अनुज राज पाठक, दिल्ली
तमिलनाडु के नेता उदयनिधि स्टालिन ने हाल ही में कहा, “सनातन को नष्ट किया ही जाना चाहिए, क्योंकि यह बाँटता है।” मुझे उनके इस कथन से जिज्ञासा पैदा हुई कि क्या कारण है कि वह ऐसा कह रहे हैं। उदयनिधि पहले भी ऐसा कहते रहे हैं। सत्ता में रहने पर सनातन का विरोध करना समझ में आता है कि वर्ग विशेष को प्रसन्न करना होगा। लेकिन सत्ता छिन जाने के बाद भी यह आत्मविश्वास थोड़ा आश्चर्यजनक है।
उदयनिधि के इस आत्मविश्वास के पीछे के कारण को विस्तार जानने की जिज्ञासा ने मुझे भारत में ईसाइयत के प्रसार, प्रचार और उद्देश्य के कारणों पर अध्ययन करने के लिए प्रेरित किया। इस अध्ययन से कुछ गंभीर जानकारियाँ सामने आईं। यह भी स्पष्ट हुआ कि उदयनिधि की सोच के पीछे कोई सामान्य कारण नहीं हैं। भारत में ईसाइयत को मानने वाले प्रभावशाली लोग जब से ईसाइयत का प्रभाव शुरू हुआ, तब से ऐसा ही सोचते रहे हैं।
उदयनिधि और उनका परिवार उन लोगों में शामिल है, जो अपना धर्म बदलकर हिन्दू से ईसाई बन गए। हालाँकि गौर करने लायक यह भी है कि उन्होंने अपनी हिन्दू पहचान नहीं छोड़ी। बस, उपनाम ईसाइयत की सूचना देने वाला साथ में जोड़ा है। देश के कई हिस्सों में यह चलन आम तौर पर देखा जा सकता है। उदयनिधि के परदादा ने संभवत: ईसाइयत को अपनाया था।
प्रारम्भ से लगभग 20 वर्षों के अंतराल में ही भारत में ईसाइयत अपने पैर पसार चुकी थी। भारत हमेशा से एक सहिष्णु देश रहा है, ईसाइयत के मामले में भी भारत ने अपने स्वाभावनुकूल उस नए पंथ को जगह दी। ईसा मसीह के प्रारम्भिक शिष्यों में सेंट थॉमस 52 ईस्वी में केरल के मालाबार क्षेत्र में सात चर्चों की स्थापना कर चुके थे। थॉमस भारत आने के बाद यहीं रहे और मृत्यु के बाद उन्हें चेन्नई में दफनाया गया।
मतलब ईसाइयत से भारतीय पहले ही परिचित हो चुके थे। भारत में विविध पूजा पद्धतियों को मानने वाले अनेक मत है, इसलिए भारत के लोगों के लिए ईसाइयों की पूजा पद्धति से भी कोई समस्या नहीं रही। लेकिन जैसा कि विश्व सभ्यता के में हिंदू धर्म से इतर अन्य मतों का इतिहास रहा है कि वे अपने मत का लगातार प्रसार करते हैं। ईसाइयत ने भारत में भी यही किया, एक हाथ में शक्तिशाली तलवार और दूसरे हाथ में सलीब।
जब 1502 में वास्को डी गामा दूसरी बार भारत आया, तो वह भारत के पश्चिमी तट पर ईसाई जाति को बसा देख आश्चर्य में पड़ जाता है। उन ईसाइयों ने वास्को डी गामा का जोरदार स्वागत किया। साथ ही मुसलमानों के विरुद्ध सहायता की याचना की। यहाँ दोनों मत अपने प्रसार को बढ़ाने के कारण परस्पर विरोध में हैं। इस याचना के फलस्वरूप पुर्तगाली बेड़े के साथ बड़ी संख्या में पादरियों की खेप भी भारत पहुँची और भारत में गोवा ईसाइयों का कार्यक्षेत्र और प्रयोग क्षेत्र बन गया। इसके साथ ही भारत ईसाई पादरियों की प्रयोगशाला में परिणत हो गया।
