‘माँसाहारी दूध’ के बारे में सुना है? अमेरिका चाहता है, अब यह भारत में भी बिके!

टीम डायरी

‘माँसाहारी दूध’ के बारे में सुना है क्या? निश्चित रूप से नहीं सुना होगा। या फिर भारत में कम लोग ही इस बारे में जानते होंगे। क्योंकि हमारे देश में दूध को बहुत पवित्र माना जाता है। देसी गाय के दूध को तो अमृत का दर्जा दिया गया है। इस कारण कि उसमें तमाम पौष्टिक तत्त्व होते हैं, जो शरीर और दिमाग को ऊर्जा देने का काम करते हैं। औषधि के रूप में भी मानव शरीर को अपना योगदान देते हैं।

यही कारण है कि भारत आज पूरी दुनिया में  सबसे अधिक दूध उत्पादन (साल 2023-24 में 23.9 करोड़ मैट्रिक टन) करता है। हालाँकि इतने बड़े पैमाने पर दूध का उत्पादन होने के बावजूद भारत से दूध व दुग्ध उत्पादों का पर्याप्त निर्यात नहीं हो पाता क्योंकि विश्व में सर्वाधिक दूध का उपभोग भी यहीं होता है। ऐसे में, दूध और दुग्ध उत्पादों का सबसे बड़ा निर्यातक दुनिया में आज अमेरिका है।

आज इस विषय की चर्चा इसलिए क्योंकि भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक समझौता होना है। इस बाबत दोनों देशों में बातचीत चल रही है। लेकिन बातचीत में सबसे बड़ा गतिरोध है दूध। हाँ, अमेरिका चाहता है कि भारत अपना दुग्ध क्षेत्र अमेरिकी दुग्ध उत्पादों के लिए खोल दे। क्योंकि भारत में दूध का सर्वाधिक वैश्विक उत्पादन होने के बावजूद इसकी आपूर्ति पर्याप्त नहीं है। कमी है। 

मतलब अमेरिकी दुग्ध उद्योग को भारत में अपने लिए भारी सम्भावनाएँ दिखाई दे रही हैं। लेकिन भारत अपना दुग्ध क्षेत्र अमेरिका सहित अन्य किसी पश्चिमी देश के लिए खोलने को राजी नहीं है। इसका कारण? वहाँ ‘माँसाहारी दूध’ होता है। जी हाँ, ‘माँसाहारी दूध’ क्योंकि वहाँ गायों और अन्य दुधारू पशुओं को उनके भोजन में अन्य जानवरों का माँस, चर्बी, खून आदि मिलाकर खिलाया जाता है। 

गायों तथा अन्य दुधारू पशुओं को इस माँसाहारी भोजन कराने के कारण दुग्ध उत्पादन तो बढ़ जाता है लेकिन दूध की पवित्रता, उसकी पौष्टिकता, आदि सब नष्ट हो जाती है। यद्यपि अमेरिकियों और पश्चिमी जगत के लोगों को इस बात से फर्क नहीं पड़ता। लेकिन भारत में इससे बहुत फर्क पड़ता है। भारत सरकार भी यह बात जानती है। इसलिए अब तक वह इस क्षेत्र को खोलने पर सहमत नहीं है। 

इसके अलावा, दुग्ध क्षेत्र में लगे भारतीय कामगारों की आजीविका का भी मामला है। भारत के दुग्ध क्षेत्र में आठ करोड़ से ज्यादा लोग सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं। इस व्यवसाय से उनकी आजीविका चलती है। अगर भारत ने दुग्ध क्षेत्र अमेरिका और पश्चिमी देशों के लिए खोला तो इनकी आजीविका पर भी संकट आ सकता है। दूध की पवित्रता से जुड़ी आस्था और उसके महत्त्व का मामला तो अपनी जगह है ही। 

हालाँकि अभी तो यह मामला अमेरिका के साथ भारत के होने वाले व्यापारिक समझौता से जुड़ा है। ताजा-ताजा है, इस कारण सुर्खियों में आ गया। लेकिन गौर करने लायक तो यह है कि भारत दूध न सही, पर दूध पाउडर और कुछ अन्य दुग्ध उत्पादों का समय-समय पर आयात तो करता है। इनमें श्रीलंका, जर्मनी और चीन प्रमुख हैं। तो क्या वहाँ से हमें ‘शाकाहारी दूध’ के उत्पादों की आपूर्ति होती है?  

यह बड़ा सवाल है। इसका जवाब मिलना चाहिए। और जवाब न भी मिले तो न सही, जनसामान्य को इस पर ध्यान देना चाहिए कि अगर उन्हें ‘माँसाहारी दूध’ के सेवन से बचना है, तो वे किसी भी अन्य देश से आयातित दुग्ध उत्पादों का सेवन न करें। उनका सख्ती से बहिष्कार करें।

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Neelesh Dwivedi

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