आरएसएस के 100 वर्ष : देखिए, हेडगेवार का कथन अक्षरशः: सत्य भी सिद्ध हुआ!

अनुज राज पाठक, दिल्ली

कांग्रेस का राष्ट्रीय अधिवेशन 1920 में नागपुर में हुआ था। इस दौरान का घटनाक्रम यह दर्शाता हैं कि यह अधिवेशन महात्मा गाँधी से पूर्णतया प्रभावित ही नहीं, अपितु उन्हीं के नेतृत्त्व में हो रहा था। इसमें डॉक्टर हेडगेवार भी कांग्रेस कार्यकर्ता के तौर पर सम्मिलित थे। नागपुर अधिवेशन में कांग्रेस ने ‘खिलाफत’ जैसे साम्प्रदायिक आन्दोलन को अपने हाथ में लिया था। बावजूद कि ‘खिलाफत’ का भारत से कोई सम्बन्ध नहीं था। यह कदम कहीं न कहीं मात्र मुस्लिम समुदाय को प्रसन्न करने के ही उद्देश्य से उठाया गया था। और ध्यान दीजिए कि इसी अधिवेशन में अखिल भारतीय कार्यसमिति के समक्ष जब श्री बढ़े जी ने गोरक्षा का प्रस्ताव रखा, तो उसे निरस्त कर दिया। कहा गया कि इससे “मुसलमानों की भावनाएँ दुखेंगी। अत: इसे कांग्रेस अपने हाथ में नहीं ले सकती।” 

स्वाभाविक रूप से इस घटनाक्रम में विवाद के बीज छिपे हुए थे और विवाद हुआ भी। ऐसा कहा जाता है महात्मा गाँधी जी ने इस विषय को उठाने वाले श्री बढ़े जी को हाथ पकड़कर सभागार से निकाल दिया था। इसके बाद अखिल भारतीय कार्यसमिति की बैठक भी स्थगित कर दी थी। कहते हैं कि यही वह महत्त्वपूर्ण घटना थी, जिसका डॉ हेडगेवार पर गहरा प्रभाव पड़ा, वह भी विपरीत। यद्यपि ऐसा नहीं है कि डॉक्टर साहब ने तुरंत ही कांग्रेस छोड़ दी हो। वह आगे कुछ समय तक कांग्रेस में बने रहे। वर्ष 1922 में वह कांग्रेस के प्रान्तीय सह-मंत्री भी रहे। हालाँकि कांग्रेस के नागपुर सम्मेलन में गोरक्षा प्रस्ताव वाली घटना इकलौती नहीं थी। एक और मामला स्वागत समिति के प्रस्ताव से जुड़ा था। उसमें कहा गया, “कांग्रेस का ध्येय हिन्दुस्तान में प्रजातंत्र की स्थापना कर पूँजीवादी देशों के चंगुल से ‘विश्व के देशों’ की मुक्ति है।” लेकिन विषय समिति ने ‘विश्व के देशों की मुक्ति’ वाला अंश हटाकर इसका उपहास उड़ाया।

उक्त घटनाओं को देखने से  ज्ञात होता है कि लोकमान्य तिलक के बलिदान के बाद गाँधी जी का कांग्रेस पर पूर्ण प्रभुत्त्व स्थापित हो चुका था। गाँधी जी की मुस्लिम केन्द्रित नीतियाँ बहुत से देशभक्त व्यक्तियों के लिए कष्टकर थी। डॉक्टर हेडगेवार कांग्रेस की इस हिन्दू-मुस्लिम एकता की नीति को पृथकतावादी नीति मानते थे। उनका कथन था, “भारत में मुसलमानों के अतिरिक्त ईसाई, पारसी, यहूदी आदि दूसरे लोग भी रहते हैं, परन्तु उनका कोई उल्लेख न करते हुए केवल हिन्दू-मुस्लिम एकता की बात मुसलमानों में यह भावना निर्माण करेगी कि वे अन्यों से कुछ विशेष हैं। इससे उनमें एक पृथकतावादी मनोवृत्ति उत्पन्न होगी, जो भारत के राष्ट्रजीवन के साथ एकीकरण नहीं होने देगी।” देखिए, डॉक्टर हेडगेवार का कथन आगे चलकर अक्षरशः: सत्य भी सिद्ध हुआ।

अगस्त 1921 में डाॅक्टर हेडगेवार को राष्ट्रद्रोह के जुर्म में एक वर्ष सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई। वहीं अगस्त में केरल के मलाबार क्षेत्र में ‘मोपला विद्रोह’ शुरू हुआ। इसमें हजारों हिन्दुओं की हत्या की गई और उनका जबरन धर्म बदलवाया गया। तत्कालीन ‘भारत सेवक समाज’ द्वारा प्रकाशित प्रतिवृत्त में लगभग 1500 हिन्दुओं की हत्या और 20,000 हिन्दुओं के धर्मपरिवर्तन का उल्लेख है। उस विद्रोह को दबाने हेतु तत्कालीन सरकार के कठोर उपाय किए। तब विद्रोहियों के पक्ष में महात्मा गाँधी ने लिखा था, “ईश्वर-विश्वासी शूर माेपले, जो जिसे वे धर्म मानते समझते थे, उसके लिए, उस मार्ग से, जिसे वे धार्मिक मानते थे, लड़ रहे थे।”  

