जब देश के गृह मंत्री बोल रहे हैं तो ख़बरदार, डरना सख़्त मना है!

ए. जयजीत, भोपाल, मध्य प्रदेश से, 28/10/2021

अगर देश के गृह मंत्री बोल रहे हैं कि अब किसी को डरने की ज़रूरत नहीं है तो फिर वाक़ई डरने की ज़रूरत नहीं ही होगी। सिद्धान्तत: ऐसा माना जा सकता है। पर ऐसे भी कैसे मान लें? इसकी ज़मीनी स्तर पर पुष्टि भी तो ज़रूरी है। सो, यही पुष्ट करने के लिए रिपोर्टर सीधे पहुँच गया एक आम आदमी के पास। इतिहास गवाह है कि सबसे ज़्यादा डर तो आम आदमी को ही लगता है। इसलिए डर के स्तर के बारे में असली पुष्टि तो आम आदमी से ही हो सकती थी।  

“आप रिपोर्टर ही हो, इस बात की क्या गारंटी?” इधर-उधर देखकर आम आदमी ने पूछा। वह इन्टरव्यू से बचने का कोई न कोई रास्ता तलाश रहा है। बेमतलब का लफड़ा नहीं चाहता। 

“अजी इतना भी मत डरिए। मैं कोई पेगासस का जासूस नहीं हूँ। बस, दो-चार सवाल पूछने हैं। अनुमति हो तो पूछ लूँ।”

“अब अनुमति देने वाले हम कौन! हमसे कौन अनुमति लेता है! पूछ लीजिए। पर नाम मत छापना।” अन्तत: नाम न छापने की शर्त पर आम आदमी चर्चा के लिए राजी हुआ।  

“हमारे केंद्रीय गृह मंत्रीजी ने कहा है कि अब लोगों को डरने की ज़रूरत नहीं है। कश्मीर में उन्होंने अपना बुलेटप्रूफ ग्लास तक निकाल फेंका था। सो, जब देश के गृह मंत्री ऐसा कह रहे हैं तो कुछ तो डर कम हुआ होगा?” रिपोर्टर अपने मूल सवाल पर आया। 

“भाई साहब, कहाँ मुझ जैसे दो टके के आम आदमी के डर से गृह मंत्रीजी की निडरता की तुलना कर रहे हो! हम आम लोग तो पैदाइशी ही डरे हुए होते हैं।”

“वो तो देख ही रहा हूँ। आप कुछ काँप से रहे हैं। कहीं से कुछ ताजे डरे हुए लगते हो।”

“क्या बताएँ। कल रात को मोहल्ले में कुछ वर्दीवाले आए थे। किसी चोरी की गाड़ी के बारे में आम लोगों से तफ्तीश कर रहे थे, इतनी भयंकर वाली कि क्या बताएँ। बस, उसी डर के थोड़े-बहुत अवशेष अब भी बाकी हैं। इसीलिए पैर काँप रहे हैं।”

“पर आप तो कानून की इज्ज़त करने वाले आम आदमी हो। आपको क्या डर?”

“भाई साहब, कानून की इज्ज़त करने वाले को ही वर्दी से डरना पड़ता है। जो कानून को अँगूठे पर लेकर घूमते हैं, बस वे ही नहीं डरते।” बोलने में ही सही, आम आदमी ने पहला साहस दिखाया।

“हाँ, वर्दी से तो हर आम आदमी का डरना लाज़िमी है, नहीं तो वर्दी के पास काम ही क्या रह जाएगा। ख़ैर, बाकी मामलों में तो आप निडर होंगे ही।” 

“अरे कहाँ, उस दिन बिजली का बिल भरने में दो दिन लेट हो गया तो विभाग से दो कर्मचारी आ गए। डराने लगे कि चाय-पानी की व्यवस्था नहीं की तो चार-दिन अँधेरे में रहना होगा। तो डरकर चाय-पानी की व्यवस्था करनी पड़ी। अब क्या करें! करना पड़ता है।”

“कोई बात नहीं, रिश्वत देने पर आपका बस नहीं। पर इस बात से तो खुश होते होंगे कि इस मामले में आप ख़ुद तो बिंदास हो, अच्छे-भले ईमानदार हो। यह भी कम साहस का काम नहीं है।”  

“ऐसा भी नहीं है। ऊपर वाले अफ़सरों के डर से थोड़ी बहुत रिश्वत लेनी पड़ती है। शुरू में मैंने मना किया तो बड़े साहब ने चमका दिया, तू स्साले, रिश्वत न लेकर पूरे सिस्टम की वाट लगाना चाहता है? नौकरी करनी है कि नहीं? उसके बाद से डरकर रिश्वत लेने लगा।”

“अच्छा, पूजा करते हो या फिर…”। रिपोर्टर को चर्चा को सिस्टम पर से हटाकर धर्म पर लाना ज़्यादा सुविधाजनक लगा। यह सवाल इसलिए भी परम आवश्यक था ताकि सामने वाले की धर्म-जाित का पता लग सके तो कुछ सवाल भी उसी के इर्द-गिर्द पूछे जा सकें। 

“साहब, ज़रूरत पड़ने पर पूजा-पाठ ही करता हूँ। कभी-कभी मन्दिर भी चला जाता हूँ।”

“चलो, कम से कम धर्म के मामले में आपको इस देश में कोई डर नहीं है। यह भी कम बात नहीं है।” 

“अरे क्या ख़ाक डर नहीं है!”

