सांकेतिक तस्वीर
टीम डायरी
सरकारें आज-कल हर जगह पर्यटन बढ़ाने में लगी हैं। प्राकृतिक स्थल हों, वन हों, उद्यान हों, तीर्थक्षेत्र हों या गाँव। हर कहीं पर्यटन की संभावनाएँ तलाशी जा रही हैं। गुंजाइश मिल भी रही है। इससे हजारों-लाखों लोगों की आजीविका का इंतजाम भी हो रहा है। उनके जीवनशैली में बदलाव आया है। अलबत्ता, इसी बीच तीर्थक्षेत्रों को पर्यटन स्थल के रूप में बदले जाने से तमाम लोगों को परेशानी भी है। कारण कि पर्यटकों की बढ़ती संख्या तीर्थक्षेत्रों में तमाम अव्यवस्थाओं का कारण बन रही है। यहाँ तक कि उत्तराखण्ड के तीर्थक्षेत्रों में तो बढ़ती प्राकृतिक आपदाओं का एक कारण यह भी बताते हैं कि वहाँ धार्मिक यात्राओं पर आने वाले पर्यटकों की संख्या लगातार बढ़ रही है। उनकी सुविधा के लिए निर्माण कार्य बढ़ रहे हैं। जबकि पहाड़ इसे झेलने में सक्षम नहीं है।
इस वर्ग के लोगों का तर्क यह भी है कि तीर्थक्षेत्रों को पर्यटनस्थलों के रूप में विकसित करने और प्रस्तुत किए जाने का नुकसान यह हो रहा है कि वहाँ अधार्मिक गतिविधियाँ बढ़ रही हैं। संस्कृति, परंपरा, आस्था को चोट पहुँचाने वाले काम हो रहे हैं। जैसे- शराब, अन्य नशीले पदार्थ, माँसाहार आदि की बिक्री बढ़ना। भीड़ के कारण गंदगी बढ़ना, जल-संकट जैसी स्थितियाँ पैदा होना, पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने, दबाव बढ़ाने वाली स्थिति बनना, आदि। यह सब कुछ हो रहा है। इसलिए तीर्थक्षेत्रों को पर्यटनस्थल के रूप में नहीं बदलना चाहिए। जबकि सरकार का तर्क वही है कि यह जो भी है, लोगों की सुविधा के लिए है। ऊपर से सरकार को राजस्व मिल रहा है और लोगों को रोजगार, वह अलग। इसलिए ऐसे प्रयासों से किसी को कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए।
ऐसी बहस लगतार चल ही रही है कि कर्नाटक के एक गाँव ने कम से कम तीर्थक्षेत्रों के लोगों को तो रास्ता दिखाने का काम कर दिया है। राज्य के कोडगु क्षेत्र का गाँव है पोराडु। यह गाँव बिरुनानी ग्राम पंचायत का हिस्सा है। इस गाँव को सरकार पर्यटन-ग्राम के रूप में विकसित करने की कोशिश में है। इस कोशिश के तहत गाँव में एक रिजॉर्ट बनाने के लिए किसी ‘बाहरी व्यक्ति’ ने जमीनी खरीदी है। गाँव के कुछ लोग अपने घरों में पर्यटकों के ठहरने की सुविधा विकसित करने के लिए राजी हैं। लेकिन बहुसंख्य लोग इस सरकारी प्रयास के विरोध में हैं। इसे देखते हुए ग्राम पंचायत ने विशेष बैठक आयोजित कर गाँव को पर्यटन-ग्राम बनाने के विरोध में संकल्प-पत्र पारित किया है। इसमें सरकार से अपील की गई है कि ऐसी कोशिशों पर तुरंत प्रतिबंध लगाया जाए।
गाँव के लोगों का स्पष्ट कहना है, “पर्यटन गतिविधियाँ बढ़ने से प्राकृतिक संसाधनों को नुकसान पहुँचेगा। गाँव में भीड़, गंदगी, अव्यवस्था बनेगी। इससे पर्यावरण को क्षति पहुँचेगी। गाँव के पारम्परिक कृषि कार्य आदि में बाधा पहुँचेगी। यही नहीं, गाँव की सीमा के भीतर कई धार्मिक स्थल हैं। बाहरी लोगों की आवाजाही बढ़ने से उन स्थलों की पवित्रता बनाकर रखना भी मुश्किल होगा, बल्कि वह भंग ही होगी। इसलिए थोड़े से आर्थिक लाभ के लिए वे इतने बड़े नुकसान नहीं उठा सकते।” इसके बाद सरकार ने गाँव से जुड़ा प्रस्ताव रोक दिया है।
वास्तव में यही इस गाँव के लोगों से तीर्थक्षेत्र के निवासियों को सीखना चाहिए कि सिर्फ विरोध करने से कुछ नहीं होगा। अगर उन्हें सच में लगता है कि तीर्थक्षेत्रों को पर्यटनस्थल के रूप में विकसित करने से तीर्थों की पवित्रता को नुकसान हो रहा है, तो आगे आएँ, मिलकर आवाज उठाएँ। और कुछ ऐसा करें कि सरकारें अपनी कार्यप्रणाली बदलने को विवश हो जाएँ। अन्यथा नक्कारखाने में तूती की आवाज कौन सुनता है?
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