मुम्बई का ब्रीच कैंडी क्लब सबूत है, कि हम अंग्रेजों की गुलामी से अब भी आजाद नहीं हैं!

टीम डायरी

क्या देश की आजादी के सात दशक से अधिक बीत जाने के बाद भी कोई यह कल्पना कर सकता है कि भारत में ऐसी जगह अब भी होगी, जहाँ अंग्रेजों का कानून, उनका हुकुम चलता होगा? अधिकांश लोग इसका जवाब ‘नहीं’ में देंगे। पर ठहरिए। यह सवाल काल्पनिक नहीं है। देश की आर्थिक राजधानी मुम्बई में अब भी एक ऐसी जगह है, जहाँ अंग्रेजों का कानून, उन्हीं का शासन और उनका ही हुकुम चलता है। और भारतीयों को लगातार याद दिलाता रहता है कि हम अब भी अंग्रेजों की गुलामी से आजाद नहीं हैं! अलबत्ता, बहुत से भारतीय जो अंग्रेजों की सोच, अंग्रेजों की भाषा और अंग्रेजों की संस्कृति को अपनाकर खुद को धन्य समझते हैं, उन्हें शायद इससे फर्क नहीं पड़ता होगा। इसलिए तो इस किस्म के लोग मुम्बई की इस जगह पर अब भी अंग्रेजों की गुलामी कर रहे हैं!! 

यहाँ बात हो रही है मुम्बई के ‘ब्रीच कैंडी क्लब’ की। अमीर लोगों का यह आलीशान क्लब दक्षिण मुम्बई के भूलाभाई देसाई मार्ग पर स्थित है। यह क्लब 1878 में स्थापित हुआ। अंग्रेजों ने खास अपने लिए यह इसे बनाया था। एक दौर था, जब इस दौर में भारतीयों को घुसने भी नहीं दिया जाता था। कोई भारतीय या अश्वेत गलती से भीतर चला जाए, तो उसे धक्के मारकर बाहर निकाल दिया जाता था। अंग्रेजों के राज में नहीं, भारत की आजादी के काफी बाद तक यह स्थिति बनी रही। अंतर्राष्ट्रीय मामलों के शीर्ष विशेषज्ञ शशि थरूर तक इस भेदभाव के शिकार हो चुके हैं। उन्होंने खुद इस बात की जानकारी सार्वजनिक की है। थरूर ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर लिखा, “यह 1960 के दशक की बात है। मेरे एक अमेरिकी दोस्त को लगा कि वह चूँकि गोरा है, तो वह अपने इसी हैसियत के दम पर मुझे भी उस क्लब में ले जा सकता है। पर वह गलत था। मुझे वहाँ से धक्के देकर बाहर निकाल दिया गया।” याद रखिए, शशि थरूर कांग्रेस के सांसद हैं और संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी विश्व की शीर्ष संस्था में रह चुके हैं। 

दरअसल, शशि थरूर के साथ यह स्थिति इसलिए बनी क्योंकि यह क्लब अंग्रेजों के बनाए एक पुराने कानून पर चलता है। और अचरज की बात है कि इसे अब तक हमारे देश तथा महाराष्ट्र की सरकारें मान्यता देती आ रही हैं। यहाँ तक कि अदालतों ने भी उसके पक्ष में ही फैसले दिए हैं। इस कानून के अनुसार, ब्रीच कैंडी क्लब में फिलहाल दो-स्तरीय व्यवस्था लागू है। पहली- शीर्ष प्रबंधन के स्तर वाली, जिसमें सिर्फ मुम्बई में अब तक रह रहे अंग्रेज (यूरोपीय समुदाय के लोग) ही सदस्य हो सकते हैं। यही समूह क्लब से जुड़े छोटे-बड़े फैसले करता है। दूसरे स्तर की व्यवस्था सामान्य सदस्यों से जुड़ी है। इनमें अभिजात्य वर्ग के भारतीय लोग ही ज्यादा हैं। क्योंकि आम आदमी तो इस क्लब की सदस्यता के बारे में सोच भी नहीं सकता। तो इन दूसरे स्तर के सदस्यों की संख्या क्लब में करीब 4,000 है। मगर वास्तव में ये ‘दोयम दर्जे’ के ही लोग हैं, जिन्हें क्लब के किसी निर्णय में बात रखने का अधिकार नहीं है।

और सुनिए, इन ‘दोयम दर्ज’ के ‘गुलाम भारतीयों’ को भी ब्रीच कैंडी क्लब की सदस्यता का मौका कैसे मिला? इसका भी एक दिलचस्प किस्सा है। मामला लगभग उसी दौर का है, जब शशि थरूर को क्लब से इसलिए धक्के देकर निकाला गया था कि वह अश्वेत भारतीय हैं। उस वक्त एक अंग्रेज सदस्य अपने अमेरिकी मित्र को लेकर क्लब में चले गए थे। वह अमेरिकी वास्तव में शीर्ष राजनयिक थे, लेकिन अश्वेत। लिहाजा, उन्हें अश्वेत होने के कारण ही क्लब में घुसने की अनुमति नहीं दी गई। उन्हें बाहर से ही वापस लौटना पड़ा। अलबत्ता, मामला चूँकि अमेरिकी राजनयिक का था, इसलिए उसने जल्दी ही तूल पकड़ लिया। इसके बाद तमाम लीपा-पोती हुई, मान-मनौव्वल हुआ, क्लब की आंतरिक व्यवस्था में कुछ बदलाव किए गए। अंतत: फिर भारतीयों को भी इसकी सदस्यता मिलने लगी। और दोयम दर्जे के अभिजात्य किंतु गुलाम भारतीय आज अंग्रेजों की उसी कृपापात्रता पर इतराते हैं। है न अचरज की बात? इसी कारण सबसे ऊपर ही लिखा था कि यह क्लब सबूत है कि हम आज भी अंग्रेजों के गुलाम हैं। 

और हाँ, सरकारी जमीन पर स्थित मुम्बई के इस ब्रीच कैंडी क्लब का मामला भी अभी सुर्खियों में तब आ सका है, जब दिल्ली के ऐसे ही अभिजात्यवर्गीय क्लब जिमखाना को खाली कराने की केन्द्र सरकार ने कवायद शुरू की है। क्योंकि वहाँ तमाम अनियमितताएँ पाई गईं हैं। पर इस ब्रीच कैंडी का क्या? गुलामी के इस प्रतीक के बारे में तो अब तक कोई सुध लेने वाला भी नहीं था? और आगे होगा, पता नहीं?

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Neelesh Dwivedi

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Neelesh Dwivedi

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