अब अदालत ने भी मान लिया कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार है, तो जाँच-कार्रवाई में देर क्यों?

टीम डायरी

मद्रास उच्च न्यायालय ने बुधवार, 27 मई को एक मामले की सुनवाई के दौरान माना कि न्यायपालिका भी भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं है। साथ में यह भी माना कि न्यायाधीशों को पवित्र गाय नहीं समझा जाना चाहिए। इसके साथ ही अदालत ने ‘करुप्पू’ तमिल फिल्म पर प्रतिबंध लगाने की माँग करने वाली याचिका भी खारिज कर दी। याचिका लगाने वाले ने कहा था कि इस फिल्म में न्यायपालिका को भ्रष्ट दिखाया गया है। यह न्यायपालिका की छवि खराब करने की कोशिश है। इसलिए फिल्म के प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगाना चाहिए। मगर, न्यायाधीश जीआर स्वामीनाथन और वी लक्ष्मीनारायणन की पीठ ने इस दलील को खारिज कर दिया। 

सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों ने कहा, “न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से कोई इंकार नहीं कर सकता। भ्रष्ट न्यायाधीश थे और हैं। हमें न्यायिक भ्रष्टाचार के कई उदाहरण पता हैं। हमने देखे भी हैं। मद्रास उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ नियमित रूप से भ्रष्ट न्यायाधीशों को बाहर का रास्ता दिखाती है।” उनके मुताबिक, “न्यायपालिका में भ्रष्टाचार तभी हो सकता है जब वकीलों की परिषद के कुछ सदस्य भ्रष्टों से मिले हुए हों। उच्च न्यायालय की सतर्क निगरानी भ्रष्टों को पकड़ने और स्थिति से उचित ढंग से निपटने का माध्यम है।” सो, अब जबकि इतनी साफगोई से शीर्ष स्तर की अदालत ने मान लिया कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार है, तो फिर उसी उच्च न्याय तंत्र पर कुछ सवाल भी बनते हैं। जैसे- अभी जब इसी फरवरी महीने में राष्ट्रीय शैक्षणिक प्रशिक्षण एवं अनुसंधान परिषद द्वारा प्रकाशित कक्षा आठवीं की एक किताब में न्याय तंत्र में भ्रष्टाचार का संदर्भ शामिल हुआ तो इतनी तीखी प्रतिक्रिया क्यों? ऐसी कि मानो किसी ने दुखती रग दबा दी हो? अदालत की अवमानना जैसा क्यों माना गया उसे? 

दूसरी बात- मार्च 2025 को दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश यशवंत वर्मा के घर से करीब ढाई करोड़ रुपए की जली हुई नगदी मिली थी। आज तक उस मामले में वर्मा के खिलाफ जाँच किसी पुख्ता नतीजे पर पहुँचती क्यों नहीं दिखती? उन्हें दोषी ठहराने और उन पर कार्रवाई करने की गंभीरता क्यों नहीं नजर आती? इसके अलावा, अभी कुछ समय पहले ही भारतीय अधिवक्ता परिषद के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्र ने दावा किया था कि देश में करीब 35-40 प्रतिशत वकील फर्जी उपाधियों वाले हो सकते हैं! खुद देश के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने भी एक मामले की सुनवाई के दौरान इसकी तस्दीक की थी। उन्होंने ऐसे फर्जी उपाधिधारकों को ‘कॉकरोच’ और ‘परजीवी’ तक कहा था। यह मामला भी आखिर न्याय तंत्र के भ्रष्टाचार से ही जुड़ा है कहीं न कहीं। फिर इतने सालों से लगातार इसे नजरंदाज क्यों किया जा रहा है? इसे रोका क्यों नहीं गया? कार्रवाई क्यों नहीं हुई? 

सवाल अहम हैं। न्यायपालिका पर लोगों का भरोसा बना रहे, इसलिए इनके जवाब मिलने ही चाहिए।  

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Neelesh Dwivedi

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