प्रदीप गौड़, जयपुर राजस्थान
एक नागरिक होने के नाते आंदोलन की मांगें पूरी होने और उसके शांतिपूर्ण समापन पर मुझे संतोष है। इस आंदोलन से जुड़े उन सभी लोगों की भी सराहना करता हूँ जिन्होंने जनहित के मुद्दे उठाए और सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करने का प्रयास किया। लोकतंत्र में सरकार से प्रश्न पूछना, जवाब मांगना और जनहित के विषयों पर आवाज़ उठाना हर नागरिक का अधिकार ही नहीं, बल्कि एक स्वस्थ लोकतंत्र की आवश्यकता भी है। हर सरकार को जनता के प्रति जवाबदेह रहना चाहिए।
लेकिन इस पूरे आंदोलन के दौरान अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर जिस प्रकार प्रधानमंत्री, उनकी दिवंगत माता, मीडिया और अन्य व्यक्तियों के लिए अमर्यादित भाषा, अपमानजनक टिप्पणियाँ, अशोभनीय पोस्ट और आपत्तिजनक प्रदर्शन देखने को मिले, उन्होंने मन को गहरी पीड़ा पहुँचाई। विचारों का विरोध होना स्वाभाविक है, पर किसी की व्यक्तिगत गरिमा, परिवार या दिवंगत परिजन को निशाना बनाना किसी भी सभ्य समाज की पहचान नहीं हो सकता(
महिलाओं के सम्मान और अधिकारों की बात करना समय की आवश्यकता है, लेकिन कुछ स्थानों पर जिस प्रकार की भाषा, प्रतीकों और प्रस्तुतियों का प्रयोग हुआ, उसने भी मन को विचलित किया। महिलाओं को बराबरी, सम्मान और सुरक्षा अवश्य मिलनी चाहिए, पर अभिव्यक्ति का स्वरूप ऐसा हो जो समाज को सकारात्मक दिशा दे और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बने।
आज एक वरिष्ठ नागरिक के रूप में मन में यही प्रश्न उठता है कि क्या हमारी पीढ़ी से संस्कार देने में कहीं कोई कमी रह गई? लोकतंत्र केवल अधिकारों से नहीं चलता, बल्कि कर्तव्यों, संयम, शालीनता और परस्पर सम्मान से भी मजबूत होता है।
असहमति लोकतंत्र की शक्ति है, लेकिन मर्यादा उसकी आत्मा है। मतभेद अवश्य रखें, सरकार से सवाल भी पूछें, जवाब भी मांगें, लेकिन शब्दों की गरिमा, भारतीय संस्कृति और मानवीय संवेदनाओं की सीमा कभी नहीं लांघनी चाहिए। यही एक परिपक्व लोकतंत्र और सभ्य समाज की पहचान है।🙏
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(प्रदीप जी जयपुर के वरिष्ठ छायाचित्र सम्पादक हैं। कई वर्षों से मुख्यधारा के मीडिया से जुड़े हुए हैं। उन्होंने लेख के रूप में अपने यह विचार व्हाट्सएप सन्देश के रूप में #अपनीडिजिटलडायरी तक पहुँचाया है।)
