पहचान खोना अभेद्य किले को जीतने सा है!

संदीप नाईक, देवास, मध्य प्रदेश से 18/9/2021

अभी धूप भी थी और बरसात भी। बचपन में ऐसी स्थिति में हम कहते थे चिड़ा-चिड़ी का ब्याह हो रहा है। बड़ा प्रतीक है, मौसम का यह फ्यूजन (मिश्रण)। अटपटा और विचित्र भी। पर जीवन अक्सर ऐसा ही होता है। चिड़ा-चिड़ी मात्र प्रतीक हैं और धूप में बरसात की बूँदें असली सच।
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आस्था और भरोसा हमें अगली सुबह का सूरज देखने के लिए आश्वस्त करता है। हम आज से ऊब चुके होते हैं। इसलिए हर रात आज की स्मृतियों को दफन करते हैं। एक आह के साथ उन स्मृतियों को ठीक-ठाक करके तह में लपेटकर तकिये के नीचे रखकर सो जाते हैं कि भोर तक वे फुर्र हो जाएँगी पर सच यह नहीं होता। वे रातभर में मंजकर गाढ़ी और दुरूह हो जाती हैं।
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हमें विरासत में विस्मृति कभी नहीं मिलती। हम जूझते हैं, आशाओं और नैराश्य के बीच। पर लगता है, पार नहीं लग पाते। संसार में जन्म के साथ ही यायावरी के अश्व पर सवार होकर हम जीतने का हौसला लिए निकलते हैं। हर बार तैयार होते हैं, तन-मन से। पर फिर हारते हैं, गिरते हैं और थक-हारकर बैठ भी जाते हैं। फिर कोई आता है। सम्हाल लेता है। धीरे से कन्धे पर हाथ रखता है। उठाकर राह पर खड़ा कर देता है। सीधे सूरज की ओर मुँह घुमा देता है कि जाओ अभी रास्ता शुरू हुआ है।
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मैं सिलसिलेवार याद करता हूँ उन सबको तो दर्जनों जोड़ी आँखें, हाथ और मुस्कुराहटें चौंधिया जाती हैं बरबस ही। मैं झुकता हूँ कृतज्ञ भाव से पर भाँप नहीं पाता, किसी चेहरे को। अधिकांश बल्कि सारे चेहरे विलुप्त हो गए हैं। खो गए हैं और भीड़ में जो अब पहचान में आते हैं, उन्हें देखकर सहम जाता हूँ। मग़र उन विलुप्त चेहरों की ऊष्मा मेरे तन को दीप्त करती है। मन के अंधेरे कोनों को झिलमिला देती है। किसी प्रकाश पुंज सी रोशनी में निखरकर संघर्ष की राह पर फिर निकलता हूँ। शायद यह कहानी हम सबकी है।
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वस्तुतः हम सबकी लम्बी और बड़ी कहानियाँ हैं। अपने जीवन में हम सब मर्द हैं, जो लड़-भिड़कर वह सब कुछ पा लेते हैं, जिसे पाने का हम माद्दा रखते हैं। बस, बहुत सूक्ष्मांश में वह रह जाता है, जिसे हम पाकर भी कुछ हासिल नहीं कर सकते थे। इसके बावज़ूद जो हमारे पास है, हम उसकी परवाह न कर उस अलभ्य के पीछे आतुर और सन्तापग्रस्त रहते हैं, जिसके होने न होने का कोई अर्थ नहीं है। हमारे दिवास्वप्नों में भी किसी चराचर जगत की तरह सोते-जागते वह अप्राप्य मौजूद रहता है। हम बेचैनियों की कन्दराओं में विचरण करते रहते हैं। 
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हम सब उम्मीदों के यात्री हैं। हमारे होने से सुख और दुख हैं। यातनाएँ और प्राप्तियाँ हैं। हम सबको चलना ही होगा। सड़क पर कभी गर्मी होगी, ठंड या बरसात। पर बस सड़क और पाँव के पंजे के बीच जो आकर्षण है, उसे बनाए रखने की ज़िम्मेदारी हमारी होगी। मैं जानता हूँ कि हम सब घायल हैं इस समय। क्लान्त भी पर हमें ख़ुद से लड़कर भी आगे निकलना होगा।
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हम सब अपनी लड़ाई अपनी-अपनी जगह लड़ रहे हैं। रोज़ तानों से लेकर ग़लीज़ क़िस्म की गालियाँ सुनते हैं। अपनी पसन्द का काम न कर पाने का दुख सबको सालता है। हम अपनी पहचान छुपाते हुए जीवन जीने का उपक्रम मुखौटों की आड़ में कर रहे हैं। पर चल रहे हैं, लहूलुहान होकर, यह तसल्ली और सुकून की बात है। शोर के बीच अपनी साँसों के आरोह-अवरोह को महसूस कर पा रहे हैं, यह भी बेहद सन्तोषजनक है।
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अपने मन पर बोझ है, लम्बी दूरी तय करनी है। तथागत कहते हैं, “लम्बी दूरी तय करना हो तो सिर पर कम बोझ रखकर चलो।” पर वो समय अलग था, आज का कड़वा सच सर्वथा भिन्न है। यह बात प्रासंगिक नहीं और फिर इन दो द्वंद्वों में मुझे जो व्यवहारिक लगता है, वह यह कि निर्मोही बन जाओ। निस्पृही भी। यथास्थिति बनाए रखना भी प्रायः एक भली और सादी प्रक्रिया है। इससे गुज़रकर हम हर कुछ से विरक्त हो सकते हैं। 
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मैं जीवन में जीने की नहीं जीवन चक्र से शीघ्र गुज़रने की कामना करता हूँ।
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पहचान बनाने के संघर्षों में सदैव हार जाना एक अच्छा रणनीतिक कदम होता है।
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पहचान खोना अभेद्य किले को जीतने सा है।

