सांकेतिक तस्वीर
टीम डायरी
यह कैसा ‘लैंस’ है, जो इंसानों में ऐसा भेद करता है? कैसा ‘लैंस’ है, जिसकी ‘कार्ट’ (गाड़ी) में एक महिला हिजाब पहनकर बैठ सकती है, लेकिन दूसरी महिलाएँ माथे पर बिन्दी नहीं लगा सकतीं? पुरुष सिर पर पगड़ी बाँध सकते हैं, गोल टोपी लगा सकते हैं, लेकिन माथे पर तिलक नहीं लगा सकते? या हाथ में रक्षासूत्र नहीं पहन सकते? और विचित्र बात है कि यह सब भेदभाव उस कम्पनी में हो रहा है, जिसका मालिक खुद हिन्दू है। यह उस देश में हो रहा है, जहाँ बहुसंख्यक आबादी हिन्दू है। अचरज की बात नहीं है?
जी हाँ, आँखों के चश्मे बेचने वाली कम्पनी ‘लैंसकार्ट’ के बारे में ही बात हो रही है, जिसका ‘चश्मा’ आज तक भी बदल नहीं सका है। वह अब तक देश के करोड़ों नागरिकों को हिन्दू-मुसलमान के भेद से देखती है और यही नहीं, मुस्लिमों को सिर्फ इस आधार पर उनकी आस्था से जुड़े प्रतीक चिन्हों के उपयोग की अनुमति देती है, क्योंकि उन्हें ऐसी सुविधा न मिलने पर वे हिंसक हो जाते हैं। जबकि हिन्दुओं को यही कम्पनी इसलिए लापरवाही से लेती है, क्योंकि वे उदारभाव के माने जाते हैं, सहजता से नियमों का पालन करते हैं।
विचित्र है न? किन्तु सच है! हालाँकि, इस कम्पनी के संस्थापक ने पियूष बंसल ने स्पष्ट किया है कि “कर्मचारियों की वेश-भूषा से सम्बन्धित जो आदेश सोशल मीडिया पर प्रसारित हो रहा है, वह पुराना है। वर्ममान में कम्पनी ने ऐसी कोई भी नीति नहीं अपना रखी है। सभी को अपनी आस्था से जुड़े प्रतीक चिन्हों के उपयोग अनुमति है।” ठीक है, पियूष जी की बात मान लेते हैं। मगर गौर करने लायक यह तो है ही न, कि ऐसी नीति कभी तो उनकी कम्पनी में लागू रही ही थी। उन्होंने इस बात से इंकार भी नहीं किया है। तो फिर उनके खिलाफ सवाल क्यों न उठाए जाएँ? और उन्हें उनका जवाब निष्पक्षता से क्यों नहीं देना चाहिए? और साेचने की बात यह भी है कि इस तरह की नीतियाँ हमारे देश में कब तक चलती रहेंगीं और हम यूँ ही चुपचाप देखते रहेंगे?
अभी सोमवार, 20 जुलाई को संसद का मॉनसून सत्र शुरू हुआ। इससे कुछ समय पहले… Read More
कलि युग में भक्ति मार्ग पाखण्ड से घिरा रहता है, इसलिए भगवान के भजन-पूजन, नाम… Read More
शिक्षा प्रणाली में मूलभूत सुधार और केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की माँग… Read More
भाषा को लेकर बेवजह की हाय-तौबा मची हुई इन दिनों। वजह वही, पीढ़ियों से भारतीय… Read More
जिन्दगी अपनी है, चुनाव भी अपने ही होते हैं। ऐसा अक्सर कहा जाता है। लेकिन… Read More