सूरज मलासी, मुम्बई महाराष्ट्र
प्रिय देशवासियो,
पिछले कुछ दिनों से दिल्ली के जंतर-मंतर की तस्वीरें मन को बेचैन कर रही हैं। भूखे-प्यासे बच्चों पर चलती लाठियाँ…
खून से लतपथ शरीर और वो बेचैन आँखें, जो बिना कहे बहुत कुछ कह गईं। यह कोई साधारण प्रदर्शन नहीं है। ये वे युवा हैं, जिन्होंने अपनी पूरी जवानी एक सपना पूरा करने में लगा दी। सुबह की नींद, त्योहारों की खुशियाँ, दोस्तों की महफ़िलें… सब छोड़कर वे उन परीक्षाओं की तैयारी करते हैं, जो इस देश की आन, बान और शान से जुड़ी हैं। इन्हीं में से कोई कल सीमा पर खड़ा होगा, कोई आसमान में लड़ाकू विमान उड़ाएगा, कोई समुद्र की गहराइयों में तिरंगा लेकर उतरेगा।
इतिहास गवाह है कि जब युवाओं को सड़कों पर उतरना पड़ता है, तो यह केवल एक आन्दोलन नहीं होता, बल्कि व्यवस्था के सामने खड़ा एक सवाल होता है। सन् 1968 में फ्रांस में छात्रों ने आवाज़ उठाई। देखते ही देखते लगभग एक करोड़ लोग उनके साथ खड़े हो गए। परिणाम यह हुआ कि सरकार को श्रमिक अधिकारों और शिक्षा व्यवस्था में बड़े सुधार करने पड़े। सन् 1989 में चीन के तियानआनमेन चौक पर लाखों छात्रों ने लोकतंत्र और पारदर्शिता की माँग की। वहाँ उनकी आवाज़ बलपूर्वक दबा दी गई, लेकिन दुनिया आज भी वह घटना भूल नहीं पाई। सन् 2019 में हांगकांग के युवाओं ने सड़कों पर उतरकर सरकार को एक विवादित कानून वापस लेने पर मजबूर कर दिया।
भारत भी इससे अछूता नहीं रहा। वर्ष 1990 के मण्डल आन्दोलन में सैकड़ों छात्रों ने आत्मदाह का प्रयास किया और दर्जनों युवाओं ने अपनी जान गँवाई। सन् 2018 में एसएसी परीक्षा की कथित गड़बड़ियों के खिलाफ हजारों अभ्यर्थी जंतर-मंतर पर बैठे। वर्ष 2024 में 24 लाख से अधिक नीट (राष्ट्रीय पात्रता-सह-प्रवेश परीक्षा) के अभ्यर्थियों के भविष्य पर सवाल खड़े हुए और मामला देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुँचा। इतिहास हमें एक बात सिखाता है, “जब छात्र सड़क पर आते हैं, तो वे राजनीति नहीं, अपना भविष्य लेकर आते हैं।”
सबसे दर्दनाक बात यह है कि प्रतियोगी परीक्षाओं का दबाव कई परिवारों को ऐसी त्रासदियों तक ले गया है, जहाँ कुछ अभ्यर्थियों ने अपनी जान तक गँवाई। कई ऐसे युवा भी रहे, जो अंतिम चयन से सिर्फ एक-दो नंबर से रह गए, उन माता-पिता की पीड़ा की कल्पना भर से रूह काँप जाती है।
मैं एक फौजी परिवार से हूँ। इसलिए जब वर्दी पहने पुलिसकर्मी इन्हीं बच्चों पर लाठी चलाते दिखाई देते हैं, तो मेरा ध्यान केवल प्रदर्शनकारी बच्चों पर नहीं जाता। मैं उन नकाबाें के पीछे पुलिसवालों के चेहरे भी पढ़ने की कोशिश करता हूँ। उनके घर में भी शायद एक बेटा या बेटी होगी जो किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रही होगी। नौकरी कभी-कभी इंसान से वह भी करवा देती है, जो उसका मन नहीं चाहता। हाँ, हर भीड़ में कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो हालात का फायदा उठाते हैं, लेकिन उनसे पूरे आन्दोलन का चरित्र तय नहीं किया जा सकता।
