बाँस का यह छोटा सा टुकड़ा अपने आप में पूरा जीवन-दर्शन कहा जाता है।
नीलेश द्विवेदी, भोपाल, मध्य प्रदेश से, 19/4/2022
श्रीकृष्ण ने बाँसुरी को यूँ ही अपने होंठो पर नहीं लगाया होगा। बहुत सोच-विचार कर इसे अपनी जीवन-संगिनी बनाया होगा। क्योंकि यह सीधा-सादा सा बाँस का टुकड़ा अपने आप में पूरा जीवन-दर्शन है। बहुत-कुछ लिखा और बताया जाता है, इसके बारे में अक्सर। लेकिन आज मैं निजी अनुभव की बात बताता हूँ।
यही कोई 10 साल से कुछ ऊपर हो गया, जब से यह बाँसुरी मेरे साथ जुड़ी। हालाँकि मैं इसके साथ बहुत पहले से जुड़ चुका था। पर जीवन की आपा-धापी में ऐसा मौका नहीं लगा कि मैं इसे अपने हाथों में ले सकूँ। मगर 2011 में स्थायी रूप से भोपाल में आ टिकने के बाद वह समय भी आ गया, जब बाँसुरी मेरे जीवन से आ जुड़ी। और कह सकता हूँ कि हमेशा के लिए। यहाँ मैंने देश के सुप्रसिद्ध बाँसुरी वादक श्री अभय फगरे जी से विधिवत् इसकी प्रारंभिक शिक्षा लेनी शुरू की। उनके पास यह सिलसिला करीब सात साल चला। बीच में एकाध साल यूँ ही अटकन-भटकन में बीत गया। इसके बाद 2020 के उत्तरार्ध में श्री हरिप्रसाद चौरसिया जी के वरिष्ठ शिष्य श्री हिमांशु नन्दा जी से आगे की शिक्षा लेनी शुरू की, जो अभी जारी है। यहाँ जब हिमांशु सर के पास आया, तो मेरी एक बड़ी गलती की ओर उन्होंने ध्यान दिलाया। वह थी, लगभग हर सुर को ज़ुबान लगाकर बजाने की। इससे ज़ुबान और अँगुलियों का समन्वय ठीक से नहीं बैठ पाता था। बाँसुरी से निकलने वाले संगीत का प्रवाह भी बाधित होता था।
हिमांशु सर और उनके वरिष्ठ शिष्य श्री क्षितिज सक्सेना जी ने संगीत के नियमित गृहकार्य (जो हर कक्षा के बाद करने के लिए दिया जाता है) की समीक्षा करते हुए टोक-टोक कर मेरी उस गलती को दुरुस्त किया। बताया कि बाँसुरी में ज़ुबान लगाने का महत्व है। लेकिन हर जगह नहीं। यह हमारी भाषा, लेखनी में अर्धविराम, पूर्णविराम की तरह होनी चाहिए। अनावश्यक अवरोधक की तरह नहीं। मैने उनकी बात पर ध्यान दिया। इसके बाद कोशिश करके अब मैं वहीं ज़ुबान लगाने की कोशिश करता हूँ, जहाँ उसकी ज़रूरत होती है। या यूँ कह लें कि जहाँ ज़रूरी नहीं, वहाँ बिना ज़ुबान लगाए बजाने की कोशिश करता हूँ। उसको नियंत्रित रखने का प्रयास करता हूँ। हालाँकि ग़लत आदतें आसानी से नहीं जाया करतीं। तो पूरी तरह मामला अभी सुधरा नहीं है। लेकिन काफ़ी हद तक ठीक हो चुका है। इससे मैं अपने संगीत के प्रवाह में भी बेहतरी महसूस कर रहा हूँ। नतीजे धीरे-धीरे बेहतर हो रहे हैं।
अब ज़रा इस निजी अनुभव को थोड़ा बड़े फ़लक पर देखिए। क्या यही हम सबके साथ जीवन में अक्सर नहीं होता? बेवज़ह कहीं भी लगा दी गई ज़ुबान से नतीजे खराब। और सोच-समझकर लगाई जाए, ग़ैरज़रूरी जगहों पर उसे नियंत्रित कर लिया जाए तो नतीजे ‘सोने पर सुहागा’ वाले। है न, रोचक-सोचक?
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