सांकेतिक तस्वीर
रोहिणी जैन, ‘घुवारा’, टीकमगढ़ मध्य प्रदेश
दीपावली केवल लक्ष्मी के आगमन का नहीं बल्कि आत्ममंथन का भी समय है। जब हम घर के हर कोने की धूल झाड़ते हैं, तो दरअसल हमें अपने मन की धूल भी झाड़नी चाहिए। पुरानी शिकायतें, मतभेद, कटुता और तनाव। हर दीपक यह याद दिलाता है कि अंधकार मिटाने के लिए केवल एक दीप ही काफी होता है, बशर्ते वह सच्चे मन से जलाया गया हो। परिवार में एक छोटी सी मुस्कान, एक क्षमा का भाव, एक प्रेमपूर्ण संवाद – यही वे दीप हैं जो रिश्तों के कोनों को रोशन करते हैं।
आज के दौर में यह पर्व मानसिक स्वास्थ्य के सन्दर्भ में भी बहुत मायने रखता है। हमें यह याद रखना होगा कि दीपावली का आनंद केवल बाहरी सजावट में नहीं, बल्कि उस मानसिक सुकून में है जो हमें अपनेपन, संवाद और आत्मीयता से मिलता है। वहीं गोवर्धन पूजा दरअसल प्रकृति पूजा है। गाय, गोबर, गोचर भूमि – ये सब उस पारिस्थितिकी का हिस्सा हैं जिसने भारतीय जीवन को आत्मनिर्भर बनाया। जब हम गोबर, मिट्टी और फूलों से गोवर्धन बनाते हैं, तो वह धरती और पर्यावरण के प्रति हमारी श्रद्धा का प्रतीक होता है। वह एक स्मरण है कि यह मिट्टी ही हमारी असली माता है, जो हर बीज को अंकुरित कर हमें अन्न देती है।
आज ‘हैप्पी गोवर्धन पूजा’ के स्टिकर तो हैं, पर गाय के लिए चारा नहीं। श्रद्धा अब धरती पर नहीं, स्क्रीन पर चमकती है। हालाँकि ग्रामीण भारत में आज भी यह पर्व आत्मीयता से मनाया जाता है। गाँव की गलियों में बच्चे नंगे पैर गोबर इकट्ठा करते हैं, महिलाएँ पारम्परिक गीत गाती हैं, “गोवर्धन धर्यो गिरधारी”। वहाँ पूजा में सादगी है, पर दिल है। वहीं शहरी भारत में गोवर्धन पूजा ‘रील’ बन चुकी है – पाँच मिनट की पूजा, फिर पिज़्ज़ा पार्टी। यह फर्क बताता है कि विकास ने हमें सुविधा तो दी, पर संवेदना छीन ली।
हमारी आधुनिकता ने हमें अपने ही मूल से काट दिया है। जब जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय संकट मानवता के सामने सबसे बड़ा खतरा बन चुके हैं, तब गोवर्धन पूजा का महत्त्व और भी बढ़ जाता है। यह पर्व हमें सिखाते है कि त्योहारों का उद्देश्य मानवीय जीवन के उत्सव है। ईश्वर से प्रार्थना करने से पहले हमें धरती के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए। यह वह समय है जब हमें गोवर्धन पूजा की व्याख्या को नए अर्थों में देखना चाहिए – केवल धर्म नहीं, बल्कि जीवनशैली के रूप में।
अगर हम इस दिन पेड़ लगाएँ, गोशाला में सेवा करें, तालाब साफ करें, पशुओं को भोजन दें – तो वही सच्ची श्रद्धा होगी। इसी तरह भाई दूज का सन्देश बहुत सीधा है – रिश्तों को निभाने के लिए कोई बड़ी रस्म नहीं चाहिए। बस, छोटी-छोटी संवेदनाएँ चाहिएं। कभी एक फोन कॉल, कभी एक पत्र, कभी बिना कारण किया गया धन्यवाद – यही वे छोटे तिलक हैं जो भाई-बहन के रिश्ते को जीवित रखते हैं। इसलिए जब तिलक लगाएँ, तो साथ यह वचन भी लें कि रिश्तों की डोर कभी ढीली नहीं पड़ने देंगे। भाई दूज की यह रौशनी सिर्फ दीयों में नहीं, दिलों में भी जले। प्रेम और अपनापन केवल तस्वीरों में नहीं, व्यवहार में बहे।
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(नोट : रोहिणी टीकमगढ़, मध्य प्रदेश के समाजसेवी एवं राजनेता पवन जैन ‘घुवारा’ के परिवार की सदस्य हैं। #अपनीडिजिटलडायरी की पाठक हैं। डायरी को उनका लेख व्हाट्स एप के जरिए प्राप्त हुआ है।)
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