“क्यों?”

“चार दिन पहले की बात है। आप जानते ही हो कि मैं नियम-क़ायदों से डरने वाला आदमी हूँ। सामने वाली सड़क के बीचों-बीच कुछ गायें खड़ी थीं। ट्रैफिक को रोक रही थीं। वैसे उसमें उन बेचारी गायों का कोई दोष नहीं था। तो मैंने सोचा कि चलो उनसे हटने का आग्रह कर लेता हूँ। मैं तो उन्हें बड़े ही प्यार से वहाँ से हटने का अनुरोध कर रहा था। लेकिन पता नहीं कहाँ से चार-छह गुंडे आ गए। वैसे प्योर गुंडे नहीं थे, मतलब गुंडे टाइप के थे। बस हाथों में लिए डंडों से गुंडे लग रहे थे। उन्हें लगा मैं गाय माताओं के साथ दुर्व्यहार कर रहा हूँ।”

“पर आप तो पूजा-पाठी हो। आपको क्यों डरना चाहिए? बोल देते।” 

“वो क्या था, उस दिन मेरी हल्की सी दाढ़ी थी। तो उन्हें ग़लतफ़हमी हो गई। कहने लगे- स्साले पहचान दिखा। अब मैं तो जनेऊ भी नहीं पहनता। एक कहने लगा- नंगा कर देते हैं स्साले को। अभी दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा। पर तभी पड़ोस से गुजरने वाले किसी परिचित ने आवाज़ लगा दी- शर्मा जी क्या हो रहा है? बस, उसी से बच पाया।”  

“तो आप उस दिन भीड़ की मारपीट से बच गए, मतलब। उसके बाद से ही अब दाढ़ी साफ कर ली। लगता है, जनेऊ भी पहन लिया है। अच्छा है, अब डर कुछ कम हो सकेगा। चार दिन पहले भोपाल में एक वेब सीरिज को लेकर भी हंगामा हुआ था। आपका छोटा मामला था, पर वह बड़ा मामला था तो ख़बर बन गई। पढ़ी ही होगी न?” 

“बिल्कुल नहीं, मैं उस खबर में झाँका तक नहीं। क्या पता अख़बार से निकलकर ही दो-चार गुंडे, आई मीन गुंडे टाइप के लोग बाहर आ जाएँ और जब तक अपनी पहचान बताऊँ, दो-चार डंडे चला ही दें। अब तो ऐसा डर भर गया है कि क्या बताऊँ!”  

“पर भाई, वे तो धर्म के रक्षक हैं। हमारे-तुम्हारे धर्म की रक्षा करने के लिए ही तो उन्हें डंडे उठाते पड़ते हैं। उनसे डरिए नहीं, उनका सम्मान करना सीखिए। अब देखिए, आगे से मध्य प्रदेश में जिस भी वेब सीरीज़ या फिल्म की शूटिंग होगी, फिल्म निर्माता अपनी स्क्रिप्ट पहले सरकार को भेजेंगे। सरकार जो भी सुधार करने का कहेगी उसमें, उसका पूरा सम्मान करेंगे। आप भी सम्मान करना सीखिए। बेमतलब डर का नाम देकर देश को बदनाम न कीजिए।” रिपोर्टर कभी-कभार इंटरव्यू पूछते-पूछते ज्ञान भी देने लग जाते हैं। 

“जी सर, कोशिश करूँगा। पर अभी तो टाइम हो गया। अब प्लीज़ ख़त्म करते हैं। लेट हो गया तो पत्नी की दो-चार बातें सुननी पड़ेंगी।”

“मतलब घर भी डरमुक्त नहीं! कितना डरेंगे आप?” 

“बताया न, आम आदमी पैदा ही डरने के लिए होता है।”

“बस एक आख़िरी सवाल। कभी तो आप दूसरों को डराते होंगे? सालों में कभी-कभार?”

“हाँ जी, केवल तभी जब नेता वोट माँगने आते हैं। हालाँकि जाति-धर्म के अनुसार वोट करने का एक दबाव हम पर रहता है। फिर भी तब लगता है कि कम से कम एक ताक़त हमारे पास है।”

“अच्छा है। इस ताक़त को उस समय के लिए बचाकर रखिए। जब तक उनमें इस ताक़त का डर रहेगा, तब तक डर का सन्तुलन बना रहेगा।” 

रिपोर्टर ने अपने इस अन्तिम ज्ञान के साथ इन्टरव्यू ख़त्म किया और आम आदमी सरपट घर की ओर दौड़ पड़ा।
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(ए. जयजीत देश के चर्चित ख़बरी व्यंग्यकार हैं। उन्होंने #अपनीडिजिटलडायरी के आग्रह पर ख़ास तौर पर अपने व्यंग्य लेख डायरी के पाठकों के उपलब्ध कराने पर सहमति दी है। वह भी बिना कोई पारिश्रमिक लिए। इसके लिए पूरी डायरी टीम उनकी आभारी है।)

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