अपने मुल्क के तौर-तरीक़ों और पहनावे से लगाव रखना भी देशभक्ति है

ज़ीनत ज़ैदी, शाहदरा, दिल्ली

अंग्रेजी की कहावत है, “फर्स्ट इमप्रेशन इज़ द लास्ट इम्प्रेशन।” अक्सर हम सुनते रहते हैंl और इस कहावत का मतलब अक्सर किसी के कपड़ों से लगाया जाता है। उन्हें ही ‘फर्स्ट इम्प्रेशन’ की वजह मान लिया जाता है। उससे किसी की शख़्सियत (personality) का पता लगाने की कोशिश की जाने लगती है।

लेकिन क्या सच में इंसान के कपड़े उसकी खुद की पसन्द से होते हैं? दअरसल आज फैशन इंडस्ट्री की देखा-देखी हम भी अपना फैशन सेंस बदल चुके हैं। इसका असर साफ है कि हर घर में वेस्टर्न कपड़े काफ़ी ज़्यादा तादाद में देखने मिल जाते हैं। टेलीविज़न और फिल्में हमें दुनियाभर के तौर-तरीकों और कपड़ों से वाक़िफ़ कराते हैं। मगर वही हमें हमारे ख़ुद के शक़ाफ़त (culture) से हमें दूर करते जाते हैं। बची-खुची कसर बाज़ार पूरी कर देता है। 

इस सब के बीच हम भूल जाते हैं, कि हमारे अपने परम्परागत कपड़े सिर्फ़ कपड़े नहीं हैं, हमारे मुल्क़ की पहचान हैं। दुनियाभर में हर मुल्क़ का पहनावा अलग-अलग है। वही हमें दूसरे से ख़ास बनाता है। इसमें हिन्दुस्तान जैसे मुल्क की तो बात ही निराली है। चाहे सलवार-कमीज़ हो या धोती-कुर्ता, लहँगा-चोली, साड़ियाँ, कुर्ता-पायज़ामा। ये सब हमारी अपनी पहचान हैं। इसके आगे भी लखनवी कढ़ाई हो, बनारसी या फिर जयपुरी प्रिंट। सभी में हमारे डिज़ाइन एक से बढ़कर एक हैं। कपड़े की क़िस्में भी, जैसे- सूती, ख़ादी, मखमल, नायलॉन, रेयान आदि सैकड़ो हैं l पशमीना शालें भी अलग पहचान रखती हैं। इनकी ख़ूबसूरती वाक़ई देखने लायक होती हैl

मगर इतना कुछ होने के बावज़ूद हम अपने इन परम्परागत कपड़ों को महज़ त्यौहारों की ज़ीनत मानते हैं। रस्मी तौर पर ही पहनते हैं। आम तौर पर विदेशी कपड़े ही पहनते हैं। इतना ही नहीं, हम में से अगर कोई अपने हिसाब से अपने पारम्परिक कपड़ों का चुनाव करे, उन्हें पहने तो उसे हम असभ्य या पिछड़ी सोच वाला बता देते हैं। और इसका नतीज़ा क्या होता है? दिखावे के चक्कर में हम न इधर के रहते हैं, न उधर के। बीच में उलझ जाते हैं। देसी को विदेशी और विदेशी को देसी तरीके से अपनाने लग जाते हैं। कुछ वाहियात सा ईज़ाद हो जाता है।

इसीलिए मैं याद दिलाना चाहूँगी कि अगर हमें वाक़ई अपने मुल्क से प्यार है, तो हमें इसके तौर-तरीके, इसका पहनावा अपनाने में दिक़्क़त नहीं होनी चाहिए। बल्कि इससे हमें लगाव रखना चाहिए। यह भी एक तरह की देशभक्ति है। क्योंकि अगर हम इन सब चीजों को भूल जाएँगे तो आने वाले समय में इनका वज़ूद मिट जाएगा, जो मुल्क़ की पहचान के लिहाज़ से किसी संकट से कम नहीं होगा। सोचिएगा!  

जय हिन्द। 
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(ज़ीनत #अपनीडिजिटलडायरी के सजग पाठक और नियमित लेखकों में से हैं। दिल्ली के आरपीवीवी, सूरजमलविहार स्कूल में 11वीं कक्षा में पढ़ती हैं। लेकिन इतनी कम उम्र में भी अपने लेखों के जरिए गम्भीर मसले उठाती हैं। वे अपने आर्टिकल सीधे #अपनीडिजिटलडायरी के ‘अपनी डायरी लिखिए’ सेक्शन या वॉट्स एप के जरिए भेजती हैं।)
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