प्रतीकात्मक तस्वीर
समीर शिवाजीराव पाटिल, भोपाल मध्य प्रदेश
भारी उथल-पुथल भरे इस समय में भारत को अपने उत्कर्ष के लिए किस ओर जाना चाहिए और क्यों? ऐतिहासिक और व्यावहारिक दृष्टि से जानेंगे, इस भाग में। इसे दो अंशों में रखा गया है। पहला- विदेशी मानदंडों की गुलामी और दूसरा- भारत के लिए खुद के मूल्यों पर खड़े होने की चुनौती और अवसर। इस हिस्से में पहले अंश की बात यानि विदेशी मानदंडों की गुलामी के बारे में।
विश्व व्यवस्था की वर्तमान अस्थिरता की जड़ इस्लाम और ईसाइयत, इन दो औपनिवेशिक अब्राहिमी मजहबी विचारधाराओं के संघर्ष में निहित है। ब्रिटेन, अमेरिका के बाद इस प्रभुत्व के संघर्ष में चीन नवअतिथि है। भारत तटस्थ है, जिसका रूख भविष्य की इबारत लिखेगा। शुरूआत करते हैं ईसा पूर्व दूसरी सदी से लेकर सत्रहवीं सदी के कालखंड से, जब विश्व व्यापार काे चीनी उत्पाद नियंत्रित करता था। लगभग दो हजार साल तक विश्व अर्थव्यवस्था में चीन का अंश 50 प्रतिशत के आसपास रहा है। यह कोई छोटी मोटी बात नहीं है। इतने लम्बे समय तक लगातार बढ़त बनाए रखना किसी राष्ट्र के सामाजिक-राजनीतिक मूल्यों की असाधारण मजबूती दर्शाता है। इसी कालखंड में भारत की हिस्सेदारी चीन के लगभग नीचे ही रही है।
मध्यकाल से वर्तमान तक भारत औपनिवेशिक सत्ताओं के प्रभाव में रहा। भारत ने इस दौरान अपनी समृद्धि और मूल्यों की संस्थाओं और वैचारिक शक्तियों का ह्रास देखा। चीन इस्लामी औपनिवेशिकता से बचा रहा तो औद्योगिकरण और उपनिवेशों की अकूत सम्पदा-संसाधन हासिल करने के बाद यूरोप-अमेरिका के प्रभुत्ववाली नई विश्व व्यवस्था में चीन की भागीदारी और ताकत का क्षरण हुआ। चीन ने स्थिति को समझा और अपने पारम्परिक कंफ्यूशियन मूल्य, उत्पादकता के आधार पर राजनीतिक तंत्र खड़ा किया। कठोर परिश्रम, सृजनात्मकता और उत्पादकता के आधार पर चीन दुनिया में अपना खोया स्थान पाना चाहता है। इसलिए इसमें शक नहीं कि चीन दुनिया का महत्वपूर्ण और शक्तिशाली राष्ट्र बना रहेगा। हालाँकि आज जो बहुध्रुवीयता है, उसमें शक्तिशाली राष्ट्र की ताकत भी सीमित है।
चीन के विकास को समझने के लिए इसे उत्पादक अर्थव्यवस्था और रणनीतिक-सैन्य प्रभुत्व का अभिनव युग्म देखना होगा। इतिहास में चीन का विश्व बाजार पर आधिपत्य बेहतर उत्पाद दुनियाभर पहुँचाने वाले व्यापार मार्गों पर आधारित था। एक पुरानी, लम्बी और मजबूत अर्थव्यवस्था चीन अब महाशक्ति का तमगा हासिल करने को अग्रसर है। यह स्थान अब तक अमेरिका और उसके पहले ब्रिटेन को हासिल था। ध्यान देने की बात है कि अमेरिका और ब्रिटेन या उसके पहले के सम्राज्य भी उत्पादन आधारित तंत्र न होकर उत्पादक और बाजार के विनिमय पर नियंत्रण या औपनिवेशिक लूट आधारित रहे हैं। इस नियंत्रण का राज था उनकी ताकत या ऊर्जा।
