कुछ बड़ा करने के लिए सबसे जरूरी है खुद पर भरोसा, ऋग्वेद के उदाहरण से समझें

निकेश जैन, इन्दौर मध्य प्रदेश

यह ज्ञान हम भारतीयों के पास बीते 10,000 से भी अधिक वर्षों से उपलब्ध है कि पृथ्वी गोल है और सूर्य का प्रकाश एक बार में सिर्फ उसके आधे हिस्से पर पड़ता है। इससे उस हिस्से में दिन होता है, और जहाँ प्रकाश नहीं पहुँचता, वहाँ रात होती है। हम लोगों को प्राचीन काल से यह भी पता है कि ग्रहों की गति के कारण सूर्य का प्रकाश गतिशील प्रतीत होता है। लेकिन देखिए, हमारी ज्ञान-प्रणाली के साथ कैसी छेड़छाड़ की गई!! 

हमें बीते लगभग 200 (1835 में मैकाले द्वारा बनाई गई शिक्षा नीति लागू होने के बाद से) वर्षों से यही पढ़ाया जाता रहा है कि 1,500 साल पहले पश्चिम में कोई विद्वान हुए। उन्होंने सबसे पहले यह खोज की कि पृथ्वी गोल है, आदि। कितनी विचित्र बात है न? हालाँकि, इस बात का एहसास और भरोसा भी हमें तब तक नहीं होगा, जब तक कि हम अपनी ज्ञान प्रणाली की ओर न मुड़ें। मेरे मामले में भी यही बात लागू होती है। मैं कुछ समय से ऋग्वेद का अध्ययन कर रहा हूँ और उसके बाद से ही मेरी सोच पर पड़ी पश्चिम की धूल की परत झड़ रही है। 

ऋग्वेद के अध्ययन में जैसे-जैसे मैं आगे बढ़ रहा हूँ, सच कहूँ तो मेरा दिमाग घूम जा रहा है। ऐसी-ऐसी जानकारियाँ हैं उसमें। मैं यह सोचकर हैरान हो जाता हूँ कि आखिर क्यों हमने अपनी इस ज्ञान प्रणाली के संरक्षण पर काम नहीं किया? इसकी उपेक्षा क्यों करते जा रहे हैं हम? इन सवालों का जवाब मुझे यही मिलता है कि 500-700 सालों की गुलामी के दौर ने हमारी इस ज्ञान-प्रणाली को गर्त में धकेल देने का काम किया है। 

यद्यपि, गुलामी के कालखण्ड से पहले हमारे पूर्वजों ने इसी सनातन ज्ञान प्रणाली का यत्र, तत्र, सर्वत्र उपयोग किया। हर क्षेत्र में इसी के आधार पर निर्माण, पुनर्निर्माण, रचना, संरचना के काम हुए। जैसे- उदाहरण के तौर प्राचीन मंदिरों की वास्तुकला को देखा-समझा जा सकता है, जो पूरी तरह से भारतीय ज्ञान-विज्ञान पर ही आधारित है। लेकिन दासता के कालखण्ड ने हमसे न सिर्फ हमारा ज्ञान-विज्ञान छीना, बल्कि स्वयं पर हमारा भरोसा भी छीन लिया। बावजूद इसके कि हमारे ऋग्वेद जैसे ग्रंथों में उन तमाम आविष्कारों के सूत्र माैजूद हैं, जिनकी सहायता से हम अपने उज्ज्वल भविष्य का निर्माण कर सकते हैं। पर करें कैसे? हमें तो खुद पर भरोसा ही नहीं!!

मगर मैं फिर भी कहूँगा, और अब तो मैं अपने अध्ययन के आधार पर और पुख्ता प्रमाण के साथ कह रहा हूँ कि हमें अपनी सनातन ज्ञान-विज्ञान प्रणाली की तरफ लौटना होगा। अतीत में हमारे भविष्य के सभी सूत्र मौजूद हैं, उन्हें अपनाना होगा। अपने आप भरोसा करना होगा, तभी हम कुछ बड़ा कर सकते हैं। याद रखिए, कुछ बड़ा करने के लिए जो सबसे पहली शर्त है, वह है खुद पर भरोसा। है न? 

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निकेश का मूल लेख

The knowledge was always there – some 𝟭𝟬,𝟬𝟬𝟬+ 𝘆𝗲𝗮𝗿𝘀 𝗮𝗴𝗼 they knew the 𝗲𝗮𝗿𝘁𝗵 𝗶𝘀 𝗿𝗼𝘂𝗻𝗱 and 𝘀𝘂𝗻 𝗹𝗶𝗴𝗵𝘁 𝗳𝗮𝗹𝗹𝘀 𝗼𝗻 𝗵𝗮𝗹𝗳 𝗽𝗮𝗿𝘁 𝗼𝗳 the 𝗲𝗮𝗿𝘁𝗵 to make it a 𝗱𝗮𝘆 and the other half remains in dark. They also knew due to 𝗽𝗹𝗮𝗻𝗲𝘁𝘀 𝗺𝗼𝘃𝗲𝗺𝗲𝗻𝘁 sunlight appears to be moving 🤔!

But we were taught that around year 1500 someone in the west found that earth was round and blah blah! 🤔

The kind of information Rigved provides is mind boggling and makes me wonder why we never worked upon that knowledge?

My answer is – our ancestors actually used that knowledge. All the temple designs which are scientifically so astute were based on that knowledge. But then 1000 years of at$acks and colonization faded it away. Worst, it took away country’s confidence.

You will be surprised to know that Rigved promoted science and experimentations to build better future for humanity! And research is something we *forgot* to do in last 70 years…

The day we start taking pride in our past, we will be equipped to build a better future. Why

Because self belief is a prerequisite to achieve anything great!

Thoughts? 

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(निकेश जैन, कॉरपोरेट प्रशिक्षण के क्षेत्र में काम करने वाली कंपनी- एड्यूरिगो टेक्नोलॉजी के सह-संस्थापक हैं। उनकी अनुमति से उनका यह लेख अपेक्षित संशोधनों और भाषायी बदलावों के साथ #अपनीडिजिटलडायरी पर लिया गया है। मूल रूप से अंग्रेजी में उन्होंने इसे लिंक्डइन पर लिखा है।)

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