नीलेश द्विवेदी, भोपाल मध्य प्रदेश
गोस्वामी श्री तुलसीदास जी द्वारा लिखे गए और भारत में जन-जन प्रिय श्री रामचरित मानस की तरह ही श्री भक्तमाल ग्रंथ भी है। वृन्दावन में स्थित श्री मलूक पीठ के वर्तमान प्रमुख श्री राजेन्द्रदास जी महाराज का ऐसा कहना है। यही नहीं, श्री भक्तमाल के लिखे जाने के समय का भी श्री राजेन्द्रदास जी महाराज जब अनुमान लगाते हैं, तो उसे श्री रामचरित मानस के आस-पास ही पाते हैं। गीता प्रेस द्वारा प्रकाशित श्री भक्तमाल ग्रंथ के लिए लिखे अपने परिचयात्मक लेख में वह कहते हैं, “यह एक इतिहास-ग्रंथ भी है। इसमें संवत् आदि के द्वारा कालनिर्णय की शैली को नहीं अपनाया गया है। तथापि इसकी भक्त-गाथाओं में इतिहास के अनेक बिखरे सूत्र प्राप्त होते हैं।”
यहाँ श्री राजेन्द्रदास जी महाराज द्वारा लिखी गई बात के अगले हिस्से में जाने से पहले यह बता देना जरूरी है कि गोस्वामी श्री तुलसीदास जी ने श्री रामचरित मानस की शुरुआत में इस ग्रंथ को लिखे जाने की तिथि का स्पष्ट उल्लेख किया है। श्री तुलसीदास जी लिखते हैं, “सादर सिवहि नाइ अब माथा। बरनउँ बिसद राम गुन गाथा॥ संबत सोरह सै इकतीसा। करउँ कथा हरि पद धरि सीसा॥ नौमी भौम बार मधुमासा। अवधपुरीं यह चरित प्रकासा॥” इसका अर्थ है- अब मैं आदरपूर्वक भगवान शिवजी को सिर नवाकर, श्री रामचंद्रजी के निर्मल गुणों की कथा का वर्णन करता हूँ। श्री हरि (प्रभु) के चरणों में अपना सिर रखकर, संवत् 1631 में इस कथा का आरम्भ करता हूँ। चैत्र के महीने की नवमी तिथि, मंगलवार का दिन और अयोध्यापुरी वह स्थान, जहाँ यह चरित्र प्रकाशित हुआ। यानि इसे लिखना शुरू किया गया। यह वर्णन बालकाण्ड में है।
इस कालखण्ड को ईस्वी सन् की नजर से देखें तो अभी 2026 का साल चल रहा है। जबकि विक्रम संवत् है 2083, जिसमें 1631 घटाएँ तो 452 साल पीछे का कालखण्ड आता है। इस क्रम से विक्रम संवत् 1631 में ईस्वी सन् हुआ 1574, जब श्री रामचरित मानस का लेखन शुरू हुआ, यह स्पष्ट है। लेकिन जैसा श्री राजेन्द्रदास जी महाराज ने बताया- श्री भक्तमाल ग्रंथ में उसके रचयिता श्री नाभादास जी ने इतनी स्पष्टता से उसे लिखे जाने की तिथि आदि का उल्लेख नहीं किया है। फिर भी वह अपने अध्ययन आँकलन से अनुमान लगाते हैं, “श्री भक्तमाल का रचनाकाल विक्रम संवत् 1650 से 1680 के बीच माना गया है। श्री नाभा गोस्वामी ने, जिनका गुरुप्रदत्त नाम श्री नारायणदास था, इसकी रचना जयपुर के गलतापीठ नामक स्थान में की।”
मतलब श्री रामचरित मानस की रचना के 19वें साल से 49वें साल के बीच श्री भक्तमाल ग्रंथ लिखा गया। इसे ईस्वी सन् की नजर से देखें तो साल 1593 से 1623 के बीच श्री भक्तमाल ग्रंथ की रचना हुई। नागरिक इतिहास की दृष्टि से गौर करें तो इसी दौर में उत्तर भारत में भक्ति-आंदोलन (दूसरा चरण) भी चरम पर रहा। वह मुस्लिम शासकों के अत्याचारों के खिलाफ जनजागरण अभियान भी था। हिन्दी साहित्य के जाने-माने इतिहासकार आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने उत्तर भारत में भक्तिकाल का समय सन् 1318 से 1643 के बीच माना है। अन्य इतिहासकार भी ऐसा ही मानते हैं। हालाँकि भक्ति आंदोलन की शुरुआत दक्षिण भारत से मानी जाती है। वहाँ छठवीं से लेकर 13वीं शताब्दी तक यह आंदोलन चला। वह भक्ति-आंदोलन का पहला चरण था।
भक्ति-आंदोलन के इन्हीं दो कालखण्डों में हिन्दुस्तान में अनेक भक्ति-सम्प्रदाय भी उभरे। उन्हीं में से एक है- राममार्गी भक्ति वाला रामानन्द सम्प्रदाय। दिलचस्प बात है कि गोस्वामी श्री तुलसीदास जी और गोस्वामी श्री नाभादास जी, दोनों श्री रामानन्द सम्प्रदाय के ही सिद्ध पुरुष हैं। इसी तरह अयोध्या और गलता तीर्थ, दोनों रामानन्द सम्प्रदाय के प्रमुख स्थलों में शामिल हैं। कहने का मतलब यह है कि श्री रामचरित मानस और श्री भक्तमाल दोनों ही श्री रामानन्द सम्प्रदाय के दो महान् रचनाकारों की श्रेष्ठतम रचनाएँ हैं, जो आज 450 साल बाद भी हिन्दुस्तान की जनचेतना को समान रूप से प्रकाशित कर रही हैं। उसे धर्म का रास्ता दिखा रही हैं।
