विजय मनोहर तिवारी की पुस्तक, ‘भोपाल गैस त्रासदी: आधी रात का सच’ से, 8/12/2021
इस पहले से तय फैसले और 25 साल पहले हुए हादसे में नया यह भी था कि इस बार तमाम टीवी चैनल भी मीडिया के फलक पर वजूद में थे। रोजाना सुबह से करिस्माती और सनसनीखेज सुख के शिकार में भटकने वाले टीवी पत्रकारों के लिए अदालत के सामने नाराज लोगों की भीड़ और एक ऐसे मामले का फैसला एक बड़ी खबर थी, जिसमें 15 हजार से ज्यादा लोग मौत के मुंह में चले गए थे, हजारों हमेशा के लिए बीमार बेकार हो गए थे। ये सब उस गैस के शिकार थे, जो यूनियन कार्बाइड के प्लांट से दो और तीन दिसंबर 1984 की दरम्यानी रात लीक हुई थी। तब टीवी चैनल नहीं थे। सिर्फ दूरदर्शन था। वह भी आज के खबरी चैनलों की तरह चौबीस घंटे खबरों से भरा नहीं रहता था। कुछ बुलेटिन होते थे। इनमें वही दिखाई सुनाई देता था, जो सरकार की सेहत के लिए ठीक माना जाता था। ऐसे में गैस जैसे भयानक हादसे के ईमानदार कवरेज की उसमें ज्यादा गुंजाइश तब नहीं थी।
पिछले 10 सालों में अस्तित्व में आए हिंदी-अंग्रेजी के नेशनल रीजनल लोकल न्यूज चैनलों के लिए यह मामला 25 साल पुरानी कसर निकालने वाला बन गया। अखबारों ने तो कवरेज किया ही, लेकिन टीवी चैनलों ने देश भर में हल्ला मचा दिया। जेसिका लाल और रुचिका गेहरोत्रा जैसे नितांत निजी मामलों में पुलिस और अदालत के स्तर पर हुई नाइंसाफियों को टीवी चैनलों ने ही अपने हाथ में लेकर सही अंजाम तक पहुंचाया था। जिंदगी भर अपनी ताकत के गुमान में मनमानी करते रहे व्हाइट कॉलर लोगों को कानून का वह सबक सिखाने में वे कामयाब रहे, जो कायदे से कवरेज के हल्ला गुल्ला के बगैर ही उन्हें मालूम होना चाहिए था। लेकिन अब यह किसी से छुपा नहीं है कि हमारे यहां ताकतवर कुसूरवारों को बचाने के लिए पूरी व्यवस्था झुकी हुई खड़ी है। अगर ताकत की लाठी आपके हाथ में है तो सिस्टम को जैसा चाहिए, वैसा हांकिए। बचने के लिए कानून की कई गलियां हैं, सत्ताधीशों को मालूम है कि सेफ पैसेज किसे और किस तरह मुहैया कराना है। अफसरों को भी अपने उल्लू सीधे करने के लिए इन सब तरह के ताकतवर गुनहगारों की मदद से कोई मलाल नहीं है। यह सबसे ज्यादा गैस हादसे ने ही साबित किया है।…
…आम आदमी, जो ऐसे एकतरफा फैसलों का आदी है, जिनमें ताकतवर साफतौर पर बचाए जाते रहे हैं और बेकसूरों के हिस्से में ही हर तरह की नाइंसाफी बदी वह जिंदगी भर देखता-भोगता है। उसके पास कोई मंच नहीं होता, कोई ताकत नहीं होती, जो वह ऐसे अन्याय का कहीं प्रतिकार कर सके। सारी राजनीतिक पार्टियां इस हम्माम में निर्लज्जता के साथ एक जैसी निर्वस्त्र खड़ी हैं। वे देश की अस्मिता और स्वाभिमान की बातें करती हैं, लेकिन मौका आने पर ऐसा कोई सबूत पेश नहीं करतीं, जिससे लगे कि उन्हें वाकई इन चीजों की कुछ फिक्र है। वे सबसे पहले बिना रीढ़ के जीव की तरह झुकती और हद दर्जे तक जाकर सौदे-समझौते करती दिखाई देती हैं।
