जो जान बचाने आए, वे अपनी जान बचाते रहे, और वह जान से हाथ धो बैठा!

टीम डायरी

गोस्वामी तुलसीदास जी श्रीरामचरित मानस में लिख गए हैं, “का वर्षा जब कृषि सुखाने, समय चुके पुनि का पछताने।” मतलब ऐसी बारिश किस काम की जो खेत की फसल सूख जाने के बाद हो। बारिश तब होनी चाहिए, जब उसकी जरूरत हो, सही समय पर हो। नहीं तो समय निकल जाने के बाद पछतावे के सिवा कुछ हाथ में नहीं रहेगा और पछताने से भी कुछ न होगा। 

उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा में हुई एक घटना के मामले में यही हुआ है। शुक्रवार, 16 जनवरी देर रात की घटना है। एक हिसाब से 17 जनवरी, शनिवार कह सकते हैं क्योंकि रात 12 बजे के बाद जब हादसा हुआ तब तक तारीख बदल चुकी थी। एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी में काम करने वाले सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता रात को दफ्तर से अपने घर लौट रहे थे। धुंध बहुत अधिक थी, इसलिए उन्हें ज्यादा दूर तक दिखाई नहीं दे रहा था। तभी, ग्रेटर नोएडा के सेक्टर-150 के पास मोड़ पर युवराज की कार सड़क किनारे की रेलिंग से टकराई और उसे तोड़ते हुए निर्माणाधीन इमारत के तलघर में जा गिरी। उसमें पानी भरा था और गहराई भी अधिक थी। इस पर दिक्कत यह कि युवराज को तैरना भी नहीं आता था। इसके बावजूद वह जैसे-तैसे कार से बाहर निकलकर उसकी छत पर जा खड़े हुए और मदद को चिल्लाने लगे। उन्होंने अपने पिता और एक दोस्त को फोन लगाया। 

दोस्त कुछ ही देर में मौके पर पहुँच गया। उसने, और युवराज के पिता ने भी घर से, मदद के लिए पुलिस, राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (एनडीआरएफ), राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल (एसडीआरएफ), आदि को फोन लगाया। पुलिस और दमकल के जवान तो तुरंत मौके पर पहुँच गए। अब तक रात के करीब एक बज चुके थे। युवराज डूबे नहीं थे। जान बचाने के लिए संघर्ष कर रहे थे और बाहर खड़े लोगों से लगातार गुहार लगा रहे थे कि किसी तरह वे उन्हें बचा लें, वह मरना नहीं चाहते। लेकिन किनारे खड़े लोग, जो उन्हें बचाने आए थे, वे ‘बहाने’ बना रहे थे- पानी बहुत ठण्डा है। नीचे गहराई में लोहे की छड़ें भी हैं। इसलिए वे पानी में नहीं उतर सकते! और इंतजाम करते हैं। हालाँकि कोई ‘इंतजाम’ हुआ नहीं और युवराज डूब गए, सबकी आँखों के सामने। 

पुलिस और दमकल वालों की दलीलों को यहाँ ‘बहाना’ इसलिए लिखा गया क्योंकि युवराज के डूबने के महज 10 मिनट बाद मोहिन्दर नाम का एक डिलीवरी एजेंट वहाँ से गुजरा तो भीड़-भाड़ देखकर रुक गया। उसने भी पुलिस, दमकल और एसडीआरएफ के लोगों (वे भी अब तक आ चुके थे) से अपील की कि वे पानी में जाएँ, युवराज की साँसें अब भी चल रही होंगी। मगर इन ‘कथित बचावकर्मियों’ में से कोई इसके लिए तैयार नहीं हुआ। तब मोहिंदर पानी में कूद गया। उसे न तो पानी ठण्डा लगा, न ही किसी लोहे की छड़ का डर। उसने करीब आधे घण्टे तक गहराई में जाकर युवराज को ढूँढ़ने की कोशिश की। लेकिन वह सफल नहीं हो सका। 

आखिरकार सुबह चार-पाँच बजे के करीब एनडीआरएफ के बचावकर्मी उसी ठण्डे और लोहे की छड़ों वाले पानी में उतरे और युवराज के बेजान शरीर को बाहर निकाल कर ले आए। तो क्या पहले से इसी बात का इंतजार किया जा रहा था कि युवक जब जान गँवा बैठेगा, तब उसे बाहर निकालेंगे? सवाल तीखा है, लेकिन जवाब शासन-तंत्र को देना चाहिए, जो अब इधर-उधर की कार्रवाई कर मामले की लीपापोती में लगा है।

उत्तर प्रदेश सरकार ने नोएडा के मुख्य कार्यकारी अधिकारी को हटा दिया। मामले की जाँच के लिए विशेष जाँच दल भी बना दिया है। लेकिन बात फिर वही कि “का वर्षा जब कृषि सुखाने”। जिसे जिन्दा बचाया जा सकता था, उसे आँखों के सामने यूँ मरने देना आखिर कौन सी संवेदनशीलता का परिचय है? और फिर उसके यूँ मर जाने के बाद जाँच-जाँच या कार्रवाई-कार्रवाई खेलना भी किस किस्म के शासन-तंत्र का परिचायक है?

कोई है, जो इन सवालों के जवाब दे सके? 

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Neelesh Dwivedi

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