अरावली बंजर भूमि नहीं जीवित अवसंरचना है, इसे सिर्फ ऊँचाई से मत नापिए

अभिषेक जैन ‘घुवारा’, टीकमगढ़, मध्य प्रदेश

अरावली पर्वतमाला विश्व की सबसे प्राचीन पर्वत शृंखलाओं में से एक है। यह पश्चिमी भारत में एक मौन पारिस्थितिक प्रहरी के रूप में सदियों से खड़ी रही है। यह पर्वतमाला लगभग 3.2 अरब वर्ष पुरानी बताई जाती है। इसका फैलाव लगभग 692 किलोमीटर का है। इसकी सबसे ऊँची चोटी राजस्थान के माउण्ट आबू में स्थित गुरु शिखर है, जिसकी ऊँचाई 1,722 मीटर है। अरावली पर्वतमाला की जलवायु शुष्क और अर्ध-शुष्क है। इसमें औसत वार्षिक वर्षा 400-600 मिलीमीटर है। चंबल, बनास, साबरमती, आदि नदियाँ निकलती हैं इस पर्वतमाला से।

अरावली पर्वतमाला में 500 से अधिक प्रजातियों के पौधे और 200 से अधिक प्रजातियों के जानवर पाए जाते है। देश की राजधानी दिल्ली तक फैली यह शृंखला भूजल पुनर्भरण, मरुस्थलीकरण पर नियंत्रण, जलवायु संतुलन तथा धूल और प्रदूषकों को रोकने जैसे महत्त्वपूर्ण कार्य करती है। अरावली बंजर भूमि नहीं है, जिसे ‘उपयोगी’ बनाने के लिए बदला जाए यह जीवित अवसंरचना है। जल सुरक्षा, जलवायु सहनशीलता और सार्वजनिक स्वास्थ्य के रूप में जो सेवाएँ यह प्रदान करती है, उनकी भरपाई कृत्रिम उपायों से नहीं हो सकती। जब नीति निर्माण में पर्यावरणीय परिसम्पत्तियों का मूल्य कम आँका जाता है, तो तात्कालिक आर्थिक लाभ दीर्घकालिक सामाजिक हानि में बदल जाते हैं। हालिया विवाद, जिसमें अरावली की कानूनी परिभाषा को पुनर्परिभाषित किया गया है, ने इस प्राचीन पर्वतमाला को ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है, जहाँ शब्दावली ही उसके अस्तित्त्व का भविष्य तय कर सकती है।

विवाद के केन्द्र में अरावली पहाड़ियों की एक नई, समान और तकनीकी परिभाषा है, जिसमें न्यूनतम ऊँचाई को मुख्य मानक बनाया गया है। प्रशासनिक दृष्टि से मानकीकरण भले ही सरल प्रतीत हो, पर प्रकृति सीधी रेखाओं में कार्य नहीं करती। छोटी पहाड़ियाँ, चट्टानी उभार, ढलान और असमतल भू-आकृतियाँ, जो इस ऊँचाई के मानक से नीचे आती हैं, सब मिलकर एक ऐसा पारिस्थितिक तंत्र बनाती हैं, जो जलधारण और जैव विविधता के लिए अनिवार्य है। ऊँचाई को कार्यात्मक महत्व से ऊपर रखना भू-दृश्यों की भाषा को न समझने के समान है। इसके दुष्परिणाम पहले से संवेदनशील क्षेत्रों में अधिक गम्भीर हो सकते हैं। 

राजस्थान की नाजुक भूजल व्यवस्था अरावली के जलग्रहण क्षेत्रों पर अत्यधिक निर्भर है। हरियाणा और दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के लिए यह पर्वतमाला पश्चिम से आने वाली धूल और प्रदूषण के विरुद्ध प्राकृतिक दीवार का काम करती है। इन पहाड़ियों का विखण्डन, चाहे वह खनन से हो या अवसंरचना परियोजनाओं के माध्यम से या फिर अन्य किसी रूप में, भूजल स्तर और वायु गुणवत्ता में अधिक गिरावट ला सकता है। इसका मूल्य न्यायालयों में नहीं, बल्कि घरों, खेतों और अस्पतालों में चुकाना पड़ेगा, यह समझने की बात है।

इसलिए हमें दलगत राजनीति से ऊपर उठना होगा। आवश्यकता एक ऐसे विज्ञान-आधारित और सहभागी ढाँचे की है, जो भू-आकृतिक स्वरूप के साथ-साथ पारिस्थितिक कार्यों को भी महत्त्व दे। रिमोट सेंसिंग, जीआईएस मानचित्रण और जलवैज्ञानिक मॉडलिंग जैसे आधुनिक उपाय ऊँचाई के मापदण्ड से परे उच्च पारिस्थितिक मूल्य वाले क्षेत्रों की पहचान में सहायक हो सकते हैं। संरक्षण को तब सटीक रूप से अनुकूलित किया जा सकता है, न कि कमजोर।

अंततः अरावली विवाद भारत के पर्यावरणीय भविष्य से जुड़ा है ,विकास के मार्ग पर आगे बढ़ते भारत के लिए आवश्यक है कि अरावली को केवल मानचित्र पर ऊँचाइयों के रूप में नहीं मापा जाए। इसे क्षेत्र के पर्यावरणीय और मानवीय इतिहास से जुड़ी जीवनरेखा के रूप में देखा जाए। हमें समझना होगा कि प्राचीन पहाड़ियाँ राजनीतिक कार्यकालों में पुनर्जीवित नहीं की जा सकतीं। एक बार समतल हो जाने पर वे सदा के लिए खो जाती हैं।

एक बात और। अरावली पर्वतमाला का नामकरण इंद्र और वृत्र की कथा से भी जुड़ा है। कहा जाता है कि इंद्र ने वृत्र को मारने के लिए वज्र का उपयोग किया था। इससे अरावली पर्वतमाला का निर्माण हुआ। यहाँ मौर्य और गुप्त काल के कई अवशेष भी पाए गए हैं। साथ ही कई प्राचीन किलों और मन्दिरों से पता चलता है कि इसका इतिहास और संस्कृति भी बहुत समृद्ध है। इसीलिए हमें अरावली पर्वतमाला को एक जीवित अवसंरचना के रूप में देखना चाहिए, न कि केवल एक भू-आकृतिक संरचना के रूप में। उसी हिसाब से इससे जुड़ा निर्णय लिया जाना चाहिए। 

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(नोट : अभिषेक टीकमगढ़, मध्य प्रदेश के समाजसेवी एवं राजनेता पवन जैन ‘घुवारा’ के परिवार के सदस्य हैं। #अपनीडिजिटलडायरी के पाठक हैं। डायरी को उनका लेख व्हाट्स एप के जरिए प्राप्त हुआ है।) 

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