पूछती हो, तुम्हारा प्रेम क्या है? सुनो…

समीर शिवाजीराव पाटिल, भोपाल

पूछती हो, तुम्हारा प्रेम क्या है? सुनो! 

तुम जानती हो मुझे शायद मुझसे बेहतर ही।
चंद शौक, यादों और नापसंदगियों की दास्तां है।।

और तुम भी मुझसे कहीं, कभी, कुछ अलग तो नहीं।
वही बेज़ा जिद, बेखुदी, सब वही नादानियाँ हैं।।

मैं और तुम दो हदें हैं जिनके बीच एक वादा है।
हमारा जो रिश्ता है, मेरा-तुम्हारा समझौता है।।

हमारे दरमियान बह रहा जो अनहद नद है।
मेरा प्रेम इसके निनाद में सम हो जाना भर है!! 

——–

(नोट : #अपनीडिजिटलडायरी के शुरुआती और सुधी-सदस्यों में से एक हैं समीर। भोपाल, मध्य प्रदेश में नौकरी करते हैं। उज्जैन के रहने वाले हैं। पढ़ने, लिखने में स्वाभाविक रुचि रखते हैं। वैचारिक लेखों के साथ कभी-कभी उतनी ही विचारशील कविताएँ, व्यंग्य आदि भी लिखते हैं। डायरी के पन्नों पर लगातार अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराया करते हैं।)

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