अलबत्ता, इन पादरियों से धर्म परिवर्तन में अच्छी प्रगति को न पाकर पुर्तगाली शासक ने जैसूइट पादरियों को भारत भेजा। सन् 1541 में फ्रैंसिस जेवियर भारत आए। उन्होंने अपने कार्यकाल में 60,000 भारतीयों की ईसाई बनाया। फिर भी, जेवियर इससे संतुष्ट नहीं हुए। लिहाजा, उनके आग्रह पर पुर्तगाली शासक ने आदेश जारी किया, “समस्त मूर्तियों को तलाश किया जाए और उन्हें नष्ट किया जाए। कोई किसी मूर्ति के बनाने का साहस करे, उसे कठोर दण्ड दिया जाए और कोई किसी ब्राह्मण को सुरक्षा दे अथवा उसकी रक्षा करे उसको अपराधी माना जाए।” (पृष्ठ 54, हिस्ट्री ऑफ मिशंस,रिच्टर)।
फिर जेवियर के बाद एक अन्य पादरी रॉबर्ट डी निबोली ने एक अन्य तरकीब निकाली। उन्होंने साधुओं की तरह गेरूए वस्त्र पहनना और माथे पर चन्दन का तिलक लगाना शुरू किया। ऐसी वेशभूषा के साथ ब्राह्मणों की बस्ती में रहना शुरू किया। साथ ही, लिखित प्रमाण प्रस्तुत किए कि उनके पूर्वज पुरातन आर्यावर्त से विदेश गए थे। उन्होंने आश्वस्त किया, “कोई व्यक्ति ईसाई बनने से अपनी जाति, रीति-रिवाज अथवा प्रतिष्ठा का परित्याग नहीं करता” (क्रिश्चियन एण्ड क्रिश्चियनिटी इन इण्डिया-पाकिस्तान, पृष्ठ 65-70)।
उन्होंने संस्कृत में “क्रिश्चियन संध्यावादनं” पुस्तक ब्राह्मण से ईसाई बने लोगों के लिए लिखी। साथ ही, घोषित किया कि वह प्राचीन ऋषियों का संदेश ही लाया है। उन्होंने कहा, “मैं केवल हिन्दुओं के लिए लुप्त हुई धार्मिक पुस्तक पंचम वेद अर्थात् ” यीशुर्वेद” का पुनरुद्धार कर रहा हूँ।” इस तरह उनका यह कार्य तब तक चलता रहा, जब तक प्रोटेस्टेंट पादरियों ने भंडाभोड़ नहीं किया (हिस्ट्री ऑफ मिशंस, पृष्ठ 67)।
हालाँकि उससे पहले 1607 से 1611 तक रोमन गोत्र का यह ब्राह्मण संन्यासी बनकर 27 ब्राह्मणों को ईसाई बनाता है साथ की लगभग 1 लाख लोगों को ईसाई धर्म में लाने में सफल हो जाता है। इस तरह ऐसे तमाम प्रयासों से सन्1700 तक भारत में छह लाख लोग ईसाई बन चुके थे।
भारत में ईसाइयत के बढ़ते प्रचार और धर्मांतरण के भयावह उदाहरणों को जानने के लिए स्वाधीनता के बाद 1953 में मध्यप्रदेश की कांग्रेस सरकार ने चर्च द्वारा धर्मांतरण की समस्या का गहन अध्ययन कराया। इसके लिए न्यायमूर्ति भवानी शंकर नियोगी की अध्यक्षता में एक जाँच समिति बनी।इस समिति में एस के जॉर्ज नामक ईसाई विद्वान भी थे। समिति ने मध्यप्रदेश में पहली बार जनजातियों के धर्मांतरण के लिए ईसाई मिशनरियों द्वारा हथकण्डों का प्रमाणिक विवरण प्रस्तुत किया। नियोगी समिति ने पाया कि चर्च एक अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र का हिस्सा है, उसके द्वारा धर्मांतरण का परिणाम राष्ट्रांतरण में होता है। समिति अपनी रिपोर्ट में कहती है, “भारतीय संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता की घोषणा के बाद भारत में ईसाइयत का प्रचार प्रबल हो गया। मिशनरियों के लिए तो मानो द्वार ही खुल गया। प्रेस, फिल्म, रेडियो आदि अनेक साधनों के साथ मिशनरियों के दल के दल भारत भेजे जाने लगे।”
