रुचि तिवारी लाल टीशर्ट में, जिनके साथ दिल्ली विश्वविद्यालय परिसर में मारपीट की गई।
अनुज राज पाठक, दिल्ली
दिल्ली विश्वविद्यालय जहाँ से पूरे देश में शैक्षिक ही नहीं अपितु सामाजिक क्रान्तियों के सूत्रपात होते हैं। उसी विश्वविद्यालय में जहाँ स्त्री-विमर्श (फेमिनिज्म) के झण्डे उठाए स्त्री और पुरुष दिखाई देते हैं। जिस विश्वविद्यालय से निर्भया हत्याकाण्ड पर मशालें जलाई जाती हों, वहाँ प्रश्न पूछने पर एक लड़की को दूसरे समूह की लड़कियाँ महिला पुलिस के सामने ही ‘निर्वस्त्र’ करने की कोशिश करें! तब सहज ही समझा जा सकता है कि हम कैसे समाजिक परिवेश का निर्माण कर रहे हैं। यह केवल चिन्ता का विषय नहीं है कि जिसे यूँ ही छोड़ दिया जाए।
रुचि के साथ ‘तिवारी’ होने के कारण घटना हुई और यह साधारण नहीं है। यह जातिवादी विचार रखने वाले मध्य प्रदेश के वरिष्ठ आइएएस संतोष वर्मा आदि दलित नेताओं के कथनों का जमीन पर पहला प्रयोग है। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि महिला अधिकारवादियों के लिए भी यह घटना महत्त्वपूर्ण नहीं, क्योंकि रुचि तिवारी केवल ‘ब्राह्मण’ होने मात्र से उनके ‘महिला अधिकारों के मानदण्डों’ पर खरी नहीं उतरती। इसलिए रुचि के साथ होने वाला व्यवहार दुर्व्यवहार नहीं हैं! तो क्या भारत में अब सवर्ण होना ही अपने आप में एक अपराध है? नीचे वीडियो (रुचि तिवारी के साथ विश्वविद्यालय परिसर में हुई घटना का) दिया गया है, उसे देखकर सोचिए और हो सके तो जवाब दीजिए।
वास्तव में, सामाजिक और राजनैतिक नेताओं के लिए रुचि तिवारी के साथ दुर्व्यवहार एक चेतावनी है, जो समाज को विभाजित कर अपने राजनैतिक लाभ लेना चाहते हैं। आज रुचि, कल कोई अन्य लड़की होगी। ऐसे प्रयोगों से समाज में समरसता स्थापित करने के सभी प्रयास निष्क्रिय हो जाएँगे।
दलितों में पढ़े लिखे लोग जब दुर्भाग्य से दुर्भावनाओं से प्रेरित हैं, तो सामान्य दलित समाज कैसे सही होगा? प्रमाण देखिए। बहुजन चिन्तक डॉक्टर ओम सुधा की माँग है कि अनुसूचित जाति जनजाति अधिनियम में सवर्णों को फाँसी का प्रावधान हो! क्यों भला? क्या ऐसी माँगें उनके वैचारिक पतन की ओर इशारा नहीं करतीं। बिना जाँच फाँसी की माँग करना कितना उचित है? यह सोचने की बात है। पर फिर भी चलो एक बार मान लें कि सवर्ण के लिए फाँसी की माँग भी उचित है, परन्तु यदि अधिनियम का दुरुपयोग (ऐसे कई मामले सामने आते रहते हैं) हुआ या आरोप झूठा पाया गया तो? तब क्या झूठे आरोप लगाने वाले को भी फाँसी की सजा प्रावधान किया जाएगा? डॉक्टर ओम सुधा जैसे विचारक अगर इस पर सहमत हो तो फाँसी का प्रावधान रख दिया जाए। शायद ही किसी को दिक्कत हो और भूलकर भी कोई किसी पर झूठे आरोप लगाने की हिम्मत करे।
वास्तव में नेता बनने की चाह और बिना कुछ किए लाभ की इच्छा समाज में समरसता को बाधित कर रही है। लाभ की स्थिति समाप्त होनी चाहिए। पिछले 75 वर्षों से जो विविध लाभ सरकारी स्तर पर प्राप्त है, उन्हें समाप्त कर अब केवल अगले 20 वर्षों के लिए प्रतियोगिता आधारित व्यवस्था बना दी जाए। इससे समरसता भी रहेगी और विवाद भी समाप्त होंगे। भविष्य में फिर से सर्वेक्षण हों और जो व्यक्ति किन्हीं उचित कारणों से पिछड़ गए, उन्हें प्रश्रय दिया जाए। यही देश और समाज हित में उचित होगा।
