समीर शिवाजी राव पाटिल, भोपाल मध्य प्रदेश
आश्चर्य लगे किंतु यह सत्य है कि जेन-जी में भले ही सरकारों को उखाड़ फैंकने की ताकत हो, इसकी अपने अाप में कोई शख्सियत है नहीं। यह आयातित आकांक्षाओं और अभिप्साओं भरी एक पीढ़ी की औपनिवेशिक संवेद्यता से उपजे आक्रोश का गुबार भर है। जेन-जी जिस परिवर्तन की बात करता है वह एक लाड़-प्यार, सुविधा, सुरक्षा और संसाधनों पर हक के प्रति अतिसक्रिय जागरूकता है। बदलाव के लुभावने सब्जबाग दिखा कर हुजूम जमा करने की ताकत है लेकिन कोई विधायी रचनात्मक समझ या दिशा नहीं। अलग – अलग योग्यता और पात्रता वाले किरदारों की असंतुष्टि को स्वर देकर उनसे कुछ हरकतें करवाने की तरकीब तो है, सबको एक न्यायसंगत सह-अस्तित्व वाला आधार देने की कोई भूमिका नहीं। अफसोस की बात यह है कि उसके सामने कि सत्ताधारी पूर्ववर्ती पीढ़ी खुद औपनिवेशिक भ्रष्ट अनैतिकता और नीतिविहीन दर्शन के प्रभाव से शिथिल है।
जेन-जी का विरोध अपनी इस पैतृकता से है, जिससे लड़-झगड़ कर अपनी आकांक्षाओं को साकार करना चाहती है। समस्या साफ है कि जेन-जी और उनके मम्मी-पापा की पीढ़ी जिस औद्योगिक और श्रमरहित परिवेश में समता-समानता के साथ भोग-ऐश्वर्य समृद्धि चाहते हैं वह तो सिद्धांतत: ही असंभव है। जंतरमंतर पर जमा युवाओं के हुजूम का ठीक से अध्ययन करें तो वहां मौजूद विरोधभास सारे आंदोलन की बखिया उधेड़ कर रख देते हैं। यहां बिहार, महाराष्ट्र से आए दलित समाज के गरीब और संजीदा छात्र हैं तो नीला गमछे लपेटे दम भरते चंद्रशेखर रावण के दबंगाई करते युवा है। पंजाब – हरियाणा से आ रहे कुछ कर गुजरने की तलाश वाले जट-सिख युवा घूम रहे हैं तो दिल्ली विश्वविद्यालय जेएनयू में अपने भविष्य की कहानी गढ़ने के लिए बंगाल, केरल, तमिलनाडु से आये छात्र है। एसएफआई आईसा से जुड़े नेता-कार्यकर्ता हैं, मुसलमान अधिकारों के पैरोकार कार्यकर्ता और लैंगिक स्वच्दछंदता के लिए लड़ते तृतीय-लिंगी युवा हैं। इस सबके बीच कहीं खाेया नीट जैसी परीक्षाओं में भ्रष्टाचार से पीड़ित युवा है। सबकी अपनी जमीन-अपना आसमान, अपने-अपने सच है। ओर सबको जोड़ने वाली ताकत है अभिप्सा।
यही कारण है कि दुनिया में जेन-जी के सफल प्रयोग का ट्रेक रिकॉर्ड भी लक्षणीय है। सहोदर पड़ोसी नेपाल का मसला लें, जेन-जी ने जनआक्रोश के बल पर एक बेहद अप्रत्याशित चुनाव परिणाम में निर्वाचित सरकार को हटाकर अपनी सरकार बनवा ली। अभी सरकार काे एक साल भी नहीं हुआ है और और जेन-जी के मुख्तलिफ तबकों का मोहभंग शुरू हो गया है। जेन-जी सरकार के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन, आगजनी और प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह को हटाने की मांग उठना शुरू हो गई है। लेकिन इसमें कुछ भी अप्रत्याशित नहीं। जिस दिशाहीन और तर्करहित भावनाओं से वह युवाओं को उद्वेलित किया जा रहा है उसका परिणाम इससे अलग तो नहीं ही हो सकता। बांग्लादेशी जेन-जी ने इस्लामी चरमपंथियों के हाथों खेलकर शेख हसीना को हटाने के लिए आंदोलन किया तो उसे विपक्षी दल बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी ने भी समर्थन किया। लेकिन कोई डेढ़ साल के अंतराल के बाद शेख हसीना की अवामी लीग को बाहर रख कर चुनाव हुए तो भ्रष्टाचार और हिंसा के आरोप झेल रही बीएनपी जीती और खालिदा जिया के निर्वासित लड़के तारिक रहमान प्रधानमंत्री बन गए। श्रीलंका, केन्या, मेडागास्कर, पेरु और फिलीपींस में जेन-जी करतब उन्हें जड़रहित विखंडित युवाओं की ताकत का विद्ध्वंस खेल है। यह षड्यंत्र है जिसमें लोकतंत्र और अभिव्यक्ति के नाम पर लोकतांत्रिक सत्ता को हाइजैक करना है।