ज्यादा पहले नहीं, हमने पिछले दस सालों में ही जेलों में बंद खूंखार पाकिस्तानी आतंकवादियों को बाइज्जत कंधार पहुंचाते हुए एनडीए को देखा है। संसद पर हमले के गुनहगार मोहम्मद अफजल की शानदार हिफाजत में लगी यूपीए को भी। ये देश की अस्मिता से जुड़े मामले थे। सरकारें इन मामलों में जिस बेशर्मी से पेश आईं, उससे दुनिया भर में भारत की साख (जो पहले ही बहुत बेहतर नहीं रहीं) को बट्टा लगा और यह जाहिर हुआ कि हम एक कमजोर लोकतंत्र हैं। हमारे नेता केंचुओं से गए बीते हैं, जिन्हें सिर्फ वोटों की फिक्र है और अपनी कुर्सियों की। वक्त आने पर वे देश-वेश और जनता-वनता सबको दांव पर लगा सकते हैं। इनके बीच जनता दो पाटों के बीच पिसने की हालत में 60 साल से है। उसका अपना कोई अलग मंच नहीं है, जहां से वह इन सबको नकार सके और नाकारा नेतृत्व के बारे में अपना कोई स्वतंत्र फैसला सुना सके।…
…जरा सोचिए, वॉरेन एंडरसन को जब इस फैसले की जानकारी मिली होगी तो उसके हावभाव और प्रतिक्रिया कैसी रही होगी? न्यूयार्क के ब्रिजहैम्पटन के अपने आलीशान घर में वह आराम से टीवी देख रहा होगा। फैसले का समाचार आया होगा, पीड़ितों की प्रतिक्रियाएं भी। 90 साल के बूढ़े एंडरसन के झुर्रियों से भरे चेहरे पर मुस्कान तैर गई होगी। उसके जेहन में 25 साल पुराने दौर का एक टुकड़ा ताजा हुआ होगा। खासतौर से वह दिन जब वह भोपाल की सड़कों पर लाशों के बीच से होकर शाही अंदाज में गुजरा था। उसे वह सरकारी आवभगत याद आई होगी, जब उसे कुछ इस अंदाज में भोपाल से निकाला गया, जैसे कुछ हुआ ही न हो। उसे यहां के नेता और अफसर तो करीब से याद आए होंगे, अब अदालतों का भी अंदाजा हो रहा होगा।
सोचने वाली बात है कि भारत के लोगों के बारे में उसने अपने ऐसे अनुभवों से आखिर क्या राय बनाई होगी? एक ऐसा मुल्क जहां आप कुछ भी कर गुजरें, अगर ताकत है तो कोई बाल बांका नहीं कर सकता। फैसले की खबर सुनकर वह सोफे से उठा होगा। अपने लिए ड्रिंक तैयार किया होगा। हलक में उतारकर कुछ हल्का महसूस किया होगा। उसके दिमाग में वह दृश्य जरूर कौंधा होगा, जब हवाई जहाज की सीढ़ियों से नीचे भोपाल के एयरपोर्ट पर खड़े कलेक्टर-एसपी उसे निरीह से प्राणी नजर आए थे और दिल्ली से अमेरिका उड़ने से पहले देश के सर्वोच्च सत्ताधीशों की औकात भी देख ली थी। यह सब याद करते हुए उसने गिलास जल्दी खाली किया होगा और दूसरा पैग बनाया होगा। हो सकता है इस मौके पर उसका कोई करीबी दोस्त या कार्बाइड का पुराना सीनियर सहयोगी भी उसके पास रहा हो। चीयर्स करते हुए वे भारत के बारे में क्या बात कर रहे होंगे? निश्चित ही उसे उसके रिश्तेदारों ने फोन पर बधाइयां दी होंगी। रात डिनर पर अपने परिवारजनों या करीबी दोस्तों को उसने यहां के तजुर्बे भी सुनाए होंगे। क्या कहा होगा उसने?
