ऑस्ट्रेलिया ने ताे बच्चों के लिए यूट्यूब भी प्रतिबन्धित कर दिया, भारत में यह कब होगा?

प्रियंका पवन जैन ‘घुवारा’, टीकमगढ़, मध्य प्रदेश

बचपन मानव जीवन की नींव होता है। लेकिन ये नींव अब दरक रही है क्योंकि बचपन किताबों से चमकता नहीं, बल्कि मोबाइल स्क्रीन की चमक से फीका पड़ रहा है। यह हमारे समाज की वास्तविकता बन चुका है। कहते हैं, आज के बच्चे कल के समाज की दिशा तय करते हैं। लेकिन अभी यक्ष प्रश्न यह है कि अगर बच्चे मोबाइल और इन्टरनेट के संग-साथ के कारण आभासी दुनिया खोने लग जाएँगे, तो वास्तविक दुनिया की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार कैसे होंगे? उन्हें वह ताकत कैसे और कब मिलेगी? अगर बचपन ही ऐसे फीकेपन से दरक जाएगा तो फिर मानव जीवन की इमारत मजबूत कैसे होगी? समाज शक्तिशाली, सामर्थ्यवान कैसे होगा? 

निश्चित रूप से ऑस्ट्रेलिया जैसे एक तुलनात्मक रूप से छोटे किन्तु विकसित देश ने इस खतरे को भाँप लिया है। इसी कारण उसने ‘फेसबुक’, ‘इंस्टाग्राम’, ‘स्नैपचैट’, ‘टिकटॉक’ और ‘एक्स’ जैसे प्लेटफार्मों को 16 साल से कम आयु के बच्चों के लिए प्रतिबन्धित किया है। इस क्रम में हाल ही में यूट्यूब को भी शामिल कर लिया है। इस तरह ऑस्ट्रेलिया ने दुनिया को यह सन्देश दिया है कि बच्चों को फोन, इन्टरनेट और सोशल मीडिया के प्रदूषण से सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी केवल परिवारों की नहीं होती, राष्ट्र की भी होती है। ऑस्ट्रेलिया की संसद से पारित यह कानून सम्भवत विश्व में पहला कानूनी प्रावधान है, जो बच्चों को डिजिटल प्रदूषण से बचाएगा। ऑस्ट्रेलिया के कानूनी प्रावधानों में इतनी स्पष्टता और कठोरता है कि आसानी से उनका उल्लंघन भी सम्भव नहीं। मसलन- उसमें स्पष्ट है कि उल्लंघन करने पर सम्बन्धित प्लेटफार्मों पर पाँच करोड़ ऑस्ट्रेलियाई डॉलर तक का जुर्माना लगाया जाएगा।

तो अब अगला सवाल यह भी कि पूरी दुनिया में अपने पारिवारिक, सामाजिक, सांस्कृतिक मूल्यों की वजह से पहचाने जाने वाले भारत में ऑस्ट्रेलिया की तरह कदम कब उठाया जाएगा? वैसे होना तो यह चाहिए था कि ऐसे किसी कदम की अगुवाई भारत करता और दुनिया के सामने मिसाल पेश करता! लेकिन अचरज की बात है कि भारत सरकार अब भी चुप साधे बैठी है! आखिर किस बात का इंतजार किया जा रहा है? क्या सरकार को एहसास नहीं है कि अगर भारतीय बच्चे यूँ मोबाइल, इन्टनेट, और सोशल मीडिया की भूलभुलैया में खो गए तो देश का आने वाला कल ही खतरे में पड़ जाएगा? और अगर उसे इसका एहसास है, तो उसने कदम क्यों नहीं उठाए? 

अभी समय है कि इस गम्भीर चुनौती से निपटने के लिए भारत सरकार भी एक स्पष्ट और सख्त नीति बनाए। साथ ही, कन्टेन्ट फिल्टरिंग, स्क्रीन टाइम की सीमा, और आयु सत्यापन जैसी तकनीकों को भी अनिवार्य करे। ताकि बच्चों के दिमाग में इस प्रदूषण की जड़ गहरी होने से पहले ही उसे रोका जा सके। आज हर उम्र के लोगों में डिजिटल प्रदूषण तेजी से बढ़ रहा है। नशे की तरह फैल रहा है। और बच्चों में तो इसकी वजह से चिड़चिड़ापन, नींद की कमी, एकाग्रता में गिरावट तथा अपने से दूरी जैसी समस्याएँ भी दिखने लगी हैं। उनकी आँखों और उनके शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य पर भी गम्भीर असर पड़ रहा है। ऐसे में देश की सरकार को चाहिए कि वह इस विषय को गम्भीरता से ले और जल्द से जल्द इस दिशा में जरूरी कदम उठाए।

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(प्रियंका जैन मूल रूप से बुन्देलखण्ड के टीकमगढ़ जिले की सक्रिय सामाजिक तथा राजनीतिक कार्यकर्ता हैं। पवन जैन ‘घुवारा’ की पत्नी हैं प्रियंका। पति की तरह जनसामान्य से जुड़े मसलों पर वह भी लगातार आवाज बुलन्द करती रहती हैं। उन्होंने उक्त विचार #अपनीडिजिटलडायरी को व्हाट्स एप के जरिए भेजे हैं।) 

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