भारत में इस प्रहसन की शुरुआत प्रधान न्यायाधीश के मुख से स्खलित एक शब्द कॉकरोच से की गई। वही टूलकिट एक्टिवेट की गई। संदर्भ से विलग कर रातों-रात तर्क और दल की उत्पत्ति की गई। कॉकरोच ‘जस्टिस’ पार्टी का प्रदर्शन शुरु हुआ, दुनिया के मीडियाकर्मी वहां मंडराने लगे। कॉकरोचवाद की महानता युवाओं के के प्रदर्शन की महानता और क्रांतिकारी दर्शन पर देश-विदेश के अखबार और सोशल मीडिया पट गया। तैयारियां पूरी होते तक, सब दम साधे बैठे थे कि अब यह मुहिम जोर पकड़े और और देश में एक नई क्रांति का आगाज किया जा सके। जंतर-मंतर पर धरना शुरू हुआ, भूख हड़ताल के बाद संसद की घेराबंदी और उग्र प्रदर्शन, हिंसाचार का माहौल, आंदोलन को दूसरे जगह फैलाना, राजनीतिक दलों के सहयोग से उसे बढ़ाने की कवायद जोरों पर है।
साइबर एक्सपर्ट्स की माने तो इन जेन –जी प्रयोगों के पीछे विदेशी सत्ताओं के हाथों के निशान साफ दिखते हैं। भारत के घटनाक्रम में मामलों को बढ़ाने वाले विदेशी हैंडलर्स के साथ फेसबुक, वॉट्सएप, इंस्टाग्राम के प्रमोशनल स्ट्रेटेजिस सामने आ रही है। विकासशील और रणनीतिक सोच के स्तर पर कमजाेर देशों में एक नए अत्याधुनिक तकनीकी और बनावटी युद्ध के प्रयोग हो रहे हैं। जिसमें बेहद मासूम, संजीदा और मानवीय दिखने वाले नैरेटिव के पीछे विध्वंसक अराजकता फैलाकर अपने हितों को साधने की रणनीति है। जहां सोशल मीडिया कृत्रिम आक्रोश, लाइक्स और कमेंट्स, इंफ्लुएंसर्स के चलाए ट्रेंड्स स्वयं परिचालित एलगोरिदम की लहरों पर एक आभासी दुनिया पैदा करते हैं। यह उन औपनिवेशिक वैश्विक सत्ताओं के तकनीकी औजारों की पैठ और गुलाम रहे देशों का रणनीतिक भोंदूपन उजागर करती है। यह बात खास ध्यान देने की है कि चीन तो सिर्फ बदनाम है, आस्ट्रेलिया, फ्रांस, डेनमार्क, स्पेन और ब्रिटेन में 16 साल से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया से दूर कर दिया गया है।
अमेरिका, इटली, स्लोवानिया, पोलैंड आदि भी इसी रास्ते पर चल रहे हैं। जबकि की दुनिया भर के समझदार वैज्ञानिक और समाजशास्त्री इनसे बच्चों और युवाओें को बचाने की बात करते हैं। भारत, पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका जैसे गुलाम मानसिकता वाले देशों का न्यायिक, राजनीतिक और तथाकथित बौद्धिक नेतृत्व किसी अनजान ग्रह पर प्रचलित बच्चों- युवाओं की अभिव्यक्ति और स्वतंत्रता के अधिकारों के प्रति संकल्पित दिखते हैं। साधारण घर-परिवारों के दु:ख और पीड़ाओं से परे रहता है, या कि बड़े कारपोरेशन्स की ताकत कमजर्फ चरित्र वालों के भ्रष्टाचार के हमाम में घसीट लेती है। शायद इसका कारण यह है कि इन देशों में यथार्थ आत्मसम्मान बचा नहीं है। तभी तो अनुशासनहीन युवाओं की उद्दंड अराजकता को लोक-आख्यान में सराहा जाता है, उसका उत्सव मनाया जाता है और बेगैरत मानसिकता वाला नेतृत्व उनसे समझौता कर किसी तरह खेल चलाते रहने के लिए बेताब दिखता है।
इसे पूरे खोखली नौटंकी से फायदा उठाने को तत्पर हमारा मौजूदा राजनीतिक परिवेश देश के बौद्धिक और नैतिक पतन का परिचायक ही, यह बताता है कि सुधारों की आयातित समझ मेंहमारा पूरा न्याय-शासन व्यवस्था और उसका नेतृत्व आडंबरपूर्ण मानवता, समानता और समावेश का प्रदर्शन कर कर्तव्य की इतिश्री कर लेता है। हमारी देश-समाज की जमीनी परिस्थितियों पर ज्यादातर तकरीरे दिखावटी होती हैं। मीडिया में प्रचारित सच झूठ से हम आप प्रभावित ही इसलिए होते है कि हमारे निजी जीवन से धर्म और नीति का दिशासूचक यंत्र ही गायब है। आज भारत आधुनिकता की अधार्मिक नैतिकता से अभिशिप्त है। जब तक इस पाप का प्रायश्चित्तपूर्वक मोचन नहीं करेगा, उसके अभ्युदय की कोई संभावना नहीं।
