टीम डायरी
एक नया अध्ययन सामने आया है। इसमें बताया गया है कि भारत के लोगों के लिए लू से भी बड़ा जानलेवा खतरा ‘उमस वाली गर्मी’ है। ‘क्लाइमेट डायनामिक्स’ नाम का एक पत्र है। उसमें पर्यावरण से जुड़े शोध पत्र, अध्ययन प्रतिवेदन, आदि प्रमुखता से प्रकाशित होते है। उसी में ‘उमस वाली गर्मी’ से जुड़ा यह अध्ययन प्रकाशित हुआ है। लंदन के वैज्ञानिक डब्ल्यू लैरी कैनी के नेतृत्त्व में अध्ययन किया गया है।
अध्ययन के मुताबिक, गर्म मौसम में लू चलना एक सामान्य प्रक्रिया है। इस दौरान पसीना आना भी मानव शरीरों की सहज प्रतिक्रिया है। पसीना निकलने पर बाहर वातावरण में अगर गर्म सूखी हवा है तो ठीक। इससे पसीना जल्दी सूखता है, वाष्पीकृत होता है। इस तरह शरीर का तापमान अपेक्षाकृत नियंत्रित रहता है। लेकिन अगर हवा में नमी अधिक है, उमस है, तो पसीना ठीक से सूख नहीं पाता और शरीर ठण्डा नहीं होता। इससे रक्तचाप बढ़ सकता है, रक्तचाप बढ़ने से दिल का दौरा पड़ सकता है, मस्तिष्क आघात हो सकता है, या जान भी जा सकती है। और ध्यान दीजिए, यह खतरा सिर्फ अधिक उम्र वालों के साथ ही नहीं है। कम उम्र के लोगों के साथ भी यह जानलेवा स्थिति बन सकती है, ऐसा अध्ययन के निष्कर्षों में बताया गया है। तो इससे बचाव कैसे हो?
इसके उत्तर में वैज्ञानिकों का सुझाव है कि भारत में ऐसी व्यवस्था तत्काल प्रभाव से लागू होनी चाहिए, जिसमें सिर्फ बढ़ते तापमान पर आधारित चेतावनी ही जारी न की जाए। बल्कि नमी का स्तर उसके साथ एकीकृत किया जाए। मतलब यदि किसी क्षेत्र में उमस अधिक बढ़ने की संभावना है, तो उसके प्रति भी लोगों को सचेत किया जाए। ताकि वे अपने स्तर पर बचाव के इंतजाम कर सकें। इतना ही नहीं, अस्पताल आदि ऐसी चेतावनी को ध्यान में रखते हुए अपने यहाँ मरीजों के उपचार का पूरा बंदोबस्त रखें। सरकारें ऐसे केन्द्र खोलें, जहाँ लोगों को जरूरत पड़ने पर ठण्डक का एहसास होता रहे। विद्यालयों-महाविद्यालयों का समय भी ऐसा रखें कि बच्चों को दिक्कत न हो।
इसके अलावा खूब पानी पीना, ठण्डी चीजें खाना, मौसमी फलों का सेवन करना, तेज उमस वाली गर्मी के दौरान बहुत जरूरी होने पर ही घर से निकलना, आदि ऐसे कुछ काम हैं, जो हम लगातार करते ही हैं। लेकिन अगर इनमें कहीं, कभी, कोई लापरवाही हो रह है, तो कृपया न करें। इसी में हमारी सुरक्षा है।