मैंने इतिहास को किसी किताब में यूनानी यात्री मेगस्थनीज के बारे में पढ़ा था। यह शख्स चाणक्य के समय भारत आया। मगध पहुंचा। चाणक्य से मिलने की ख्वाहिश चंद्रगुप्त के अफसरों से जाहिर की। अफसर उन्हें लेकर प्रधानमंत्री के आवास पर रवाना हुए। शहर के बाहर एक कुटिया में लेकर गए जब मेगनस्थनीज को चाणक्य ने अपनी कुटिया में चर्चा के लिए बुलाया तो वह यह देखकर हैरान हुआ कि पहले से ही रोशन एक दीए को बुझाकर चाणक्य ने दूसरा दीया जला दिया था। जिज्ञासु मेगस्थनीज ने पहला सवाल यही किया कि ऐसा क्यों किया गया? चाणक्य का जवाब था कि वह पहले शासकीय कार्य में व्यस्त थे। उस दीए में जलने वाले तेल का खर्चा सरकारी खजाने से आता है श्रीमान्। यह मुलाकात निजी है। इस दीए का तेल उनके वेतन से आता है। मेगस्थनीज मगध के शक्तिशाली प्रधानमंत्री का ऐसा चरित्र देखकर चकित होकर लौटा, जो जेड श्रेणी की सुरक्षा में जनता पर बोझ की तरह नहीं लदा था बल्कि एक ऋषि की तरह कुटिया में रह रहा था। शायद उसने यह चमकदार वाकया अपने यात्रा संस्मरणों में लिखा। मेरा दावा है कि एंडरसन या क्वात्रोच्चि ने मरने के पहले आधुनिक भारत के भाग्यविधाताओं पर ऐसे तजुर्बे लिखे तो सारी दुनिया के सामने सवा सौ करोड़ लोग अपने नेतृत्व पर शर्म से सिर झुकाए, नजर आएंगे।
(जारी….)
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(नोट : विजय मनोहर तिवारी जी, मध्य प्रदेश के सूचना आयुक्त, वरिष्ठ लेखक और पत्रकार हैं। उन्हें हाल ही में मध्य प्रदेश सरकार ने 2020 का शरद जोशी सम्मान भी दिया है। उनकी पूर्व-अनुमति और पुस्तक के प्रकाशक ‘बेंतेन बुक्स’ के सान्निध्य अग्रवाल की सहमति से #अपनीडिजिटलडायरी पर यह विशेष श्रृंखला चलाई जा रही है। इसके पीछे डायरी की अभिरुचि सिर्फ अपने सामाजिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक सरोकार तक सीमित है। इस श्रृंखला में पुस्तक की सामग्री अक्षरश: नहीं, बल्कि संपादित अंश के रूप में प्रकाशित की जा रही है। इसका कॉपीराइट पूरी तरह लेखक विजय मनोहर जी और बेंतेन बुक्स के पास सुरक्षित है। उनकी पूर्व अनुमति के बिना सामग्री का किसी भी रूप में इस्तेमाल कानूनी कार्यवाही का कारण बन सकता है।)
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श्रृंखला की पिछली कड़ियाँ
4. हादसे के जिम्मेदारों को ऐसी सजा मिलनी चाहिए थी, जो मिसाल बनती, लेकिन…
3. फैसला आते ही आरोपियों को जमानत और पिछले दरवाज़े से रिहाई
2. फैसला, जिसमें देर भी गजब की और अंधेर भी जबर्दस्त!
1. गैस त्रासदी…जिसने लोकतंत्र के तीनों स्तंभों को सरे बाजार नंगा किया!
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