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क्रिकेट में जुआ, हमने नहीं छुआ…क्योंकि हमारे माता-पिता ने हमारी परवरिश अच्छे से की!

निकेश जैन, इन्दौर मध्य प्रदेश

क्रिकेट में जुआ-सट्‌टा कोई नई बात नहीं है। अब से 30 साल पहले भी यह सब होता था। आज भी हो रहा है। मुझे याद है, क्रिकेटर के तौर पर अक़्सर मैं आस-पास के गाँव-क़स्बों में टूर्नामेन्ट खेलने जाया करता था। उन मैचों के दौरान हम हमेशा देखते थे कि कई लोग हर गेंद पर 2-5 रुपए के दाँव लगाया करते थे। 

इसमें शर्त क्या होती थी? यही कि बल्लेबाज़ इस गेंद पर रन बनाएगा या नहीं। आज यही खेल मोबाइल पर चल रहा है। लोगों को इसकी आदत लग चुकी है। छोटी-बड़ी उम्र के हजारों-लाखों लोग इन दिनों मोबाइल के जरिए ड्रीम-11 और सर्कल-11 आदि पर अपनी टीम बनाने में लगे हैं।

इन लोगों को शायद लगता है कि जीवन में सफल होने के लिए यह कला-कौशल (जुए का) होना बहुत ज़रूरी हे। और देखिए कि इस जुए-सट्‌टे का प्रचार-प्रसार कर कौन रहा हे? वे तमाम सफल क्रिकेटर और बॉलीवुड कलाकार, जो पहले ही करोड़ों-अरबों रुपए कमा चुके हैं!! 

मुझे याद है, जिन दिनों में क्रिकेट खेला करता था तब मैचों के दौरान कुछ लोग हमारे पास भी आ जाया करते थे। यह प्रस्ताव लेकर कि उन्हें जुआ जिताने में हम उनकी मदद कर दें। वे हमसे कहा करते थे कि गेंद फेंके जाने से पहले हम उन्हें इशारा कर दें कि रन बनाएँगे या नहीं! इस मदद के बदले में वे हमें अच्छा-खासा पैसा देने की पेशकश भी करते थे। लेकिन हम हमेशा उनकी पेशकश ठुकरा दिया करते थे। 

जानते हैं क्यों? क्येांकि हमारे माता-पिता ने हमारी परवरिश अच्छे से की! 

क्या लगता है? बात सही है न?

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निकेश का मूल लेख

Cricket gambling was popular 30 years ago and it’s popular today also!!

As a cricketer I used to tour a lot to near by towns and villages to play in tournaments. During the match we would see young guys betting Rs. 2 or Rs. 5. on every ball.

What was the bet? Whether batsman will score run or not on that ball!

Today same betting habit has moved to mobiles – while watching the match young guys are making their dream 11 or circle 11 thinking this is the skill they need to be successful in life 🤔

And who is promoting this?

All the successful cricketers and Bollywood actors who have already made crores of rupees! 🤔 (beats me!)

I recall, those young guys sometimes would reach out to us and offer money if we could help them win by just indicating before the ball if we would score run on that ball or not 🙂. The money they would offer those days would be huge for us.

But we always politely refused to participate.

I guess our parents raised us well 😎

Thoughts? 

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(निकेश जैन, कॉरपोरेट प्रशिक्षण के क्षेत्र में काम करने वाली कंपनी- एड्यूरिगो टेक्नोलॉजी के सह-संस्थापक हैं। उनकी अनुमति से उनका यह लेख अपेक्षित संशोधनों और भाषायी बदलावों के साथ #अपनीडिजिटलडायरी पर लिया गया है। मूल रूप से अंग्रेजी में उन्होंने इसे लिंक्डइन पर लिखा है।)

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निकेश के पिछले 10 लेख

50 – मेरी इतिहास की किताबों में ‘छावा’ (सम्भाजी महाराज) से जुड़ी कोई जानकारी क्यों नहीं थी?
49 – अमेरिका में कितने वेतन की उम्मीद करते हैं? 14,000 रुपए! हम गलतियों से ऐसे ही सीखते हैं!
48 – साल 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य क्या वाकई असम्भव है? या फिर कैसे सम्भव है?
47 – उल्टे हाथ से लिखने वाले की तस्वीर बनाने को कहा तो एआई ने सीधे हाथ वाले की बना दी!
46 – ‘ट्रम्प 20 साल पहले अमेरिकी राष्ट्रपति बन जाते, तो हमारे बच्चे ‘भारतीय’ होते’!
45 – 70 या 90 नहीं, मैंने तो हफ़्ते में 100 घंटे भी काम किया, मगर उसका ‘हासिल’ क्या?
44 – भोपाल त्रासदी से कारोबारी सबक : नियमों का पालन सिर्फ़ खानापूर्ति नहीं होनी चाहिए
43 – ध्याान रखिए, करियर और बच्चों के भविष्य का विकल्प है, माता-पिता का नहीं!
42 – भारत के लोग बैठकों में समय पर नहीं आते, ये ‘आम धारणा’ सही है या ग़लत?
41 – देखिए, मीडिया कैसे पक्षपाती तौर पर काम करता है, मेरे अनुभव का किस्सा है! 

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