देशभर में बीएलओ की आत्महत्याओं का कारण एसआईआर है या कुछ और?

अनुज राज पाठक, दिल्ली

शायद अधिकांश लोग कोरोना का समय भूल गए होंगे। मैं नहीं भूला। कैसे भूलूँ? उन दिनों मुझे लगभग 45 दिन बिना एक भी अवकाश के अतिसंवेदनशील क्षेत्र में कार्य करना पड़ा था। वैसे 45 दिन बहुत ज्यादा नहीं है, मगर परिस्थितियों के लिए एक क्षण भी बहुत है। उस समय मेरे जीवन का सबसे सुखद समय आने वाले था। मैं पिता बनने वाला था। उन स्थितियों में समझा जा सकता है कि मैं किस मानसिक स्थिति से जूझ रहा था। अतः अवकाश हेतु मैं अपने अधिकारी के पास गया। लेकिन उसने कह दिया- निलम्बित कर देता हूँ। मेरे पास कोई विकल्प नहीं था। अंततः मुझे कहना पड़ा आप को जो उचित लगे, निर्णय लीजिए। बाद में मेरे एक अनन्य मित्र के हस्तक्षेप से दूसरे उच्च अधिकारी ने मेरी समस्या को समझा और समाधान दिया।

उस दौरान बहुत से शिक्षक विविध गैरशैक्षिक कार्यों में लगे हुए थे लेकिन किसी ने शिकायत नहीं की और न आत्महत्या जैसे कृत्य की कोई सूचना आई। और तो और शिक्षक तब मुर्दाघरों तक में ड्यूटी दे रहे थे। समाज के किसी व्यक्ति से शिक्षकों के ऐसे कार्य के लिए एक भी प्रशंसात्मक शब्द भी नहीं सुना गया था। शिक्षक वैसे भी गैरशैक्षिक कार्य बिना अपेक्षा के नियमित रूप से करते रहते हैं। प्रशंसा मिले या न मिले, शिकायत नहीं करते। जैसे- इन दिनों बहुत से शिक्षक बीएलओ (मतदान केन्द्र स्तर के अधिकारी) का कार्य कर रहे हैं। इससे कई समस्याएँ हो रही हैं। कई लोगों को समस्याएँ हो रही हैं। इतनी कि कुछ बीएलओ तो आत्महत्या जैसे कदम भी उठा चुके हैं। यद्यपि मुझे लगता नहीं कि एसआईआर (मतदाता सूचियों का सघन पुनरीक्षण)  के कारण किया ने ऐसा किया होगा। मेरे हिसाब से देशभर में बीएलओ की आत्महत्याओं के मामले जांच का विषय हैं। वह होनी चाहिए, ताकि सही कारण पता चलें।

आत्महत्या जैसे कृत्य करने वाले बीएलओ को बहुत से लोग बुरा-भला कह रहे हैं। निकम्मे, कामचोर, आलसी और भी जाने क्या क्या? कहना भी चाहिए। सरकारी कर्मचारी समय के साथ-साथ ऐसा ही हो जाता होगा। समाज ऐसा कह रहा है, तो कुछ न कुछ सच्चाई होगी ही। धारणाएँ यूँ ही नहीं बनती। समाज लम्बे समय तक सूक्ष्म निरीक्षण करता है, इसके बाद ही धारणाएँ जन्म लेती हैं। किसी समूह के बारे में ऐसी धारणाएँ बनने में लम्बा समय लगता है। समाज ने शिक्षकों के विषय में बहुत सूक्ष्म निरीक्षण किया होगा। उसके बाद ही किसी बात को सिद्धांत के रूप में रखना शुरू किया होगा। इसलिए सरकारी शिक्षक समूह को भी आत्मचिंतन की जरूरत है।

