कब अहिंसा भी परपीड़न का कारण बनती है?

अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 23/11/2021

प्राचीन काल की बात है। किसी गाँव में चन्द्रभूषण नामक एक विद्वान पंडित रहते थे। उनकी वाणी में गज़ब का आकर्षण था। भागवत् कथा सुनाने में निपुण थे। उनकी वाणी से कथा सुनकर लोग मंत्रमुग्ध हो जाते थे। इसीलिए उनके घर रोज कथा सुनने वालों की भीड़ लगी रहती। दूर-दूर से लोग चन्द्रभूषण से कथा सुनाते थे। उसी गाँव में दूसरे पंडित जी रहते थे। उनका नाम था, नंबियार। पढ़े-लिखे तो वे बहुत थे। लेकिन थोड़े घमंडी स्वभाव के थे। स्वयं को बहुत बड़ा विद्वान भी समझते थे। सोचते कहाँ कल का यह बच्चा चन्द्रभूषण, जो अटक-अटक कर कथा पढ़ता है और कहाँ मैं शास्त्रों का मर्मज्ञ। लेकिन वे जब भी चन्द्रभूषण के घर के सामने से गुजरते वहाँ श्रोताओं की भीड़ देखकर उनका मन ईर्ष्या से भर उठता। मन ही मन सोचते चन्द्रभूषण कोई जादू करता है। तभी उसके यहाँ दिन-प्रतिदिन भीड़ बढ़ती जाती है। मुझे कुछ करना चाहिए। 

एक दिन की बात है। नंबियार थके-हारे अपने घर लौटे। भूख भी जोरों से लगी थी। लेकिन घर आकर देखा तो उनकी पत्नी दिखाई नहीं दी। एक-दो आवाज़ भी लगाई मग़र चुप्पी छाई रही। अचानक नंबियार का मन आशंका से भर गया। कहीं मेरी पत्नी चन्द्रभूषण के यहाँ कथा सुनने तो नहीं चली गई? ईर्ष्या और क्रोध से भर कर वे दौड़कर चन्द्रभूषण के घर की ओर चल दिए। चन्द्रभूषण के दरवाज़े पर पहुँच कर देखा वहाँ श्रोताओं की अपार भीड़ थी, जो मंत्रमुग्ध होकर कथा सुन रही थी। नंबियार ने देखा श्रोताओं के मध्य उनकी पत्नी भी बैठी है। बस, फिर क्या था। उनका क्रोध भड़क गया। वह चन्द्रभूषण के आसन के पास पहुँचे और चिल्लाकर बोले, “चन्द्रभूषण, तुम दुनिया के सबसे बड़े मूर्ख हो। तुमसे बड़े मूर्ख ये लोग हैं, जो यहाँ इकट्ठा होकर तुम्हारी बकवास सुन रहे हैं।” उनकी बातों ने चन्द्रभूषण को आश्चर्य में डाल दिया। कथा छूट गई। श्रोता अपने अपने घर चले गए। 

नंबियार ने घर पहुँचकर बाकी गुस्सा पत्नी पर निकाला। बोले, “क्या ज़रूरत थी तुम्हें वहाँ जाने की? क्या मुझसे बड़ा विद्वान है चन्द्रभूषण? मेरे पास शास्त्रों का भंडार है। मग़र तुम्हें कौन बताए। लगता है, तुम्हारी खोपड़ी में बुद्धि ही नहीं है।” इस पर पत्नी कहती है, “क्यों अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनते हो? तुम ऐसे ही बड़े विद्वान बने फिरते हो। लेकिन चन्द्रभूषण को देखो, कितने लोग सुनने आते हैं। उसकी वाणी में ओज है, नम्रता है, दया है, करुणा है,भक्ति है। और तुम्हारी वाणी में, केवल अहंकार।” 

पत्नी की बातें सुनकर नंबियार सोच में पड़ गए। रात भर सोचते रहे। धीरे-धीरे उनका गुस्सा पश्चाताप में बदल गया। उन्होंने मन में सोचा, “मैंने क्या कर दिया। मेरे मन में भगवान की भक्ति के नाम पर इतना द्वेष और चन्द्रभूषण के स्वभाव में इतनी विनम्रता। इतना अपमान सहने के बाद भी वह एक शब्द नहीं बोला।” सोचते-सोचते उनकी आँख लग गई। सुबह जब जागे तो नंबियार पश्चाताप प्रकट करने चन्द्रभूषण के घर के लिए जाने लगे। वे देखते हैं कि चौखट पर कोई आदमी कम्बल ओढ़े बैठा है। नंबियार को देखते ही वह व्यक्ति उनके पैर छूने आगे बढ़ा। “यह क्या करते हो? कौन हो तुम?”, कहते हुए नंबियार पीछे हट गए। फिर उस व्यक्ति को ध्यान देखा। सामने हाथ जोड़े कोई और नहीं बल्कि चन्द्रभूषण खड़े थे। चन्द्रभूषण कहते हैं, “आपने अच्छा ही किया, जो मेरा दोष मुझे बता दिया। लेकिन लगता है, आप अभी तक मुझ से नाराज हैं? मैं रातभर आप के आने की प्रतिक्षा करता रहा, जिससे आप से क्षमा माँग सकूँ।” 

नंबियार पहले ही लज्जित थे। उन्होंने चन्द्रभूषण को गले लगा लिया। दोनों की आँखों में अश्रुधारा फूट पड़ी। 