इसके बाद शैली की बात करें तो गोस्वामी श्री तुलसीदास जी ने श्री रामचरित मानस को अधिकांशत: दो चरण वाले दोहों और चार चरण की चौपाइयों में लिखा है। जबकि गोस्वामी श्री नाभादास जी ने श्री भक्तमाल की रचना छह चरण वाले छप्पय छन्दों की शैली में की है। जैसे- मंगलाचरण के बाद पहले छप्पय में गोस्वामी श्री नाभादास जी लिखते हैं, “जय जय मीन बराह कमठ नरहरि बलि-बावन। परसुराम रघुबीर कृष्ण कीरति जग पावन।। बुद्ध कलक्की ब्यास पृथु हरि हंस मन्वंतर। जग्य रिषभ हयग्रीव धुरुव बरदैन धन्वंतर।। बद्रीपति दत कपिलदेव सनकादिक करुना करौ। चौबीस रूप लीला रुचिर (श्री) अग्रदास उर पद धरौ।।” इस तरह श्री नाभादास जी शुरू में ही एक छप्पय में भगवान के 24 अवतारों का बखान कर देते हैं। यद्यपि ध्यान रखने की बात यह भी है कि सामान्य प्रचलित धारणा में भगवान के 10 अवतार ही प्रमुख माने जाते रहे हैं।
आगे के समय में श्री भक्तमाल को पढ़ने-पढ़ाने और प्रचार-प्रसार करने वाले जो सिद्ध संत, महापुरुष हुए, वे ’भक्तमाली’ कहलाए। जैसे कि श्री राजेन्द्रदास जी महाराज भी ‘भक्तमाली’ हैं। ये सब लोग प्रमुख रूप से रामानन्द सम्प्रदाय से सम्बन्ध रखने वाले रहे। अलबत्ता, श्री भक्तमाल के यात्रा-क्रम में इस सम्प्रदाय परम्परा में ही एक रोचक मोड़ भी आता है। यह बात है विक्रम संवत् 1769 यानि ईस्वी सन् 1712 की। मतलब श्री भक्तमाल ग्रंथ लिखे जाने के करीब 90 साल बाद की घटना है। उस समय श्रीकृष्ण भक्ति परम्परा के एक सिद्ध संत हुए श्री प्रियादास जी। उन्हें एक बार प्रेरणा हुई कि गोस्वामी श्री नाभादास जी के मूल भक्तमाल ग्रंथ को विस्तार देना है, उसकी व्याख्या करनी है। और उन्होंने इस प्रेरणा को भगवान का ही आदेश मानकर अपने माथे पर लिया तथा श्री भक्तमाल की टीका लिख डाली। उसे ‘भक्तिरस प्रबोधिनी’ कहा जाता है। आज गोस्वामी श्री नाभादास जी का भक्तमाल ग्रंथ, जो पहले ‘भक्तदाम’ कहलाता था, प्रियादास जी की ‘भक्तिरास प्रबोधिनी’ के बिना पूरा नहीं होता। इनका संयुक्त रूप ही ‘भक्तमाल’ कहा जाता है।
अलबत्ता यहाँ दिलचस्प बात एक और है। यह कि श्री प्रियादास जी को भक्तमाल का विस्तार करने की प्रेरणा भी तब हुई, जब वह जयपुर के गलता तीर्थ में आए हुए थे। बड़ी रोचक है यह कहानी, और श्री नाभादास जी तथा श्री प्रियादास जी के जीवन प्रसंग भी। उन पर हम गौर करेंगे अगली कड़ी में… अभी के लिए बस इतना ही।
श्री राधाकृष्णार्पणम् अस्तु…, श्री राधाकृष्णाभ्याम् नम:। श्री राधा-कृष्ण को समर्पित। श्री राधा-कृष्ण को प्रणाम।
—–
नोट : यह श्रृंखला गीता प्रेस की आधिकारिक पुस्तक ‘श्री भक्तमाल’ में उल्लिखित कथा-प्रसंगों पर आधारित है। इसके प्रकाशन-प्रसारण के पीछे हमारा उद्देश्य सिर्फ इतना है कि गीता प्रेस के ऐसे उच्च स्तर के ऐतिहासिक, पौराणिक महत्त्व के ग्रंथ के प्रचार-प्रसार में #अपनीडिजिटलडायरी की ओर से थोड़ा योगदान हो सके। साथ ही #डायरी से जुड़े पाठकों को इसका लाभ हो। बहुत जल्द हम इसी श्रृंखला को #अपनीडिजिटलडायरी के यूट्यूब चैनल पर भी शुरू करने का इरादा रखते हैं।)
—-
श्रृंखला की पिछली कड़ियाँ
4 – ‘सरल भक्तमाल’-4…: असाधारण ग्रंथ, जिसकी कहानियाँ भगवान भी मन लगाकर सुनते हैं!
3 – ‘सरल भक्तमाल’-3…ठाकुर जी ने ‘अप्रत्यक्ष प्रोत्साहन’ दिलाया श्रीराजेन्द्रदास जी महाराज से!
2 – ‘सरल भक्तमाल’-2…ठाकुर जी ने भक्तमाल की सेवा में मुझे कैसे लगाया?
1- सरल भक्तमाल’-1…आखिर इसकी जरूरत क्यों?
