भारत-दक्षिण अफ्रीका टेस्ट श्रृंखला : “हम उन्हें घुटनों पर लाना चाहते थे”…और ले आए!

टीम डायरी

दक्षिण अफ्रीका ने भारतीय क्रिकेट टीम को पाँच दिवसीय मैचों की श्रृंखला के दूसरे मैच में भी बुरी तरह हराया। वह भी 408 रनों के बड़े अंतर से। श्रृंखला में दो ही मैच होने थे, और दक्षिण अफ्रीका दोनों मैचों में भारत पर खेल के लगभग सभी विभागों में हावी रहा। इस तरह उसने श्रृंखला 2-0 से अपने नाम कर ली। सीधे शब्दों में कहें तो दक्षिण अफ्रीका ने श्रृंखला में भारतीय टीम का सफाया कर दिया। बीते 25 सालों में दक्षिण अफ्रीका ने पहली बार भारत में पाँच दिवसीय मैचों की श्रृंखला जीती है। वहीं, दूसरी तरफ भारतीय टीम की रनों के अंतर के लिहाज से दूसरे मैच की यह हार सबसे बड़ी और ऐतिहासिक पराजयों में शामिल हुई है।

दूसरे मैच में दक्षिण अफ्रीका ने भारतीय टीम को उसकी दूसरी (मैच की चौथी) पारी में 549 रन बनाने की चुनौती दी थी। उस वक्त चौथे दिन के एकाध घण्टे और पाँचवें दिन का पूरा खेल बचा था। ओवरों के लिहाज से देखें तो पाँचवें दिन के पूरे 90 और चौथे दिन के 20 के आस-पास ओवर बचे थे। मतलब दक्षिण अफ्रीका ने बड़े नियोजित तरीके से भारतीय टीम को ऐसी स्थिति में डाल दिया था कि वह 110 के लगभग ओवरों में अगर पाँच रन प्रति ओवर से रन बनाए तब मैच जीत सकती थी। हालाँकि ऐसा टेस्ट क्रिकेट के इतिहास में कभी हुआ नहीं। रनों का इतना बड़ा लक्ष्य भी कभी किसी टीम ने हासिल किया नहीं। मतलब पराजय निश्चित थी। यद्यपि, भारतीय खिलाड़ी चाहते तो विकेट पर टिके रहकर मैच अनिर्णीत रख सकते थे, लेकिन नहीं कर सके।

इससे पहले दक्षिण अफ्रीका ने भारतीय टीम को फॉलो-ऑन न खिलवाने का भी बड़ा योजनाबद्ध फैसला किया था। वह चाहती तो ऐसा कर सकती थी क्योंकि भारतीय टीम पहली पारी में भी महज 201 रन ही बना सकी थी। दक्षिण अफ्रीका के पहली पारी में बनाए 489 रनों के मुकाबले वह 288 रन पीछे थी। लेकिन अफ्रीकियों ने दूसरी पारी खेली और 260 रन की अपनी बढ़त को 548 तक पहुँचाया। यही नहीं, वक्त भी पूरा लिया। जैसा कि पहले बताया, चौथे दिन के आखिरी घण्टे में अफ्रीकियों ने तब अपनी पारी घोषित की, जब भारतीय खिलाड़ी शारीरिक-मानसिक रूप से पर्याप्त से ज्यादा ही थक चुके थे। या कहें कि ‘घुटनों पर आ चुके’ थे। 

वास्तव में, यही दक्षिण अफ्रीकी कप्तान तेम्बा बवूमा और मुख्य प्रशिक्षक शुक्री कोनराड की यही रणनीति थी, ‘भारतीय खिलाड़ियों को घुटनों पर लाना’, जो कि वे ले भी आए। मैच के बाद कोनराड ने मीडिया के प्रतिनिधियों के सामने यह स्वीकार भी किया। उन्होंने इसके लिए अंग्रेजी का एक शब्द इस्तेमाल किया, “ग्रोवेल”। इसका एक मतलब होता है- किसी को घुटनों पर लाना या गिड़गिड़ाने के लिए मजबूर करना। यह स्वीकारोक्ति भारतीय टीम के लिहाज से अपमानजनक थी अलबत्ता। मीडियावालों ने इस सम्बन्ध में दक्षिण अफ्रीकी कप्तान बवूमा से सवाल भी किया। लेकिन उन्होंने अपने प्रशिक्षक का ही बचाव किया और जवाब में याद दिलाया कि पहले टेस्ट मैच के दौरान कुछ भारतीय खिलाड़ियों ने किस तरह अपनी हद पार की थी। इस बाबत याद दिला दें कि बवूमा को भारतीय खिलाड़ियों ने न सिर्फ “बौना” कहा था, बल्कि उन्हें गाली दी थी।  

लिहाजा, थोड़े ‘रोचक-सोचक’ अंदाज में कहें तो दक्षिण अफ्रीकियों ने अपने कप्तान के अपमान का बदला लेने के लिए भारतीय खिलाड़ियों को एक-एक बिलांग छाँटकर ‘असली में बौना कर दिया’। कैसे? उसके लिए ऊपर दिया गया मजेदार वीडियो देख सकते हैं। यह एक पुराना विज्ञापन है। लेकिन जो काम कुछ दम्भी भारतीय खिलाड़ियों का सबक सिखाने के लिए अफ्रीकियों ने किया, उसे देखते हुए सटीक बैठता है।

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Neelesh Dwivedi

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