भारतीय परम्परा से जुड़े विषयों में न्यायालय और सरकार अक्सर विरुद्ध क्यों दिखते हैं?

अनुज राज पाठक, दिल्ली

वर्ष 2018 में उच्चतम न्यायालय ने सबरीमाला मंदिर में मासिक धर्म के दौरान भी महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दी थी। यद्यपि इस फैसले का अत्यधिक विरोध होने के बाद विषय को नौ न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठ को प्रेषित किया गया, जिस पर सुनवाई लंबित है। ऐसे संदर्भ में अक्सर देखा गया है कि उच्चतम न्यायालय भारतीय परम्पराओं के विरोध में अतिउत्साह से निर्णय देने के लिए तत्पर रहता है। भारतीय परम्परा से जुड़े विषयों में न्यायालय और सरकार किसी न किसी प्रकार से विरुद्ध ही दिखाई देते हैं। आखिर क्यों?

यद्यपि जब कोई विषय आर्थिक या सरकार के हित का हो तो न्यायालय अपनी अलग व्याख्याएँ प्रस्तुत कर देता है। जैसे- अभी हाल ही में मासिक धर्म से जुड़े विषय में महिलाओं की सवैतनिक अवकाश देने के मामले पर उच्चतम न्यायालय ने कहा कि ऐसे तो फिर नियोक्ता (खास तौर पर निजी और सार्वजनिक कंपनियाँ) “महिलाओं को नौकरी देने से बचने लगेंगे”। न्यायालय का यह कथन कुछ हद तक सही भी है। नौकरी देने वाले लाभ कमाने के लिए ही व्यक्ति को नियुक्त करते हैं अमूमन। लेकिन जब व्यक्ति बिना काम के वेतन लेना चाहेगा तो वह उनके लिए हानि का कारण बनेगा। इसीलिए वे ऐसे लोगों से बचेंगे और बचते भी हैं। 

इस तरह न्यायालय ने एक व्यावहारिक निर्णय दिया,जो स्वागत योग्य है। लेकिन माहवारी से ही जुड़े विषय में जब सबरीमला का मामला आता है, तो अदालती न्याय की परिभाषाएँ अलग हो जाती हैं। उस समय न्याय व्यवस्था से जुड़े लोग यह भूल जाते हैं कि सबरीमाला मंदिर में पूजा की जो विधि है वह कठिन है। उस परम्परा को निभाने के लिए मन और शारीरिक तौर पर स्वस्थ होना जरूरी है। माहवारी के दौरान महिला शारीरिक तौर पर स्वस्थ नहीं होती। कष्ट में होती है। मानसिक रूप से भी परेशान होती है। ऐसे में वह ऐसी कठिन पूजा-पद्धति का पालन कैसे कर सकती है? क्या उसे उसमें कठिनाई नहीं होगी? 

क्या यह विरोधाभास नहीं है कि अगर महिला मासिक धर्म के दौरान काम पर नहीं जा सकती। जहाँ से उसे तीन दिन का सवैतनिक अवकाश चाहिए। तो फिर वह इसी अवस्था में मंदिर की कठिन पूजा-पद्धति को पूरा करने के लिए कैसे अपने आप को तैयार कर सकती है? इतना ही नहीं, न्यायालय ने अपने पिछले फैसले को सही ठहराने के लिए इस मामले को अस्पृश्यता से जोड़ दिया, जबकि वह भी गलत व्याख्या ही है। क्योंकि माहवारी के दौरान सबरीमला या ऐसे ही अन्य मंदिरों में न जाने का मामला अस्पृश्यता (अनटचैबिलिटी) यानि छुआछूत का न होकर, साफ-सफाई (अनहाइजीन)  का अधिक है। मामले को ऐसे परिप्रेक्ष्य में क्यों नहीं देखा जा रहा है? 

इसीलिए प्रश्न उठता है कि क्या केवल भारतीय परम्परा हो क्षीण करने के लिए ऐसा किया जा रहा है? क्या कोई वर्ग है, जो जानबूझकर यह सब कर रहा है और न्यायालय उस वर्ग के प्रभाव में आ रहा है? इन प्रश्नों पर हम सभी को विचार करना चाहिए और अपनी परम्पराओ के संरक्षण की दिशा में प्रयास करना चाहिए।

—— 

(नोट : अनुज राज पाठक दिल्ली में संस्कृत विषय के शिक्षक हैं। #अपनीडिजिटलडायरी की स्थापना से ही साथ जुड़े सदस्यों में शामिल हैं। अच्छे लेख और कविताएँ लिखते हैं। कभी-कभी श्रृंखलाबद्ध लेखन भी करते हैं।) 

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