चरित्र में मौलिक व्यवहार परिवर्तन तभी सम्भव है, जब हम अपने अभिमान को और अपने हृदय की हीनभावना को दूर कर दूसरे के प्रति प्रेम और करुणा का भाव रखें। जब हम महावीर स्वामी के जैन मत को देखते हैं तो पाते हैं कि उनका मत अहंकार को दूर रखने का उपक्रम करता दिखाई देता है। जैसे ही अहंकार दूर हुआ, वैसे ही समस्त जगत के प्रति करुणा का भाव जागृत हो उठता है। करुणा पूर्ण हृदय ही अहिंसा और हिंसा के भाव को पकड़ सकता है। जिसमें करुणा नहीं वह न सिर्फ हिंसक होगा, उसकी अहिंसा भी परपीड़न का कारण बनेगी।

हम देखते हैं कि भारतीय परम्परा ईश्वर या अवतारों का मुख्य गुण करुणापरता दर्शाती है। भगवान श्रीराम, भगवान श्रीकृष्ण सदैव जगत के प्रति करुणा भाव रखते हैं। वे प्राणी कल्याण के प्रति तत्पर रहते हैं।
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(अनुज, मूल रूप से बरेली, उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। दिल्ली में रहते हैं और अध्यापन कार्य से जुड़े हैं। वे #अपनीडिजिटलडायरी के संस्थापक सदस्यों में से हैं। यह लेख, उनकी ‘भारतीय दर्शन’ श्रृंखला की 37वीं कड़ी है।) 
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अनुज राज की ‘भारतीय दर्शन’ श्रृंखला की पिछली कड़ियां… 
36. सोचिए कि जो हुआ, जो कहा, जो जाना, क्या वही अंतिम सत्य है
35: जो क्षमा करे वो महावीर, जो क्षमा सिखाए वो महावीर…
34 : बौद्ध अपनी ही ज़मीन से छिन्न होकर भिन्न क्यों है?
33 : मुक्ति का सबसे आसान रास्ता बुद्ध कौन सा बताते हैं?
32 : हमेशा सौम्य रहने वाले बुद्ध अन्तिम उपदेश में कठोर क्यों होते हैं? 
31 : बुद्ध तो मतभिन्नता का भी आदर करते थे, तो उनके अनुयायी मतभेद क्यों पैदा कर रहे हैं?
30 : “गए थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास”
29 : कोई है ही नहीं ईश्वर, जिसे अपने पाप समर्पित कर हम मुक्त हो जाएँ!
28 : बुद्ध कुछ प्रश्नों पर मौन हो जाते हैं, मुस्कुरा उठते हैं, क्यों?
27 : महात्मा बुद्ध आत्मा को क्यों नकार देते हैं?
26 : कृष्ण और बुद्ध के बीच मौलिक अन्तर क्या हैं?
25 : बुद्ध की बताई ‘सम्यक समाधि’, ‘गुरुओं’ की तरह, अर्जुन के जैसी
24 : सम्यक स्मृति; कि हम मोक्ष के पथ पर बढ़ें, तालिबान नहीं, कृष्ण हो सकें
23 : सम्यक प्रयत्न; बोल्ट ने ओलम्पिक में 115 सेकेंड दौड़ने के लिए जो श्रम किया, वैसा! 
22 : सम्यक आजीविका : ऐसा कार्य, आय का ऐसा स्रोत जो ‘सद्’ हो, अच्छा हो 
21 : सम्यक कर्म : सही क्या, गलत क्या, इसका निर्णय कैसे हो? 
20 : सम्यक वचन : वाणी के व्यवहार से हर व्यक्ति के स्तर का पता चलता है 
19 : सम्यक ज्ञान, हम जब समाज का हित सोचते हैं, स्वयं का हित स्वत: होने लगता है 
18 : बुद्ध बताते हैं, दु:ख से छुटकारा पाने का सही मार्ग क्या है 
17 : बुद्ध त्याग का तीसरे आर्य-सत्य के रूप में परिचय क्यों कराते हैं? 
16 : प्रश्न है, सदियाँ बीत जाने के बाद भी बुद्ध एक ही क्यों हुए भला? 
15 : धर्म-पालन की तृष्णा भी कैसे दु:ख का कारण बन सकती है? 
14 : “अपने प्रकाशक खुद बनो”, बुद्ध के इस कथन का अर्थ क्या है? 
13 : बुद्ध की दृष्टि में दु:ख क्या है और आर्यसत्य कौन से हैं? 
12 : वैशाख पूर्णिमा, बुद्ध का पुनर्जन्म और धर्मचक्रप्रवर्तन 
11 : सिद्धार्थ के बुद्ध हो जाने की यात्रा की भूमिका कैसे तैयार हुई? 
10 :विवादित होने पर भी चार्वाक दर्शन लोकप्रिय क्यों रहा है? 
9 : दर्शन हमें परिवर्तन की राह दिखाता है, विश्वरथ से विश्वामित्र हो जाने की! 
8 : यह वैश्विक महामारी कोरोना हमें किस ‘दर्शन’ से साक्षात् करा रही है?  
7 : ज्ञान हमें दुःख से, भय से मुक्ति दिलाता है, जानें कैसे? 
6 : स्वयं को जानना है तो वेद को जानें, वे समस्त ज्ञान का स्रोत है 
5 : आचार्य चार्वाक के मत का दूसरा नाम ‘लोकायत’ क्यों पड़ा? 
4 : चार्वाक हमें भूत-भविष्य के बोझ से मुक्त करना चाहते हैं, पर क्या हम हो पाए हैं? 
3 : ‘चारु-वाक्’…औरन को शीतल करे, आपहुँ शीतल होए! 
2 : परम् ब्रह्म को जानने, प्राप्त करने का क्रम कैसे शुरू हुआ होगा? 
1 : भारतीय दर्शन की उत्पत्ति कैसे हुई होगी?

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