गाैर करने लायक है कि उदयनिधि के दादा जी करुणानिधि भी लेखक और साहित्यकार थे। उन्होंने अपने पुत्र का नामकरण रूस के नास्तिक नेता के नाम स्टालिन रखा। खुद नास्तिक का चोला ओढ़ने वाला ईसाई ही है। अर्थात् नास्तिकता का आवरण ईसाइयत के प्रसार का एक तरीका भर है, जैसे कि निबोली ने साधुओं का रूप बनाकर ईसाइयत का प्रसार किया। परंतु ईसाइयत के प्रसार में आज भी सबसे बड़ी बाधा भारत में सनातन का होना है। इतने वर्षों बाद भी आज सनातन जीवित है, जबकि पूरा विश्व ईसाई और मुस्लिम दो पक्षों में बँट चुका है। यह सनातन दोनों के लिए सदियों बाद आज तक एक संयुक्त समस्या है। यही कारण है कि दोनों सनातन को नष्ट करने की बातें करते हैं। गौरतलब है कि तमिलनाडु में अभी-अभी सत्ता में आई अभिनेता टी विजय जोसेफ की पार्टी के एक मुस्लिम विधायक मुस्तफा ने उदयनिधि के बयान का समर्थन किया है।
ऐसे यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि ईसाई मत को मानने वाले राज्य के प्रतिनिधि, जिन्हें अधिकांश हिन्दू जनता ने अपना वोट देकर विधानसभा में पहुँचाया है, वे उसी हिंदू जनता की मूल चेतना और जीवन धारा को नष्ट करने का साहस कर रहे हैं। क्यों? क्योंकि सनातन को मानने वालों की मूर्खता है कि वे अपने हित-अहित नहीं देख पा रहे हैं। वरना क्या बड़ी बात कि हम उदयनिधि जैसे नेताओं का मंतव्य न समझ पाते। वह आखिर कोई नई बात तो नहीं कर रहे हैं। बल्कि वही कह रहे हैं, जो एक अंतर्राष्ट्रीय षड्यंत्र के तहत किए जाने की योजना है।
इसका प्रमाण देखिए, जून 1948 में फैलोशिप ऑफ इंटरनेशनल मिशनरी सोसायटी कांफ्रेंस हुई थी, उसमें एलेक्जेंडर मकलेश ने कहा, “अभी हाल में हमारे भारतीय ईसाई नेताओं ने एक योजना बनाई है। इसके अंतर्गत छह लाख भारतीय गाँवों को अगले 10 वर्षों में ईसाई बनाने का संकल्प लिया है। हमारे पास भौतिक संसाधनों की कमी नहीं है, हम धर्म परिवर्तन का कार्य भलीभाँति करने में समर्थ होंगे।”
इस बात में 100 प्रतिशत सच्चाई भी है। वरना राजनीति में सर्वथा अनुभवहीन एक धर्मांतरित ईसाई अभिनेता टी जोसेफ विजय की नई-नवेली पार्टी भला पहली ही बार में तमिलनाडु जैसे बड़े राज्य में सरकार बनाने में सफल कैसे हो जाती? यह इस बात सीधा-सीधा प्रमाण है कि ईसाई मिशनरियाँ अब सीधे सत्ता की डोरियाँ अपने हाथ में लेकर अपना अभियान चला रही हैं। खुलकर संसद और विधानसभाओं में बैठकर धर्मांतरण कराने की घोषणा कर रही हैं। तो क्या अब भी हम भारतीयों को सचेत नहीं होना चाहिए? इनमें खिलाफ एकजुट नहीं होना चाहिए? सोचिए।
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(नोट : अनुज राज पाठक दिल्ली में संस्कृत विषय के शिक्षक हैं। #अपनीडिजिटलडायरी की स्थापना से ही साथ जुड़े सदस्यों में शामिल हैं। अच्छे लेख और कविताएँ लिखते हैं। कभी-कभी श्रृंखलाबद्ध लेखन भी करते हैं।)
