वैश्विक महामारी ‘कोरोना’ के इस दौर में देशव्यापी तालाबन्दी है। इसलिए शादी-ब्याह भी नहीं हो रहे हैं। वरना अप्रैल, मई, जून के महीनों में तो…
View More मई माह, कभी बारात की सामूहिक मेहमाननवाज़ी का महीना भी होता था, याद है?Author: Apni Digital Diary
बेटा! मेरे नाम की चिट्ठी भेज दे, अब भगवान मुझे बुला ले
ये एक माँ के बोल हैं। सुनकर मन खिन्न रहा दिनभर। समझ नहीं आया कि क्या करूँ, किससे कहूँ। कैसे मदद करूँ। उस माँ की,…
View More बेटा! मेरे नाम की चिट्ठी भेज दे, अब भगवान मुझे बुला लेमनुष्य का सार है ‘रस’, नहीं तो जीवन ‘नीरस’
जीवन ‘चाहना’ का नाम है। ‘चाहना,’ वस्तुत: रस की होती है। और ‘रस’ हमारे हर ज्ञान का आधार बनता है। उदाहरण के लिए, सूर्योदय पूर्व…
View More मनुष्य का सार है ‘रस’, नहीं तो जीवन ‘नीरस’विज्ञान ‘चाँद’ को धरती पर ले आया पर धरती की ही गुत्थियाँ न सुलझा पाया
दो दिन पहले दो ख़बरें पढ़ीं। दोनों दिलचस्प। विज्ञान के दो दीगर पहलुओं से जुड़ी हुईं। साथ ही हमें सोचने पर मज़बूर करती हुईं भी।…
View More विज्ञान ‘चाँद’ को धरती पर ले आया पर धरती की ही गुत्थियाँ न सुलझा पायाटुकड़ों में बँटे हम ‘आत्मनिर्भर’ हों तो कैसे?
एक किस्सा है। हम में से कई लोगों ने थोड़े-बहुत फ़र्क के साथ बचपन से ही सुना होगा। एक बार हमारे शरीर के अंगों में…
View More टुकड़ों में बँटे हम ‘आत्मनिर्भर’ हों तो कैसे?क्या कोरोना और कश्मीर के बीच भी कोई सम्बन्ध हो सकता है?
सोचने और समझने में थोड़ा अजब लग सकता है। लेकिन सच हो तो शायद अचरज न लगे। मामला कोरोना और कश्मीर के बीच सम्बन्ध का…
View More क्या कोरोना और कश्मीर के बीच भी कोई सम्बन्ध हो सकता है?लगता है, जैसे हम समाज में हैं पर ‘समाज’ कहीं नहीं है!
किस्सा 1967-68 का है। जाने-माने व्यंग्यकार प्रेम जनमेजय के संस्मरण के रूप में यह किस्सा ‘दैनिक भास्कर’ अख़बार के फीचर पेज ‘साहित्य रंग’ में प्रकाशित…
View More लगता है, जैसे हम समाज में हैं पर ‘समाज’ कहीं नहीं है!माँ कहती हैं- ये खदेड़े गए हैं, नहीं तो जान पर जोख़िम लेकर कोई यूँ नहीं निकलता!
उस रोज़ कामगारों के रेले-दर-रेले से गुज़रते हुए सिर्फ़ मैं ही बेचैन नहीं था। मेरे साथ गाड़ी की पिछली सीट में सवार माँ भी यह…
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