साथ याद रखना चाहिए कि असहमति का अर्थ यह नहीं कि विरोधी के प्रति घृणा व्यक्त की जाए। असहमति का अर्थ है कि आप अपने विचार स्पष्ट करें, लेकिन सम्मान, सहिष्णुता और तर्क की मर्यादा भी बनाए रखें। लोकतंत्र केवल कानून और संविधान तक सीमित नहीं, यह समाज की नैतिक चेतना और मूल्य प्रणाली पर भी आधारित है। इसीलिए भाषाई संवेदनशीलता और प्रभाव को समझना होगा।  लोकतंत्र में असहमति के लिए जगह हमेशा होनी चाहिए, मगर पूरे सम्मान और सभ्यता के साथ।

यह प्रक्रिया समाज में न्याय, समानता और मानवता के मूल्यों को मजबूत करती है। स्वस्थ संवाद के बिना समाज का विकास मुमकिन नहीं। यह केवल शब्दों का संघर्ष नहीं, बल्कि नैतिकता, संस्कार और लोकतांत्रिक मूल्य संरचना की रक्षा प्रक्रिया भी है। यह सिर्फ कानून और संविधान तक सीमित नहीं, बल्कि भाषा और व्यवहार की मर्यादा प्रजातांत्रिक आत्मा को भी जीवित रखती है। 

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(पवन जैन मूल रूप से बुन्देलखण्ड के टीकमगढ़ जिले के सक्रिय सामाजिक तथा राजनीतिक कार्यकर्ता हैं। जनसामान्य से जुड़े मसलों पर वह लगातार आवाज बुलन्द करते हैं। उनकी पत्नी प्रियंका भी उन्हीं की तरह सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर सक्रिय रहती हैं। लेख के रूप में वे अपने विचार #अपनीडिजिटलडायरी को व्हाट्स एप के जरिए भेजते हैं।) 

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