सोशल मीडिया ने हमें वह सब दिखा दिया, जो पहले शायद सिर्फ फिल्मों में देखा था। लाठियाँ खाते हुए भी मुस्कुराते युवा…, जिन हाथों से लाठियाँ खाईं, उन्हीं को खाना-पानी की पेशकश करते छात्र…, एक छोटी बच्ची के सामने उसके पिता को घसीटते दृश्य…, दिल दुखा गए..। छात्रों के साथ हमने 80 साल की नानी-दादी भी देखी…तो रिटायर्ड फौजी भी देखे..। हमने देखा कि कैसे राजधानी दिल्ली में मुम्बई के लोगों द्वारा ऑनलाइन ऑर्डर करके खाने के पैकेट पहुँचाए गए प्रदर्शनकारियों तक।
ये तस्वीरें किसी एक पक्ष की जीत या हार नहीं हैं। ये हमारे समाज के आईने में उभरती दरारें हैं। सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि कौन सही और कौन गलत है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या बातचीत इतनी मुश्किल थी? क्यों हमने चंद लोगों को ये मौका दिया कि वो इस पर राजनीति कर सकें? शायद अगर समय रहते संवाद हो गया होता, अगर दोनों पक्ष एक मेज़ पर बैठ गए होते, तो बात यहाँ तक नहीं पहुँचती।
रिश्ते भी तो ऐसे ही टूटते हैं। जब संवाद बंद हो जाता है, शब्दों का अर्थ बदल जाता है और धीरे-धीरे अर्थ का अनर्थ हो जाता है। हमारा संविधान हर नागरिक को अपनी बात शांतिपूर्वक रखने का अधिकार देता है। उसी तरह कानून-व्यवस्था बनाए रखना भी सरकार की जिम्मेदारी है। लेकिन जब दोनों आमने-सामने खड़े दिखाई दें? तब जीत किसी की नहीं होती, हार सिर्फ विश्वास की होती है।
मैं किसी के पक्ष और विपक्ष में नहीं हूँ। मैं भी पिता हूँ। मेरी भी दो संतान है। मैं भी इस आने वाले दर्द को महसूस कर रहा हू्ँ। मैंने सुना कि कैसे एक पिता ने कहा, “एक बेटा तो चला गया ..कोशिश है दूसरे के लिए ऐसी नौबत न आए!” एक पिता को कहते सुना, “मैं अपनी नौ साल की बेटी को यहाँ इसलिए लाया हूँ कि उसे पता चले कि सवाल पूछना कितना जरूरी है। ये देश तुम्हारा है। तुम्हें इसे सबके साथ सँभालना है।”
मैं सिर्फ इतना चाहता हूँ कि जिन बच्चों के कंधों पर कल इस देश की जिम्मेदारी होगी, उनकी पीठ पर आज उम्मीद का हाथ रखा जाना चाहिए, लाठी का बोझ नहीं। जिन हाथों में आज कानून की जिम्मेदारी है, उनके सामने भी ऐसी परिस्थिति न आए, जहाँ उन्हें अपने ही बच्चों जैसी उम्र के युवाओं पर बल प्रयोग करना पड़े।
क्योंकि अंत में… ये लड़ाई किसी सरकार और छात्रों की नहीं है। ये लड़ाई सपनों और समाधान के बीच संवाद की है। आइए, मतभेद बनाए रखें लेकिन मनभेद न हों। क्योंकि देश तब मज़बूत बनता है, जब उसकी वर्दी और उसके युवा, दोनों एक-दूसरे के सम्मान के साथ खड़े हों।
– सूरज मलासी
(एक पिता, एक नागरिक)