अस्तु। समस्या यहाँ पर बीएलओ का कार्य करने वाले शिक्षक वर्ग के प्रति दृष्टिकोण की है। शिक्षक शिक्षण से अतिरिक्त कितने कार्य प्रतिदिन करता है, उसकी गिनती यहाँ कराने की आवश्यकता नहीं। आवश्यकता है, उन कार्यों को समझने की, जो प्रतिदिन के गैरशैक्षिक कार्यों के अतिरिक्त भी चुनाव आदि कार्य करने होते हैं। अधिकांश शिक्षक उन्हें करते हैं, कर रहे हैं। इसमें वास्तविक समस्या तब शुरू होती है, जब शिक्षक के ऊपर के अधिकारी अमानवीय हो जाते हैं। उन स्थितियों में शिक्षक के मानवीय पक्ष के साथ-साथ सेवा नियमों की भी उपेक्षा होती है। मुझे याद है, 2011 की जनगणना के समय एक शिक्षिका गर्भवती थी। वह अधिकारी के पास अवकाश माँगने के लिए गई। अधिकारी के पास अतिरिक्त व्यक्ति मौजूद थे, फिर उसने उन्हें अवकाश नहीं दिया गया। अधिकारी का व्यवहार अत्यधिक असंवेदनशील ही नहीं, अमानवीय था। ऐसी घटनाएँ चुनावों के समय भी प्राय: देखने में आती हैं।

वास्तव में हम दूसरे की थाली में अधिक घी देखने के अभ्यस्त हैं। अभी कुछ दिन पहले बीएलओ की आत्महत्याओं पर लोग उपहास कर रहे थे। वे निजी क्षेत्र नौकरियों के दबाव की या फिर सैन्य सेवाओं से तुलना कर रहे थे। वस्तुत: हम कोई भी क्षेत्र परिस्थितिवश या स्वेच्छा से चुनते हैं, हम जिस क्षेत्र में हैं उसके लाभ-हानि हमें ही उठाने होते हैं। हाँ, कर्तव्य निर्वाह में लापरवाही है तो अवश्य विरोध या कार्रवाई हो। पर बिना समस्याओं को समझे, दूसरे को अच्छा-बुरा कहना अनुचित है। क्योंकि न सभी शिक्षक किसी गैरशैक्षिक कार्य को दुःखी होते हुए करते हैं, न सभी खुशी से करते हैं। सबकी मानसिक, सामाजिक और पारिवारिक समस्याएँ और पृष्ठभूमि अलग अलग होती है।

यहाँ एक बात और उल्लेखनीय है कि आत्महत्या करने वाले कई बीएलओ शिक्षक नहीं थे। फिर भी समाज के उपहास के पात्र केवल शिक्षक थे। इससे समाज में शिक्षक की भूमिका और स्थिति का आकलन भी किया जा सकता है कि वह कितनी निम्नस्तर तक जा चुकी है। सरकारी शिक्षक के प्रति समाज का दृष्टिकोण निश्चित ही अशोभनीय होता जा रहा है। इसे बदलने की आवश्यकता नहीं है। इसकी जगह सरकारी शिक्षक व्यवस्था को बंद करने की आवश्यकता है। सरकारी स्कूली व्यवस्था में या तो आमूल परिवर्तन हो या फिर इसे समाप्त कर देना अपेक्षित है। इससे समाज के अहम को सन्तुष्टि तो मिलेगी। बस, समाज से इतना अवश्य कहना है, अन्य पेशों में व्याप्त भ्रष्टाचार, अराजकता आदि अव्यवस्थाओं के प्रति भी अपने विचार रखें। ताकि समस्याओं का वास्तविक समाधान हो सके। केवल शिक्षक को दोष देना अनुचित है। शिक्षक भी आप के अपने समाज का हिस्सा है, आप के अपने समाज से ही सीखता है, इसलिए उसे दोष देना अपने समाज को ही दोष देना है। दोष की जगह सुधार की तरफ ध्यान देने की अपेक्षा है। 

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(नोट : अनुज राज पाठक दिल्ली में संस्कृत विषय के शिक्षक हैं। #अपनीडिजिटलडायरी की स्थापना से ही साथ जुड़े सदस्यों में शामिल हैं। अच्छे लेख और कविताएँ लिखते हैं। कभी-कभी श्रृंखलाबद्ध लेखन भी करते हैं।) 

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