प्रतीकात्मक तस्वीर
टीम डायरी
बेंगलुरू में सूचना-प्रौद्योगिकी क्षेत्र की एक महिला पेशेवर हैं, अदिति द्विवेदी। वह पहले अमेरिका में कई बरसों तक काम कर चुकी हैं। हालाँकि अब भारत लौट आई हैं। उन्होंने इन दिनों मीडिया-सोशल मीडिया पर नई बहस छेड़ दी है। मुद्दा है, तनख्वाह का। उनका तर्क है कि भारत में किसी पेशेवर को जितनी तनख्वाह मिलती है, उतना तो अमेरिका में उसी स्तर पर काम करने वालों का ‘जेब खर्च’ होता है। यही नहीं, भारत में पेशेवरों की तनख्वाह का बड़ा हिस्सा तमाम तरह के कर चुकाने में चला जाता है। इससे ऐसा लगने लगता है जैसे ‘तीसरी दुनिया’ (गरीब) को मूलभूत सुविधाएँ देने के लिए पूरा पैसा इस ‘पहली दुनिया’ (विकसित) से लिया जा रहा हो।
अदिति की बातों में और भी बहुत कुछ है, लेकिन यहाँ #अपनीडिजिटलडायरी के लिए इतना ही पर्याप्त है। कारण कि #डायरी हमेशा से काम करने वालों के लिए कार्य-जीवन के बीच संतुलन बनाए रखने की पक्षधर रही। ऐसे में, तनख्वाह और करों के भुगतान में विसंगति का मसला ही इस ‘सरोकार’ से जुड़ता है। लिहाजा, इतने तक की बात करना उचित होगा। तो आगे प्रश्न यह उठता है कि जब अदिति जैसे पेशेवरों में अपनी तनख्वाह और करों के भुगतान में विसंगति के प्रति असंतोष या असहजता इस स्तर की है, तो फिर कोई उनसे हर सप्ताह 70-80 घण्टे काम की अपेक्षा कैसे कर सकता है? और उनसे इस तरह की अपेक्षाएँ लगाई ही क्यों जानी चाहिए?
यहाँ यह बता देना उचित होगा कि सूचना-प्रौद्योगिकी क्षेत्र की अग्रणी भारतीय कम्पनी इन्फोसिस के संस्थापक नारायण मूर्ति एक से अधिक बार यह बात कह चुके हैं कि “पेशेवरों को सप्ताह में 70 घण्टे (छह दिन रोज करीब 12 घण्टे) काम करना चाहिए। तब ही देश तेजी से तरक्की कर सकेगा।” ऐसे ही लार्सन एण्ड टुब्रो कम्पनी के मालिक एसएस सुब्रमण्यन तो मूर्ति से भी आगे निकल गए। उनका कहना है कि कर्मचारियों को “रविवार के दिन भी काम पर आना चाहिए। घर पर बैठे-बैठे पत्नी का चेहरा कब तक देखेंगे।” अलबत्ता, इस तरह के बयानों के बीच अब तक किसी कम्पनी के मालिक या शीर्ष पदाधिकारी ने काम के दबाव के अनुरूप वेतन देने की बात नहीं की।
ऐसे में, इसका मतलब क्या निकाला जाए? यही न कि तमाम निजी कम्पनियाँ, कम से कम भारत में तो न्यूनतम वेतन देकर कर्मचारियों से अधिक से अधिक काम कराना चाहती हैं! और अगर यह बात थोड़ी भी सही है तो फिर यह मानकर चलना चाहिए कि अदिति की तरह आने वाले समय में कुछ पेशेवर भी सामने आने वाले हैं। ये लोग काम के दबाव, कर भुगतान में विसंगति और काम की तुलना में कम तनख्वाह का मुद्दा किसी न किसी तरीके से उठाते रहने वाले हैं। तो क्या इसे विरोध के सुरों का सार्वजनिक प्रदर्शन कह सकते हैं?
सोचिएगा!
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