मेरे 18,424 रुपए कहाँ गए? जमीन खा गई या आसमान निगल गया?

शुभम ठाकुर, रायपुर, छत्तीसगढ़ से, 21/ 9/2020

मैंने 17 अगस्त 2020 को फ्लिपकार्ट से एक मोबाइल फ़ोन मँगवाया। सामान बताए गए पते पर पहुँचने के बाद भुगतान करने (कैश ऑन डिलीवरी) का वहाँ कोई विकल्प नहीं था। इसलिए एकीकृत भुगतान व्यवस्था- यूपीआई (Unified Payments Interface) के ज़रिए भुगतान किया। बाद में किसी वजह से 20 अगस्त को मैंने मोबाइल का वह ऑर्डर रद्द कर दिया। उस समय फ्लिपकार्ट की ओर से बताया गया, “आपके पैसे वापस कर दिए गए हैं।” मैंने पता लगाया तो मेरे खाते में पैसे नहीं पहुँचे थे। तब मैंने सोचा कि अमूमन ऐसा होता है। कुछ दिन इन्तज़ार करना चाहिए।

इसके बाद भी जब पैसे नहीं आए तो 14 सितम्बर 2020 को फ्लिपकार्ट के साथ ही मैंने भारतीय स्टेट बैंक की तात्यापारा, रायपुर शाखा के कर्मचारियों से भी बात की, जहाँ मेरा खाता है। उस समय फ्लिपकार्ट की ओर से बताया गया, “आपका पैसा 24 अगस्त को खाते में भेज दिया गया था। हमारी तरफ से कोई समस्या नहीं है। आपको बैंक से ही बात करनी चाहिए।” जबकि तात्यापारा के शाखा प्रबन्धक ने कहा, “खाते में पैसे आए ही नहीं हैं। हम इसमें कुछ नहीं कर सकते। फिर भी आप चाहें तो एक अर्ज़ी लिख दें।” तो मैंने आवेदन लिख दिया। बैंक से उसकी पावती ले ली।

इधर मैंने फ्लिपकार्ट के कर्मचारियों से फिर बात की। इस बार उन्होंने कहा, “आप हमें 17 अगस्त के बाद हुए लेन-देन का विवरण (Bank Statement) भेज दें।” उनकी बात मानकर मैंने वह भी कर दिया। इसके बाद फ्लिपकार्ट की ओर से मुझे एक और मेल भेजा गया। इसमें बताया गया, “बैंक में Grievance cell (शिकायत प्रकोष्ठ) होता है। आपको वहाँ शिकायत करनी चाहिए।” इस पर मुझे समझ नहीं आया कि अगर यही करना था तो फिर मुझसे फ्लिपकार्ट की ओर से बैंक के लेन-देन का विवरण क्यों माँगा गया था? खैर…

मैं फिर बैंक गया। वहाँ शाखा प्रबन्धक से कहा, “मुझे आपके grievance cell में शिकायत करनी है।” इस पर शाखा प्रबन्धक की प्रतिक्रिया ऐसी थी, मानो मैंने किसी चिड़िया का नाम ले दिया हो। उन्हें पता ही नहीं था कि grievance cell क्या होता है। एक और बात, मैंने चार दिन पहले जो अर्ज़ी उन्हें दी थी, वह उस समय भी उनकी टेबल पर उसी हालत में पड़ी हुई थी। साफ समझ आ रहा था कि उन्होंने उसे देखने की भी तकलीफ़ नहीं उठाई है। तिस पर उन्होंने मुझसे फ्लिपकार्ट के मेल की प्रति और माँग ली। इस आश्वासन के साथ कि, “देखते हैं, क्या हो सकता है।”

तो फिलहाल स्थिति ये है कि शाखा प्रबन्धक तथा फ्लिपकार्ट वाले अभी देख रहे हैं कि आगे क्या हो सकता है। और मैं नरेन्द्र मोदी सरकार के ‘डिजिटल इंडिया’ और ‘कैशलेस इकॉनमी’ (नगदमुक्त अर्थव्यवस्था) का वर्तमान, भविष्य देख रहा हूँ। साथ ही इस गुत्थी को सुलझाने की कोशिश भी कर रहा हूँ कि आख़िर “मेरे 18,424 रुपए कहाँ गए? जमीन खा गई या आसमान निगल गया?”

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(शुभम पेशे से पत्रकार हैं। युवा हैं। भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी), दिल्ली से पढ़े हुए हैं। उन्होंने यह किस्सा फेसबुक पर साझा किया है। वहाँ से उनकी अनुमति से #अपनीडिजिटलडायरी पर लिया गया है।)

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