जब हमारा अस्तित्त्व नहीं था, संघर्ष तब भी था और जीत भी हमारी थी!

अखिलेश जैन, छतरपुर, मध्य प्रदेश से, 20/6/2021

किसी ने वॉट्सएप पर एक सन्देश भेजा। पढ़ते ही इतना प्रासंगिक और सत्यपरक लगा कि मैंने इसे तुरन्त #अपनीडिजिटलडायरी के साथ साझा करने का निर्णय ले लिया। क्योंकि ‘डायरी’ धीरे-धीरे सही, पर ऐसी स्वस्थ, रोचक-सोचक, प्रेरक और सरोकार से पूर्ण सामग्री के प्रसार का जरिया बन रही है। तो ‘डायरी’ के पाठक भला क्यों इससे वंचित रहें। सन्देश कुछ इस तरह है…

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विज्ञान कहता है कि एक स्वस्थ पुरुष यदि सम्भोग करता है तो उस समय जितने परिमाण में वीर्य निर्गत होता है, उसमें 20 से 30 करोड़ शुक्राणु रहते हैं। यानि इन्हें स्थान मिलता, तो लगभग इतनी ही संख्या में बच्चे जन्म ले लेते। लेकिन ऐसा होता नहीं है। 

वीर्य निकलते ही 20-30 करोड़ शुक्राणु पूरी तेज रफ़्तार से गर्भाशय की ओर दौड़ पड़ते हैं। अस्तित्त्व के आकार लेने से पहले ही ये हमारे संघर्ष की पहली प्रामाणिक और जानी-मानी शुरुआत होती है।

फिर भागते-भागते बीच रास्ते में लगभग सब ही, शुक्राणु थक जाते हैं, बीमार पड़ जाते हैं, मर जाते हैं। लगभग 300 से 500 शुक्राणु ही पहुँच पाते हैं, उस स्थान तक, जहाँ वे ठहर सकते हैं। लेकिन यहाँ उनका, उस वक्त का, एक अन्तिम संघर्ष बाकी होता है अभी।

उस निर्णायक संघर्ष में कोई एक, केवल एक, महाशक्तिशाली शुक्राणु ही डिम्बाणु को उर्वर करता है। यानि कि वहाँ अपना आसन ग्रहण करता है। फिर उसका अस्तित्त्व आकार लेना शुरू करता है। 

कभी सोचा है किसी ने, करोड़ों में वह इकलौता महाशक्तिशाली शुक्राणु कौन होता है? वह हम होते हैं। मैं, तुम, ये, वो, हम सब। हर वह शख़्स, जिसने इस धरा पर इंसान के रूप में जन्म लिया। 

विचार करें, उस महान संघर्ष के विषय में। जब हमारे पास कुछ नहीं था। आँख, नाक, कान जैसी कोई ज्ञान-इन्द्रिय नहीं। हाथ, पैर जैसी कोई कर्म-इन्द्रिय नहीं। मस्तिष्क, बुद्धि, विवेक भी नहीं। कोई पहचान नहीं। जाति, धर्म नहीं। नाते, रिश्ते नहीं।

तब हमारे पास ऐसा कुछ भी नहीं था, जिसके सहारे हम आज जीवन-संघर्षों का सामना करने की, उसमें जीतने की अपेक्षा करते हैं। उम्मीद बाँध लिया करते हैं।  

उस वक़्त हमारे साथ तो बस हमारी ऊर्जा, जिसके सहारे हम दौड़े और हमारा लक्ष्य, जहाँ तक हमें पहुँचना था। आख़िरकार हम पहुँचे और जीते।  

इसके बाद अब वर्तमान में हम अपने आप को देखें। हमारे पास पाँच ज्ञान-इन्द्रियाँ हैं। पाँच ही कर्म-इन्द्रियाँ भी। बुद्धि, विवेक है। शिक्षा, सामर्थ्य है। कुछ कम, ज़्यादा सही पर सहायता के लिए परिजन, सम्बन्धीजन, मित्र आदि भी हैं। ऊर्जा और लक्ष्य तो जन्म के पहले से हमारे साथ हैं ही। 

तो फिर क्यों थोड़ी सी तक़लीफ़ों से हम परेशान हो जाते हैं? ज़रा सी मुश्किल से आत्मविश्वास खो बैठते हैं? मामूली प्रतिकूलता से निराश हो जाते हैं? स्वयं को आश्वस्त करने वाला कोई उत्तर है, इन प्रश्नों का हमारे पास? नहीं ही होगा। क्योंकि हो नहीं सकता। 

इसीलिए, निराश होने, आत्मविश्वास खो देने, परेशान हो जाने से पहले हमें एक बार सोचना ज़रूर चाहिए। इस दृष्टिकोण से कि जब हमारा अस्तित्त्व नहीं था, तब भी संघर्ष तो था ही। और जीत हमारी थी। जीते न होते तो यक़ीनन हम भी नहीं होते, इस धरा पर। 

सो, अब आगे से हम ध्यान रखें कि हम कल भी जीते थे, आज भी जीत हमारी है, कल भी हमारी होगी। हमारे होने का यही सबसे बड़ा सच है।  

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(अखिलेश, मूल रूप से कारोबारी हैं। लेकिन लेखन और पठन-पाठन में विशेष रुचि रखते हैं।)

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