कहते हैं कि यहीं से डॉक्टर हेडगेवार के मन में हिन्दू समाज को सबल और राष्ट्रीय भाव से युक्त बनाने के उद्देश्य से एक सशक्त संगठन की स्थापना का विचार जन्मा। उस समय धार्मिक हितों पर लगातार हो रहे कुठाराघातों से हिन्दू समाज आहत था। साथ ही हिन्दू समाज के सामान्य जन भ्रमित थे ओर स्वयं को दुर्बल भी महसूस कर रहे थे। उस समय हिन्दू संगठन सक्रिय थे। जैसे- स्वामी श्रद्धानन्द की ‘भारतीय हिन्दू शुद्धि सभा’, महामना मालवीय की ‘अखिल भारतीय हिन्दू महासभा’ आदि। इसी तरह हिन्दू हितों के लिए सक्रिय नेता भी थे। जैसे- वीर सावरकर, भाई परमानन्द ,आदि। लेकिन कहीं न कहीं ये सभी प्रतिक्रिया स्वरुप कार्य कर रहे थे। इससे असर था।

प्रतिक्रिया स्वरूप कार्य दीर्घगामी नहीं होता। उद्देश्यपूर्ण कार्य अधिक परिणामकारक और निरन्तरता लिए रहता है। इसीलिए डॉक्टर हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के गठन में राष्ट्रीय भाव और दुर्बलता के कारणों का उपचार करने पर अधिक महत्त्व दिया। और यही वजह है कि आज संघ निरन्तर 100 वर्षों से स्वयं को मजबूत और परिष्कृत करता दिखाई देता है। उन्होंने संघ की स्थापना के उद्देश्य को सामने रखते हुए कहा था, “स्वप्रेरणा से एवं स्वस्फूर्ति से राष्ट्र सेवा का बीड़ा उठाने वाले व्यक्तियों का केवल राष्ट्रकार्यार्थ निर्मित संघ ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है। प्रत्येक राष्ट्र में, उस राष्ट्र के व्यक्ति अपने देश की सेवा करने के लिए ऐसे ही संघ का निर्माण करते हैं। यही हमारा प्रियतम हिन्दू राष्ट्र अर्थात् हिन्दुस्तान हमारा कार्य क्षेत्र रहने के नाते उसी के हित रक्षणार्थ हमने इस देश में संघ स्थापित किया है। इसी संघ के आधार पर हमने राष्ट्र की सर्वांगीण उन्नति करने का निश्चय किया है।”

डॉक्टर हेडगेवार के जीवन क्रम पर पुस्तक लिखने वाले व.ण. शेंडे ने 1941 में प्रकाशित अपनी किताब में लिखा था, ”1915 से 1924 तक के उनकी आयु के 10 वर्ष, देश में होने वाले विभिन्न आन्दोलनों एवं संस्थाओं का अभ्यासपूर्वक सूक्ष्म अवलोकन एवं विश्लेषण करने तथा राष्ट्र को ग्रसित करने वाले रोग का अचूक निदान खोज निकालने में व्यतीत हो गए। हमारी मातृभूमि हिन्दुस्तान केवल क्षेत्रफल, आबादी, सृष्टि-सौन्दर्य, खनिज, सम्पत्ति, उर्वरत्व एवं समृद्धि में ही नहीं, अपितु तत्त्प ज्ञान, धर्म, संस्कृति, इतिहास, पराक्रम, विद्या तथा कला-कौशल आदि में से किसी एक में भी आज से पूर्व
कभी भी संसार के पीछे न तो थी और न ही आज है। इतना होते हुए भी कौन-से राष्ट्रीय दुर्गुण के परिणामस्वरूप हमारा यह प्राचीन हिंदू राष्ट्र दिवसानुदिवस अधोगति के गहरे गह्वर में गिरता जा रहा है, यह बात डाक्टर साहब के मन को बेधा करती थी।… उक्त प्रश्न के वास्तविक उत्तर को खोज निकालने के लिए वह चिन्तनमनन में निमग्न रहा करते थे।”

तो अब आगे विचार करेंगे कि संघ अपने सौ वर्ष की यात्रा में कितना सफल रहा?  

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(नोट : अनुज राज पाठक दिल्ली में संस्कृत विषय के सरकारी शिक्षक हैं। #अपनीडिजिटलडायरी की स्थापना से ही साथ जुड़े सदस्यों में शामिल हैं। अच्छे लेख और कविताएँ लिखते हैं। कभी-कभी श्रृंखलाबद्ध लेखन भी करते हैं।) 

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श्रृंखला की पिछली कड़ियाँ

1- आरएसएस के 100 वर्ष : यह नहीं कह सकते कि जो कांग्रेस में नहीं था, वह देशभक्त नहीं था!

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