प्रतीकात्मक तस्वीर
नीलेश द्विवेदी, भोपाल, मध्य प्रदेश से
…. तुम तो नदी की धारा के साथ दौड़ रहे हो।
उस सुख को कैसे समझोगे,
जो हमें नदी को देखकर मिलता है।
और वह फूल तुम्हें कैसे दिखाई देगा,
जो हमारी झिलमिल अँधियारी में खिलता है।…
… तुम जी रहे हो,
हम जीने की इच्छा को तौल रहे हैं।
आयु तेजी से भागी जाती है,
और हम अँधेरे में जीवन का अर्थ टटोल रहे हैं।
—–
ये कुछ पंक्तियाँ हैं, राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की कविता ‘शोक की सन्तान’ से। बहुत गहरे और सार्थक अर्थों वाली यह पूरी कविता ऑडियो में सुनिएगा। नीलेश द्विवेदी की आवाज़ में। जितना आनन्द आएगा, जितनी ‘रोचक’ यानी दिलचस्प लगेगी, उतनी ‘सोचक’ भी मतलब आप सोचने पर विवश भी होंगे। (कविता कोष से साभार)
देश में जनगणना होने वाली है। मतलब जनसंख्या कितनी है और उसका स्वरूप कैसा है,… Read More
जय जय श्री राधे Read More
अभी एक तारीख को किसी जरूरी काम से भोपाल से पन्ना जाना हुआ। वहाँ ट्रेन… Read More
भारत के प्रधानमंत्री कार्यालय के नए परिसर का उद्घाटन 13 फरवरी 2026 को हुआ। इसे… Read More
‘भ्रष्ट’ का अर्थ है- जब कोई अपने धर्म (कर्तव्य-पथ) से दूर हट जाए और ‘आचार’… Read More
ऐसी सूचना है कि अंग्रेजों की ईस्ट इण्डिया कम्पनी फिर दिवालिया हो गई और उसका… Read More