इजरायल-ईरान संघर्ष क्या तीसरे महायुद्ध की सुगबुगाहट है?

समीर शिवाजीराव पाटिल, भोपाल मध्य प्रदेश

इजरायल-ईरान युद्ध जमीन पर उतरती किसी मसीही भविष्यवाणी की तरह लगता है। यह इजरायल के लिए जीवन-मरण का प्रश्न है। मगर इसमें भी कोई सन्देह नहीं होना चाहिए कि यथार्थ में यह दो उपनिवेशवादी अब्राहिमी परम्पराओं  (इस्लाम और ईसाईयत) का शक्ति प्रदर्शन है। इसीलिए यह विश्व को अपने आगोश में लेने वाले महायुद्ध की ओर एक कदम भी हो सकता है। 

हालाँकि कुछ विश्लेषक इसे स्थानीय मुद्दा समझ रहे है। वे लोग ईरान पर हुए इस हमले पर अरब देशों का लगभग मौन को शिया-विरोध की उपज मानते हैं। इस युद्ध को लेकर उम्माह जगत में जो अप्रत्याशित शान्ति है, उसे वे अपने तर्क की पुष्टि के रूप में पेश करते हैं। जबकि अमेरिका और यूरोपीय देश ईरान के खिलाफ मुस्लिम देशों को गोलबन्द कर रहे हैं। वहीं, मुस्लिम देश ऐसा अभिनय कर रहे हैं, मानो वे इन आख्यानों से सहमत हैं और यूरोप में पनप रहे कट्‌टर ईसाई श्वेतवादी विचारधारा से अनभिज्ञ हैं।

वैसे, यूरोप में बढ़ रहे कट्टर ईसाई श्वेतवाद से इजरायल आशंकित भी है। आधुनिक काल में यहूदियों का भी सबसे बड़ा नरसंहार ईसाइयत और चर्च के सरमाए में ही हुआ है। दूसरी तरफ इस्लाम के लिए भी यहूदी (इजरायल में यहूदी ही रहते हैं) मजहब वैसा शत्रु नहीं है, जैसा ऐतिहासिक रूप से ईसाईयत रही है। फिर भी, अपने इलाके में यहूदियों की सफलता और शक्ति को इस्लाम सहन नहीं कर सकता। खासकर पर इसलिए भी कि अरब इलाके में यूरोपीय विचारधारा का प्रथम, सबसे प्रबल और एकमात्र सफल उदाहरण इजरायल ही है।  

अरब इलाके में अपनी सुरक्षा के लिए इजरायल यूरोप और खासकर अमेरिका पर निर्भर है। जबकि अमेरिका और यूरोप इस इलाके में अपनी राजनीति, कूटनीति के लिए इजरायल पर निर्भर है। वहीं इस्लामी देश अमेरिका तथा यूरोप को कसने के लिए सीधे कुछ करने के बजाए इजरायल का उपयोग करना चाहते हैं। शिया ईरान के प्रश्रित संगठन इजरायल के खिलाफ खुली जंग चाहते हैं। वहीं अरब ईरान के खिलाफ इजरायल को एक उपयोगी दीवार के रूप में देखते हैं। ऐसे समय में चतुर व्यवसायी-राजनेता डाेनाल्ड ट्रम्प को कमजोर हो रही अर्थव्यवस्था और अमेरिकी हितों को साधने के लिए बेताब ताकत, आक्रामकता और बेहयाई के इस्तेमाल से गुरेज नहीं है। 

मौजूदा हालात के मद्देनजर सट्‌टा बाजार में भी यह कयास लगने लगे हैं कि यदि एटमी युद्ध होता है, तो वह रुस-यूक्रेन के बीच होगा या फिर ईरान-इजरायल में? दरअस्ल, दुनिया अब कूटनीतिक नजाकत, नैतिक शिष्टाचार के युग से आगे निकल चुकी है। हम विशुद्ध लज्जारहित राष्ट्रहित के संघर्ष वाले कालखंड में प्रवेश कर चुके हैं। समय ऐसा हो रहा है, हर देश अपने हितों के लिए खुले हाथों से खेलने को तैयार है।

इसके दो-तीन संकेतात्मक उदाहरण देखें। इजरायल खुलकर ईरान के मजहबी नेता अयातोल्ला खामेनेई को जीने के अयोग्य करार देता है। वहीं, अमेरिकी राष्ट्राध्यक्ष डोनाल्ड ट्रम्प कहते हैं कि खामेनेई हर पल हमारी नजरों में हैं, यदि वह बिना शर्त समझौता नहीं करते तो कुछ भी किया जा सकता है। उधर, रुस ने यूक्रेन को डर्टी बम के इस्तेमाल से आगाह किया है। साथ ही, उसका जवाब परमाणु हथियार से दिए जाने की चेतावनी भी दे दी है। इस तरह से तमाम संकेत  एक आसन्न महायुद्ध के संकेत दे रहे हैं। 

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(नोट : समीर #अपनीडिजिटलडायरी की स्थापना से ही साथ जुड़े सुधी-सदस्यों में से एक हैं। भोपाल, मध्य प्रदेश में नौकरी करते हैं। उज्जैन के रहने वाले हैं। पढ़ने, लिखने में स्वाभाविक रुचि हैं। वैचारिक लेखों के साथ कभी-कभी उतनी ही विचारशील कविताएँ लिखते हैं। डायरी के पन्नों पर लगातार उपस्थिति दर्ज़ कराते हैं। सनातन धर्म, संस्कृति, परम्परा तथा वैश्विक मसलों पर अक्सर श्रृंखलाबद्ध लेख भी लिखते हैं।) 

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