भारत के इतिहास में 14 अगस्त की तारीख पर देश के विभाजन का दाग है।
नीलेश द्विवेदी, भोपाल, मध्य प्रदेश
ईसा की 19वीं और 20वीं सदी के दौरान स्पेन के एक दार्शनिक और साहित्यकार होते थे। नाम था- जॉर्ज ऑगस्टिन निकोलस रुइज डी सान्तायना। प्रचलित नाम- जॉर्ज सान्तायना। उन्होंने एक बार कहा था कि ऐसे लोग “जो इतिहास से नहीं सीखते, वे उसे दोहराने के लिए अभिशप्त होते हैं।” यह कहावत बार-बार हम सबके सामने कही-सुनी जाती है, ताकि हम अपने अतीत से सबक सीख सकें। पहले जैसी गलतियाँ करने से बचें और बीते वक्त की उन त्रासदियों का फिर सामना करने से बच सकें, जिन्होंने हमें गहरे जख्म दिए हैं।
हिन्दुस्तान के इतिहास में 14 अगस्त की तारीख के साथ भी ऐसी ही त्रासदी, ऐसा ही जख्म चस्पा है। देश के विभाजन का जख्म। गन्दी राजनीति का जख्म। सत्ता के लिए लाखों लोगों को उनके घर-बार से उजाड़ देने वाली घटिया सियासत का जख्म। शीर्ष पदों पर बैठकर भी लाखों की तादाद में अपने नागरिकों के कत्ल-ए-आम की तरफ आँखें मूँदकर बैठे रहने की निम्नतम हरकत का जख्म। ऐसी भयानक त्रासदी घटी है, इस तारीख और उसके इर्द-गिर्द। आज भी सबूत हैं उसके। नीचे दिया पहला वीडियो देखिए, महसूस कीजिए।
यह वीडियो उस दौर की तस्वीरें बयाँ करते एक वृत्तचित्र का हिस्सा है। इसके मुताबिक, देश के विभाजन के वक्त हुए साम्प्रदायिक दंगों में 10 लाख लोगों की जान गई थी। जबकि 65,000 से अधिक हिन्दू और सिख महिलाओं को अगवा कर लिया गया, उनका बलात्कार किया गया, और फिर मार दिया गया या धर्म-परिवर्तन के लिए मजबूर किया गया उन्हें। उस दंगा-दुराचार के दौरान मारे गए लोगों का आँकड़ा कहीं-कहीं तो 20 लाख तक भी बताते हैं। साथ में यह भी बताया जाता है कि धार्मिक आधार पर करीब दो करोड़ लोगों को अपने गाँव, घर, और अपनी जमीन से उजड़ना पड़ा। कई साल तक नई जगहों पर शरणार्थियों की तरह शिविरों में रहना पड़ा। इसीलिए आज भी भारत-विभाजन की वह त्रासदी दुनिया की भीषणतम त्रासदियों में शुमार है।
और वह भीषणतम त्रासदी घटी क्यों? क्योंकि उस वक्त देश के कुछ ‘बड़े’ कहलाने वाले नेताओं को अपनी सियासत साधनी थी। अपनी छवि चमकानी थी। अपना कद बड़ा करना था। इन बातों का भी प्रमाण मौजूद है। वह भी वीडियो और साक्षात्कार की शक्ल में ही। नीचे दिया दूसरा वीडियो देखिएगा। यह पाकिस्तान के एक चैनल का वीडियो है। ‘पाकिस्तान अनटोल्ड’ नाम का कोई कार्यक्रम है। उसमें जिनका साक्षात्कार लिया जा रहा है, उनका नाम है- इश्तियाक अहमद। यह पाकिस्तानी मूल के स्वीडिश नागरिक बताए जाते हैं। राजनीति शास्त्र के विशेषज्ञ भी कहे जाते हैं। अपनी पूरी विशेषज्ञता का इस्तेमाल करते हुए वह भारत-विभाजन के दौरान मोहम्मद अली जिन्ना, जवाहरलाल नेहरू और महात्मा गाँधी की भूमिकाओं का उल्लेख कर रहे हैं। सिर्फ उल्लेख नहीं, वह नेहरू और गाँधी को शुक्रिया कह रहे हैं कि उन्होंने अपनी भूमिका से उस वक्त पाकिस्तान को बचा लिया।
दरअस्ल, भारत और पाकिस्तान के बीच विभाजन के समझौते का आधार ही पूरा धार्मिक था। इसके तहत पाकिस्तान के हिस्से में आए भू-भाग से हिन्दुओं और सिखों को भारत आना था। वहीं, भारत के हिस्से में आए भू-भाग से मुसलमानों को पाकिस्तान भेजा जाना था। और जैसा कि इश्तियाक अहमद बताते हैं, “जिन्ना ने हिन्दुओं-सिखाें को तो पाकिस्तान से खदेड़ दिया, लेकिन वह भारतीय मुसलमानों को वहाँ नहीं लेना चाहते थे। ताकि नए-बने पाकिस्तान को अधिक आबादी का बोझ न उठाना पड़े और वह बनते ही नष्ट होने के जोखिम से बच सके। तब जवाहरलाल नेहरू और महात्मा गाँधी ने पाकिस्तान की मदद की और 3.5 करोड़ मुसलमानों के भारत में ही बने रहने का रास्ता पुख्ता किया।” अन्यथा, तब “भारत में रह रहे 3.5 करोड़ मुसलमानों में से 50 लाख के करीब पूर्वी पाकिस्तान (अब बाँग्लादेश) जाने वाले थे। जबकि बाकी तीन करोड़ मुसलमानों को पश्चिमी पाकिस्तान जाना था। ऐसा होने पर पूर्वी और पश्चिमी दोनों तरफ के पाकिस्तान का व्यवस्थागत ढाँचा आबादी के बोझ से ढह जाता।”
यकीनन, इतिहास का यह पन्ना, ये तथ्य, ये जानकारियाँ, कुछ लोग स्मृतियों से मिटाना चाहेंगे। इसलिए कि उन्हें अच्छा नहीं लगता होगा कि उनके बुजुर्गों को इतिहास में इस तरह याद किया जाए। फिर भी, एक जिम्मेदार भारतीय नागरिक के तौर पर हमारी यह जिम्मेदारी बनती है कि हम इतिहास के इन पन्नों को फटने न दें। तथ्यों और जानकारियों को बीते वक्त की अँधेरी खोह में कहीं गुम न हो जाने दें। बल्कि इन्हें बाहर आने दें। इन्हें खुद याद रखें और अगली पीढ़ियों को भी बताएँ। ताकि फिर हमें ऐसा त्रासद इतिहास नहीं दोहराना पड़े।
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