मेरे शहर में दो सड़कें हैं। वैसे तो कई सड़कें हैं,लेकिन आज हम इन दो सड़कों की बात ही करेंगे। एक ख़ास सड़क है। वह उतनी…
View More बारिश में इन गड्ढों का इस्तेमाल भूजल स्तर में बढ़ोतरी के लिए किया जाएगा!Tag: रोचक-सोचक
आप शहरियों को हम न बरसें तो परेशानी, बरसें तब भी
ये बादल भी न, कभी बरसते हैं, कभी नहीं। कहीं ख़ूब बरसते हैं। कहीं बिल्कुल नहीं या बहुत कम। बादलों की इस मनमानी और इससे…
View More आप शहरियों को हम न बरसें तो परेशानी, बरसें तब भीहाथ में हुनर है तो हम अपनी हर नकारात्मकता से पार पा सकते हैं!
उस दम्पति को शादी-शुदा जीवन में करीब 60 साल हो चुके थे। वे आपस में हर बात एक-दूसरे से साझा करते थे। हर चीज पर…
View More हाथ में हुनर है तो हम अपनी हर नकारात्मकता से पार पा सकते हैं!हर आँकड़े का सच प्रजा को मालूम होना ही चाहिए, राजन!
सुबह नित्य कर्म, योगासन और ध्यान-स्नान से फ़ारिग होते ही वे अपने बालों को सँवारने के लिए हमेशा की तरह दर्पण के सामने थे। लेकिन…
View More हर आँकड़े का सच प्रजा को मालूम होना ही चाहिए, राजन!काबुलीवाला से संयुक्त राष्ट्र- हम अफ़ग़ानिस्तान के ड्रायफ्रूट्स के लिए चिन्तित हैं!
काबुलीवाला … हाँ, वही काबुलीवाला। याद ही होगा सबको। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ की कहानी का पात्र काबुलीवाला। पाँच साल की बच्ची मिनी का अधेड़ दोस्त काबुलीवाला।…
View More काबुलीवाला से संयुक्त राष्ट्र- हम अफ़ग़ानिस्तान के ड्रायफ्रूट्स के लिए चिन्तित हैं!संस्कृति को किसी कानून की ज़रूरत कहाँ होती है?
उस वक्त शाम के 5.25 बज रहे थे। मैं जर्मनी में अपने एक ग्राहक के साथ उनके दफ़्तर में बैठा हुआ था। बातचीत जारी थी कि…
View More संस्कृति को किसी कानून की ज़रूरत कहाँ होती है?इंसान की असली परख कैसे होती है?
एक पुरानी कहानी है। एक राजा हुआ करता था। उसका नियम था कि उसके शहर के हाट-बाजार में जो भी सामान नहीं बिकता, उसे वह खरीद…
View More इंसान की असली परख कैसे होती है?आज़ादी का 75वां साल : तंत्र और जन के बीच अब भी एक डंडे का फ़ासला!
और उस दिन ‘तंत्र’ की ‘जन’ से मुलाकात हो गई। पाठकों को लग सकता है कि भाई ‘तंत्र’ और ‘जन’ दोनों की मुलाकात का क्या चक्कर…
View More आज़ादी का 75वां साल : तंत्र और जन के बीच अब भी एक डंडे का फ़ासला!हिन्दी के मुहावरे, बड़े ही बावरे
हिन्दी का थोडा़ आनन्द लेते हैं। हिन्दी के मुहावरों की भाषा, उनकी अहमियत, उनकी ख़ासियत समझने की कोशिश करते हैं। हालाँकि इस ख़ूबसूरती से इन मुहावरों को चन्द…
View More हिन्दी के मुहावरे, बड़े ही बावरे“बापू, अब तो मुझे आत्मग्लानि होने लगी है। ख़ुद पर ही शर्म आने लगी है।”
अरसा हो गया। इतने वर्षों से बापू को एक ही पोजिशन में बैठे हुए देखते-देखते। झुके हुए से कंधे। बंद आँखें। भावविहीन चेहरा। कहने की जरूरत…
View More “बापू, अब तो मुझे आत्मग्लानि होने लगी है। ख़ुद पर ही शर्म आने लगी है।”