सांकेतिक तस्वीर
टीम डायरी
आज छह दिसम्बर 2025 को तीन सूचनाएँ सामने आईं और इन सभी का एक समान निष्कर्ष यह है कि विशेष रूप से भारत के निजी क्षेत्र में काम का माहौल बेहद खराब है। इनमें पहली दो सूचनाएँ संसद से आईं हैं। संसद का शीतकालीन सत्र चल रहा है। इस दौरान शुक्रवार, पाँच दिसम्बर को राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार) की सांसद सुप्रिया सुले ने लोकसभा में एक निजी विधेयक पेश किया है। इसे उन्होंने ‘राइट टु डिसकनेक्ट’ यानि ‘विच्छेद का अधिकार’ विधेयक नाम दिया है। इस विधेयक में प्रावधान है कि कर्मचारियों को, खास तौर पर निजी क्षेत्र के, ‘विच्छेद का अधिकार’ मिलना चाहिए। इसका मतलब कि दफ्तर में काम के घण्टे पूरे होने के बाद उन्हें उनका निजी समय अपने हिसाब से बिताने की पूरी आजादी दी जानी चाहिए। इस दौरान उन्होंने दफ्तर से न तो कोई फोन किया जाए, न सन्देश भेजा जाए। किसी तरह का कोई काम भी उन्हें ऐसा न दिया जाए, जो उन्हें घर से करना पड़े।
इसी तरह राज्यसभा में आम आदमी पार्टी के सदस्य राघव चड्ढा ने सरकार से माँग की है कि 10 मिनट में लोगों के घरों पर सामान पहुँचाने वाली व्यावसायिक सेवाओं पर तुरंत रोक लगा देनी चाहिए। उन्होंने इस तरह के कामों को ‘क्रूर कार्य’ बताया। उनके मुताबिक, कम से कम समय में लोगों के घरों तक सामान और सेवाएँ पहुँचाने वाली व्यावसायिक व्यवस्था ने निश्चित रूप से आम आदमी को फायदा पहुँचाया है। लेकिन इस फायदे के बीच हम उन लोगों को अनदेखा नहीं कर सकते, जो इस सुविधा को हमारे लिए सुनिश्चित करते हैं। ये लोग भी इंसान हैं, कोई रोबोट-मशीन नहीं हैं, जो हर समय, हर मौसम में एक से दूसरी जगह उन्हें दौड़ाया जाता रहे। इन लोगों की हालत तो मजदूरों से भी बदतर है। ये दिनभर निर्धारित काम के घण्टों से हमेशा अधिक ही दौड़-भाग करते हैं। दरवाजे-दरवाजे जाकर सामान पहुँचाते हैं। थोडृी देर हो जाए तो ग्राहकों का गुस्सा झेलते हैं। इसके एवज में पैसा भी इन्हें बहुत कम मिलता है। ऐसे में कल्पना ही की जा सकती है कि ये कितने शारीरिक, आर्थिक, मानसिक दबाव में रहते होंगे।
तीसरी सूचना निजी क्षेत्र में काम करने वाले एक पेशेवर से, जाे ऊपर बताई गई दोनों सूचनाओं की एक तरह से पुष्टि करते हैं। सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र की एक बड़ी कम्पनी में कौस्तव बनर्जी ने अपनी कहानी इंस्टाग्राम पर साझा की है। वे फिलहाल जर्मनी में हैं। उनकी कम्पनी ने उन्हें वहाँ भेजा हुआ है। उनके मुताबिक जर्मनी ही नहीं पूरे यूरोप में कामकाजी माहौल अनुकरणीय है। यहाँ कर्मचारियों के अधिकारों का पूरा ख्याल रखता है। दफ्तर के बाद उन्हें पूरा समय मिलता है। समय पर दफ्तर पहुँचना और निश्चित समय पर वहाँ से छुट्टी। साप्ताहिक छुटि्टयाँ और अन्य अवकाश भी भरपूर मिलते हैं। छुट्टी के दौरान दफ्तर से न तो कोई फोन आता है, न ही सन्देश। दफ्तर का काम घर ले जाकर करने की भी कोई जरूरत नहीं होती। इसके ठीक उलट भारत में रोज 10-10, 12-12 घण्टे तक काम करने के बाद भी काम करने वालों को न तो नियमित रूप से साप्ताहिक अवकाश और न ही अलग से छुट्टी। वरिष्ठ अधिकारियों से छुट्टी माँगना कर्मचारियों के लिए सबसे चुनौतीपूर्ण काम होता है। यही नहीं, 200 प्रतिशत तक मेहनत करने के बाद भी वेतन बढ़ाने या पदोन्नति की अपेक्षा करना भी मानो कोई अपराध-सा हो जाता है!
तो क्या सच में, भारत के निजी क्षेत्र में काम का माहौल इतना खराब है। शायद हाँ और इसीलिए अभी जब केन्द्र सरकार नए श्रम कानून लागू कर रही है, तो उसे इन पहलुओं पर भी ध्यान देना चाहिए। इन स्थितियों को सुधारने के लिए कानूनी प्रावधान करने चाहिए और वे अमल में लाए जाएँ, ऐसी सख्त व्यवस्था करनी चाहिए।
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