(संदीप जी स्वतंत्र लेखक हैं। यह लेख उनकी ‘एकांत की अकुलाहट’ श्रृंखला की 28वीं कड़ी है। #अपनीडिजिटलडायरी की टीम को प्रोत्साहन देने के लिए उन्होंने इस श्रृंखला के सभी लेख अपनी स्वेच्छा से, सहर्ष उपलब्ध कराए हैं। वह भी बिना कोई पारिश्रमिक लिए। इस मायने में उनके निजी अनुभवों/विचारों की यह पठनीय श्रृंखला #अपनीडिजिटलडायरी की टीम के लिए पहली कमाई की तरह है। अपने पाठकों और सहभागियों को लगातार स्वस्थ, रोचक, प्रेरक, सरोकार से भरी पठनीय सामग्री उपलब्ध कराने का लक्ष्य लेकर सतत् प्रयास कर रही ‘डायरी’ टीम इसके लिए संदीप जी की आभारी है।) 
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इस श्रृंखला की पिछली कड़ियाँ  ये रहीं : 

27वीं कड़ी :  पूर्णता ही ख़ोख़लेपन का सर्वोच्च और अनन्तिम सत्य है!
26वीं कड़ी : अधूरापन जीवन है और पूर्णता एक कल्पना!
25वीं कड़ी : हम जितने वाचाल, बहिर्मुखी होते हैं, अन्दर से उतने एकाकी, दुखी भी
24वीं कड़ी : अपने पिंजरे हमें ख़ुद ही तोड़ने होंगे
23वीं कड़ी : बड़ा दिल होने से जीवन लम्बा हो जाएगा, यह निश्चित नहीं है
22वीं कड़ी : जो जीवन को जितनी जल्दी समझ जाएगा, मर जाएगा 
21वीं कड़ी : लम्बी दूरी तय करनी हो तो सिर पर कम वज़न रखकर चलो 
20वीं कड़ी : हम सब कहीं न कही ग़लत हैं 
19वीं कड़ी : प्रकृति अपनी लय में जो चाहती है, हमें बनाकर ही छोड़ती है, हम चाहे जो कर लें! 
18वीं कड़ी : जो सहज और सरल है वही यह जंग भी जीत पाएगा 
17वीं कड़ी : विस्मृति बड़ी नेमत है और एक दिन मैं भी भुला ही दिया जाऊँगा! 
16वीं कड़ी : बता नीलकंठ, इस गरल विष का रहस्य क्या है? 
15वीं कड़ी : दूर कहीं पदचाप सुनाई देते हैं…‘वा घर सबसे न्यारा’ .. 
14वीं कड़ी : बाबू , तुम्हारा खून बहुत अलग है, इंसानों का खून नहीं है… 
13वीं कड़ी : रास्ते की धूप में ख़ुद ही चलना पड़ता है, निर्जन पथ पर अकेले ही निकलना होगा 
12वीं कड़ी : बीती जा रही है सबकी उमर पर हम मानने को तैयार ही नहीं हैं 
11वीं कड़ी : लगता है, हम सब एक टाइटैनिक में इस समय सवार हैं और जहाज डूब रहा है 
10वीं कड़ी : लगता है, अपना खाने-पीने का कोटा खत्म हो गया है! 
नौवीं कड़ी : मैं थककर मौत का इन्तज़ार नहीं करना चाहता… 
आठवीं कड़ी : गुरुदेव कहते हैं, ‘एकला चलो रे’ और मैं एकला चलता रहा, चलता रहा… 
सातवीं कड़ी : स्मृतियों के धागे से वक़्त को पकड़ता हूँ, ताकि पिंजर से आत्मा के निकलने का नाद गूँजे 
छठी कड़ीः आज मैं मुआफ़ी माँगने पलटकर पीछे आया हूँ, मुझे मुआफ़ कर दो  
पांचवीं कड़ीः ‘मत कर तू अभिमान’ सिर्फ गाने से या कहने से नहीं चलेगा! 
चौथी कड़ीः रातभर नदी के बहते पानी में पाँव डालकर बैठे रहना…फिर याद आता उसे अपना कमरा 
तीसरी कड़ीः काश, चाँद की आभा भी नीली होती, सितारे भी और अंधेरा भी नीला हो जाता! 
दूसरी कड़ीः जब कोई विमान अपने ताकतवर पंखों से चीरता हुआ इसके भीतर पहुँच जाता है तो… 
पहली कड़ीः किसी ने पूछा कि पेड़ का रंग कैसा हो, तो मैंने बहुत सोचकर देर से जवाब दिया- नीला!

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