प्रतीकात्मक तस्वीर
टीम डायरी
भारत की 140-45 करोड़ की आबादी में लगभग 81 करोड़ लोगों को मुफ्त का राशन दिया जा रहा है। प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत यह सुविधा दी गई है। इसके अलावा उज्ज्वला योजना में घरेलू गैस का कनेक्शन, सुरक्षा राशि, गैस चूल्हा, एक सिलेंडर, रेगुलेटर, आदि भी सब मुफ्त मिलता है। किसानों के खाते में हर साल 6,000 रुपए नगद जमा कराए जाते हैं। ‘लाड़ली बहना’ जैसी तमाम योजनाओं के तहत कई राज्यों में महिलाओं को हर महीने 1 से 3 हजार रुपए तक दिए जाते हैं। और दिलचस्प बात यह है कि इस तरह की योजनाओं के लाभार्थियों में से पात्र-अपात्र के चयन की प्रक्रिया भी ढीली रखी जाती है, शायद जानबूझकर ही, क्योंकि इन योजनाओं से सरकार चलाने वाले दलों को सीधा चुनावी लाभ मिलता है। उनकी सरकार फिर से बनने की संभावना मजबूत होती है।
आँकड़े बताते हैं कि इस तरह की मुफ्त की योजनाओं के कारण सरकारी खजाने पर लगभग 2 लाख करोड़ रुपए का बोझ पड़ रहा है। यानि यह राशि किन्हीं विकास कार्यों में न जाकर सीधे मुफ्त का माल बाँटने में जा रही है। ओर ये मुफ्त का माल आता कहाँ से है सरकारों के पास? निश्चित ही उन लोगों की जेब से, जो लगातार मेहनत करते हैं और सरकारी खजाने में अपने हिस्से का कर जमा कराते हैं। इसके भी कुछ आँकड़े गौर करने लायक हैं। इनके मुताबिक, 2023-24 में देश के 10 करोड़ से ज्यादा लोगों ने आयकर जमा किया। और आयकर जैसे प्रत्यक्ष करों से 2023-24 में ही सरकारी खजाने में 23.38 लाख करोड़ रुपए की रकम जमा कराई गई। खास बात देखिए, आम जनता की मेहनत की कमाई का लगभग 10 प्रतिशत हिस्सा सरकारों ने मुफ्त में बाँट दिया, चुनाव जीतने के लिए!
इस पर भी विरोधाभास देखिए कि केन्द्र सरकार ने बड़े जोर-शोर से ‘आत्मनिर्भर भारत’ का नारा दिया है। अब कोई पूछे केन्द्र और राज्य की सरकारों से कि जब वे अपने चुनावी लाभ के लिए भारतीय समाज के बड़े तबके को मुफ्त पर निर्भर बनाती जा रही हैं, तो देश आत्मनिर्भर कैसे बनेगा? आखिर, राशन, रकम, घरेलू गैस, चूल्हा, मकान (आवास योजना के तहत सस्ते में), बिजली-पानी, रोजगार भत्ता, बेरोजगारी भत्ता, आदि सब तो मुफ्त में दिया जा रहा है। तो फिर कोई चार पैसे कमाने के लिए मेहनत मशक्कत क्यों करेगा, बताइए? और सच में, गाँवों-कस्बों में जाकर देखिए। युवा और अधेड़ उम्र के लोगों की बड़ी तादाद अब ऐसी हो चुकी है, जो काम से जी चुराने लगी है। ऐसे में खुद ही सोचिए कि ‘आत्मनिर्भर भारत’ का नारा जमीन पर कैसे साकार होगा? यह तो ‘मुफ्त पर निर्भर भारत’ हुआ!
यह चिन्ता हर सजग नागरिक के मन में है, देश की शीर्ष अदालत में भी। अभी हाल ही में तमिलनाडु सरकार की एक याचिका खारिज करते हुए शीर्ष अदालत ने सवाल किया, “आखिर कैसा भारत बना रहे हैं हम? किस तरह की संस्कृति देश में विकसित की जा रही है? हम सुबह-सुबह मुफ्त का भोजन देते हैं, फिर साइकिल, इसके बाद बिजली, और अब तो सीधे बैंक खातों में नगद रकम! कल्याणकारी व्यवस्था में जरूरतमंदों की मदद करना सरकार का कर्तव्य है। लेकिन हम तो पात्र-अपात्र सभी को खुले हाथों से बाँट रहे हैं। जो सक्षम हैं, वे भी मुफ्त की योजनाओं का लाभ ले रहे हैं। क्या सरकारों को अब अपने नीतिगत ढाँचे पर पुनर्विचार नहीं करना चाहिए।”
शीर्ष अदालत की यह टिप्पणी, ये सवाल अहम हैं। इन पर विचार करना ही होगा। अन्यथा आत्मनिर्भर भारत की परिकल्पना भूल ही जाइए फिर।
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