पहलगाम आतंकी हमला : कायराना धर्मनिरपेक्षता का लबादा उतार फेंकिए अब!

अनुज राज पाठक, दिल्ली

लोग कह रहे हैं कि यह, पहलगाम का आतंकी हमला कश्मीरियत को बदनाम करने की कोशिश है। इसमें पहली बात कि अगर यह भारतीयता न होकर कश्मीरियत है, तो इसे बदनाम ही होना है। कश्मीरियत है क्या? यह अपने आप में बड़ा सवाल है। भारत देश में रहकर अलग-अलग राष्ट्रीयता का ख्याल ही बदनामी का ख्याल है। 

वास्तव में भारतीयता की जगह कश्मीरियत, बिहारियत, बंगालियत जैसी शब्दावली ही भारत की एकात्मता को नष्ट करने वाला ख्याल है। जब आप एक भारतीय राष्ट्रीयता की जगह अलग-अलग क्षेत्र की भावना को बढ़ा रहे होते हैं, तब आप भारत की राष्ट्रीय भावना को छिन्न-भिन्न करने का कार्य कर रहे होते हैं। उसे किसी भी तरह उचित नहीं ठहराया जा सकता।

इसी कश्मीरयत, इसी मराठीयत, इसी बंगालियत, इसी तमिलीयत आदि ने भारत में अलग-अलग क्षेत्रों के नागरिकों को मरने-मारने को प्रेरित किया है। अभी हाल ही में एक जगह हिन्दी बोलने पर सेना के एक अधिकारी और उसके परिवार के साथ मारपीट की गई। कभी भाषा के नाम पर, कभी क्षेत्र के नाम पर, तो कभी धर्म के नाम पर हिंसा होती ही रहती है। इस सब में एक बात समान रूप से पाई जाती है कि हिन्दू सभी जगह समान रूप से मारा जाता है। इसमें आश्चर्य की बात यह भी है कि हिन्दू ही इस एकल या सामूहिक नरसंहार को उचित ठहरा देता है!

ऐसे हिन्दुओं को भी पहचानने की जरूरत है, जो आतंकवाद को बढ़ावा देते हैं। याद रखिए, महाभारत युद्ध में कौरव सेना के वे सभी सैनिक भी मारे गए थे, जिनका किसी निर्णय में कोई हाथ नहीं था। उनका बस इतना ही अपराध था कि वे अधर्म के साथ खड़े हुए थे। यही बात आज भी लागू है। आतंकियों का पक्ष लेने वाले, उनकी पैरवी करने वाले भी आज उतने ही दोषी हैं, जितने कि हत्यारे आतंकी।

नेशनल कॉन्फ्रेंस के सांसद आगा सैयद रूहुल्लाह मेहंदी ने कुछ महीने पहले कहा था कि कश्मीर में पर्यटन असल में, सांस्कृतिक हमला है। उनका ये बयान मंगलवार (22 अप्रैल, 2025) को पहलगाम में हुए हमले की पूर्व पीठिका समझा जा सकता है। उन्होंने काश्मीर पर्यटन ‘कल्चरल इन्वेज़न’ कहा था। दावा किया था कि इससे कश्मीर की असल पहचान खत्म हो रही है। सोचिए, ऐसी कौन सी पहचान है जो भारत से अलग होने पर भी बचेगी? यह कौन सी कश्मीरियत है?

जब से भारत स्वतंत्र हुआ है, तब से काश्मीर में हिंसा का दौर जारी है। वहाँ धर्म पूछकर हत्याएँ की जा रही है। इस हिंसा में अक्सर ‘हिन्दुओं की हत्या’ ही उद्देश्य रहा है। यह हत्या बाहर से आए इस्लामिक आतंकियों ने की हो, या स्थानीय इस्लामिक अलगाववादियों ने लक्ष्य केवल हिन्दू ही रहा है। इसी कश्मीरियत की अलगाववादी भावना ने काश्मीर से हिन्दुओं का सामूहिक नरसंहार कराया था, उन्हें पलायन को मजबूर किया।

इसीलिए हमें अब अपनी कायराना धर्मनिरपेक्षता और सहिष्णुता के लबादे को उतार फेंकने की जरूरत है। धर्म और राष्ट्र के लिए और भारतीयता की भावना को पुष्ट करने ले लिए इस्लामिक आतंकियों को उत्तर देने की जरूरत है। नहीं तो भारतीय समाज हमेशा की तरह प्रताड़ित होता रहेगा। चाहे वह जगह काश्मीर हो, मुर्शिदाबाद हो, कैराना हो या कोई अन्य जगह हो। स्थान बदलते रहेंगे लेकिन हिन्दू जीवन खतरे में ही रहेगा।

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(नोट : अनुज दिल्ली में संस्कृत शिक्षक हैं। #अपनीडिजिटलडायरी के संस्थापकों में शामिल हैं। अच्छा लिखते हैं। इससे पहले डायरी पर ही ‘भारतीय दर्शन’ और ‘मृच्छकटिकम्’ जैसी श्रृंखलाओं के जरिए अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं। समय-समय पर दूसरे विषयों पर समृद्ध लेख लिखते रहते हैं।)  

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