सांकेतिक तस्वीर
समीर शिवाजीराव पाटिल, भोपाल मध्य प्रदेश
अभी दूसरे भाग में हमने बताया कि चीन और अमेरिका के मानदंडों पर भारत का सही विकास नहीं हाे सकता। तो फिर कैसे होगा? सवाल यह उचित ही है। तो इस तीसरे और अन्तिम भाग में इसी विषय पर चर्चा करते हैं।
चीन की चुनौती सामने आने के बाद अमरिकी नेतृत्व वाला पाश्चात्य तंत्र भारत को औपनिवेशिक शिकंजे में रखकर उसे भी अपनी तकनीक के अनुरूप प्रारम्भिक और कम मूल्यवृद्धि के उत्पादन का केन्द्र बनाना चाहता है। तमाम अर्थशास्त्री विकास के यही घिसे-पीटे गीत गाते रहते हैं। वहीं चीन निश्चित ही भारत को इस भूमिका में दोयम दर्जे का सही, पर एक उत्पादक प्रतिद्वन्द्वी के रूप में उभरता देखना नहीं चाहता। मगर इसके साथ ही साथ वह पश्चिमी देशों के खिलाफ नए समीकरण में भारत का संग भी चाहता है।
भारत के पक्ष में बात यह है कि वह जिस ओर झुकेगा, अगली सदी में वहीं राज करेगा। अब भारतीय नीति निर्माताओं की बात करें तो वो इस स्थिति से अधिकतम लाभ उठाना चाहते है। लेकिन राजनीतिक-संवैधानिक स्तर पर अधिकतम और लाभ की परिभाषा औपनिवेशिक मूल्यों से आती है, जिसे ‘इण्डिया’ वैशाखनन्दन की तरह आज भी ढोए जा रहा है। इसलिए हमारा पहला संघर्ष अपने मूल्य और नीतियों को पुन:स्थापित करने का ही है। यह नैसर्गिक है और इसके लिए हमारे नेतृत्व को तत्काल काम करने की जरूरत है। कुछ बिन्दुओं पर गौर करें।
• शुरुआत में हर समझदार भारतीय को विश्वगुरु बनने का बचकाना सपना छोड़ देना चाहिए क्याेंकि बिना शिष्य बने कोई गुरु नहीं बनता। हमें आज एक अच्छा शिष्य बनने की जरूरत है। इसी तरह सुपरपावर-सॉफ्टपावर का दिवास्वप्न देखना और दिखाना भी प्रतिबन्धित कर देना चाहिए। वैसे भी सुपरपावर संकल्पना में जो भौतिक प्रभुत्व की बात है, जो धार्मिक भारतीय चिन्तन में नहीं है, और विश्वगुरु उपाधि व्यक्ति की होती है राष्ट्र की नहीं।
• वर्तमान हालात यह संकेत करते हैं कि युद्ध रणनीति के स्तर पर हमें अपरम्परागत होना पड़ेगा। चीन,अमेरिका और यूराेप चोरी छिपे जिस तरह जैविक युद्ध और उससे रक्षा के लिए काम कर रहे हैंं, हमें भी इस दिशा में शोध करने की जरूरत है। ड्रोन, सैटेलाइट कम्यूनिकेशन सैबोटाज, इन्टरनेट कम्युनिकेशन ब्लैक आउट, लेजर हथियार आदि प्रतिघात के लिए स्वदेशी प्लेटफॉर्म और तकनीक को विकसित करना बहुत जरूरी है।
• सुपर पावर और प्रभुत्व की अवधारणा ऊर्जा और ताकत पर आधारित है। भारत को विकास का जो मार्ग अपनाने की जरूरत है, वह मौजूदा ऊर्जा और संसाधनाें के बेतहाशा इस्तेमाल की जगह टिकाऊ और प्रदूषण रहित मानवश्रम तकनीकी को आधार बनाकर करना होगा। हमें खनिज संसाधनों और ऊर्जा के अत्यधिक उपयोग को रक्षा, उच्च प्रौधोगिकी वाले उद्योगों तक सीमित रखना होगा जो रणनीतिक और सामरिक रूप से आवश्यक है।
• भारत ऐतिहासिक रूप से एक उत्पादक और परिश्रम पूजक समाज रहा है। चीन के भौतिकतावादी उत्पादक संस्कृति के मुकाबले भारत में उत्पादकता समग्रता आध्यात्मिकता से प्रेरित रही। यही कारण है कि भारतीय उपमहाद्वीप में पेड़-पौधे, जीव-जन्तु, नदी, तलाब, पर्वत और वनों की इतनी समृद्धि रही और जिसका ह्रास उपनिवेशकाल से हुआ। हमारी समृद्धि सम्यक पर्यावरण सुरक्षा सम्मत नीति से ही होग। इसमें कोई सन्देह नहीं कि परिस्थितियाँ भारत के भी अनुकूल हैं और उसका विकास अब रोका नहीं जा सकता। यदि हम ऐसी अर्थव्यवस्था और तदनुरूप राष्ट्रनीति बनाते हैं तो हम अपने मूल्य और नीतियों के अनुरूप लक्ष्य को हासिल कर सकेंगे।
• इसे अमली जामा पहनाने के लिए शिक्षा, नीति, पॉप कल्चर के क्षेत्र में हमें जापान, कोरिया, मंगोलिया और चीन से जुड़ाव बढ़ाना होगा। इसके समानान्तर औपनिवेशिक मूल्यजनित लज्जा को छोड़कर छाती ठोक कर धार्मिक मूल्य नीति के तंत्र और उस पर आधारित सामाजिक ढाँचा बनाना होगा। चीन, जापान ने अपने साभ्यतिक मूल्यों को पुन:स्थापित कर इसका मार्ग दिखाया है। चीन-जापान ने विकास जैसे देश आम नागरिकों की कड़ी मेहनत से कमाई उत्पादकता के आधार पर हासिल की है।
• अगले कुछ महीनों में विश्व पटल पर भारी बदलाव होने जा रहे हैं, जिसके चलते दुनियाभर की अर्थव्यवस्थाएँ एक नए इक्विलिब्रिलियम (सन्तुलन या साम्य की अवस्था) की ओर अग्रसर है। ऐसे में, यह समय हमारे लिए अपने मूल्यों के अनुरूप नीतियों के चयन करने का एक स्वर्णिम अवसर है। इस सुधार के लिए हमें देश में न्याय और नीति के आधार पर कार्यतंत्र विकसित करना होगा।
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(नोट : समीर #अपनीडिजिटलडायरी की स्थापना से ही साथ जुड़े सुधी-सदस्यों में से एक हैं। भोपाल, मध्य प्रदेश में नौकरी करते हैं। उज्जैन के रहने वाले हैं। पढ़ने, लिखने में स्वाभाविक रुचि हैं। वैचारिक लेखों के साथ कभी-कभी उतनी ही विचारशील कविताएँ लिखते हैं। डायरी के पन्नों पर लगातार उपस्थिति दर्ज़ कराते हैं। सनातन धर्म, संस्कृति, परम्परा तथा वैश्विक मसलों पर अक्सर श्रृंखलाबद्ध लेख भी लिखते हैं।)
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