विश्वविद्यालय में रुचि ने केवल प्रश्न ही तो पूछे। प्रश्न पूछने मात्र से रुचि की सामान्य मानव होने की मर्यादा का भी ख्याल नहीं रखा गया। वास्तव में रुचि तिवारी ने जो प्रश्न पूछे, वे प्रश्न लगातार पूछे जाने चाहिए। इससे समाज में पीड़ित दिखने का भ्रम टूट जाएगा। अगर कोई व्यक्ति पीड़ित है, तो ये प्रश्न ही वैध नहीं रहते। अगर प्रश्न वैध हैं तो क्या समाज के पास उन प्रश्नों के उत्तर हैं? जब हजारों वर्षों से पानी नहीं पीने दिया गया? तो जीवन बचा कैसे? जब पढ़ने नहीं दिया गया तो शिक्षा कहाँ से प्राप्त हुई? नालंदा और तक्षशिला जैसे प्रख्यात विश्वविद्यालय बौद्ध विश्वविद्यालय थे और वहाँ ब्राह्मण निम्न वर्गों को शिक्षित नहीं होने दे रहे थे, यह कैसे सम्भव है? यह तर्क स्वयं निराधार सिद्ध होता है। उक्त प्रश्नों के उत्तर ही सामाजिक समरसता स्थापित करने के मूल में हैं। ऐसे प्रश्न उठने चाहिए और उनके समाधान भी होने चाहिए।
वास्तव में दिल्ली विश्वविद्यालय में रुचि तिवारी के साथ भीड़ द्वारा किया गया व्यवहार ‘दलित चिन्तकों के कथनों का प्रयोग’ है। यह प्रयोग समाज में एक मील का पत्थर साबित होगा, यह प्रयोग उस समाज के चरित्र की पहचान सिद्ध करेगा, जो पीड़ित होने का भ्रम बनाए रखना चाहता है। यह उनके लिए चेतावनी है, जो यह सोचते हैं कि हर परिस्थिति में सद्व्यवहार की सीमाओं में रहना चाहिए। यह प्रयोग बौद्धिक विमर्श में बाधक होगा। साथ ही समाज के एकजुट होने में बाधा बनेगा।
हमारे नेताओं को समझना चाहिए कि देश की पहचान ‘जाति’ के कारण नहीं अपितु राष्ट्रीयता से होती है। हम किसी भी जाति से हों, हमारी पहचान भारतीयता से ही सिद्ध होगी। इसलिए समाज को जातीय पहचानो के आधार पर बाँटना बंद कीजिए और देश के नागरिकों की बेहतरी के लिए प्रयास कीजिए। ताकि देश में समृद्धि आए और प्रत्येक नागरिक स्वत: सशक्त हो सके। जब तक देश को विविध कारणों से बाँटने के प्रयास जारी रहेंगे, तब तक देश में अराजकता का माहौल रहेगा। क्योंकि सभी के व्यक्तिगत हित टकराते रहेंगे। केवल वोट के लिए देश ने अराजकता फैलाना अपराध है।
समाज की एकता सुनिश्चित करना प्रत्येक नागरिक और नेता का प्रथम दायित्व होना चाहिए। रुचि के साथ जो हुआ, वह उसी अराजकता का प्रयोग था जो दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे शीर्ष संस्थानों की दीवारों पर कई वर्षों से लिखा जा रहा था ‘ब्राह्मण वापस जाओ’। अगर इसे हम पहले ही जातीय नफरत का सूत्रपात मान लेते तो आज ऐसी घटना भी नहीं होती। जातिवादी चिन्तक कहीं न कहीं लगातार ‘ब्राह्मणवाद’ के झूठी धारणा को बढ़ावा दे रहे थे। उसी की परिणति आज एक लड़की की गरिमा छिन्न-भिन्न होने के रूप में दिखाई दे रही है। इसे तत्काल कानूनी प्रक्रिया के पालन से रोका जाए, जिससे भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।
——
(नोट : अनुज राज पाठक दिल्ली में संस्कृत विषय के शिक्षक हैं। #अपनीडिजिटलडायरी की स्थापना से ही साथ जुड़े सदस्यों में शामिल हैं। अच्छे लेख और कविताएँ लिखते हैं। कभी-कभी श्रृंखलाबद्ध लेखन भी करते हैं।)
देश में जनगणना होने वाली है। मतलब जनसंख्या कितनी है और उसका स्वरूप कैसा है,… Read More
जय जय श्री राधे Read More
अभी एक तारीख को किसी जरूरी काम से भोपाल से पन्ना जाना हुआ। वहाँ ट्रेन… Read More
भारत के प्रधानमंत्री कार्यालय के नए परिसर का उद्घाटन 13 फरवरी 2026 को हुआ। इसे… Read More
‘भ्रष्ट’ का अर्थ है- जब कोई अपने धर्म (कर्तव्य-पथ) से दूर हट जाए और ‘आचार’… Read More
ऐसी सूचना है कि अंग्रेजों की ईस्ट इण्डिया कम्पनी फिर दिवालिया हो गई और उसका… Read More