इसके आधार पर ये देश उत्पादक उपनिवेशों के अधिशेष पर और उन्हें बाजार के रूप में इस्तेमाल कर उनकी पूँजी पर हाथ साफ करते थे। यानि इस महाशक्ति की अवधारणा में सबसे महत्वपूर्ण स्थान ऊर्जा का है। आरम्भिक काल में इस्लाम की समृद्धि में काफिले-जहाज और भूभाग की लूट जजिया जैसे टैक्स और व्यापार मार्गों पर चुंगी का खासा योगदान रहा। अरबी और मध्य एशिया के घोड़ों की ऊर्जा उन्हें इन गतिविधियों में मदद करती थी। परवर्ती काल के ईसाई उपनिवेशावादियों ने कोयला और तेल की ऊर्जा के बल पर दुनिया में अपना परचम फहराया, और जमीनी व्यापार और समुद्री मार्गों से उपनिवेशों का अधिशेष हस्तगत किया है।
आज ऊर्जा प्रतिमान नॉलेज अर्थात् ज्ञान है। नॉलेज और पावर के बीच की सेतु दुर्लभ खनिज तत्व हैं जो चिप- बैटरी, रिनुएबल एनर्जी तंत्र, कंप्यूटर्स, उपग्रह, ड्रोन और मिसाइल, रोबोट्स के माध्यम से हथियार, एआई, क्रिप्टो करंसी और तमाम अत्याधुनिक आविष्कारों की मूलभूत आवश्यकता है। चीन ने रणनीतिक रूप से इसके उत्पादन पर ध्यान दिया। जब 1970 के दशक से ही दुर्लभ खनिज तत्वों के प्रसंस्करण को आरम्भ किया, जब माओ ने कहा था कि अरब के पास जो तेल की ताकत है, वही ताकत यह दुर्लभ खनिजों से चीन को देगा। कोई आश्चर्य नहीं कि आज उसी बलबूते पर चीन दुनिया का पॉवर हाऊस बना हुआ है।
वहीं दूसरे स्तर पर दुनिया भर से संसाधन लाने और तैयार उत्पाद पहुँचाने के लिए चीन अपने ऐतहासिक रूप से सफल बहुमहाद्वीपीय सिल्क रोड इकानॉमिक बेल्ट और मैरीटाइम (समुद्री) सिल्क मार्ग को पुनर्जीवित कर रहा है। ऐसे में बतौर महाशक्ति चीन का वर्चस्व लगभग असंदिग्ध ही प्रतीत होता है। ऊर्जा और सृजनात्मक उत्पादकता के चीन के इस बेजोड़ नमूने को अमेरिका और यूरोपीय देश चाहकर भी सीधे नुकसान नहीं पहुँचा सकते क्योंकि ऐसा करने पर यह उस वैश्विक व्यवस्था को नुकसान पहुँचाएगा जिसका सबसे ज्यादा लाभ वे खुद उठा रहे हैं।
आन्तरिक रूप से अमेरिका और यूरोप की स्थिति को देखें तो औपनिवेशिक लूट के आधार पर जिस कल्याणकारी नीतियों का चस्का अपनी आबादी को लगाया है उसकी लत और भाेगवाद ही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी है। वे उत्पादकता के लिहाज से न केवल पिछड़ गए है, बल्कि किफायती उत्पादकता की क्षमता भी खो चुके हैं। और अब वे तकनीकी और उत्पादन की दृष्टि से चीन से पीछे है और उस पर आश्रित है।
तो इस पृष्ठभूमि में प्रश्न यह है कि भारत का विकास के लिए मार्ग कैसा हो? क्या गाड़ियों की बिक्री, एसी-फ्रीज, टीवी, मोबाइल, वाँशिंग मशीन की बिक्री या उपभोग विकास का पैमाना हो सकता है? यह तो बाजार बनने का लक्षण है? स्वस्थ उत्पादक अर्थव्यवस्था वाला विकास नहीं है। तो फिर भारत को बड़ा बाजार कहकर गौरवान्वित होने वाले बालबुद्धि लोगों को समझ में क्यों नहीं आता कि बड़ा बाजार की जगह बड़ा उत्पादक होना यथार्थ में कही अधिक गौरव की बात है?
असल में, भारत के सन्दर्भ में यह बहुत महत्वपूर्ण इसलिए है, क्योंकि हमने औपनिवेशिक देशों से लोक-कल्याण, नैतिकता की अवधारणाएँ जस की तस उठा ली है। उपनिवेशों के संसाधन, असमान मुद्रा और विश्व – व्यवस्था का फायदा ले रहे पश्चिमी और अरब देश ऐसी अय्याशी कर रहे थे। कल्याणकारी राज्य की कल्पना से प्रेरित लोक-लुभावने वादों के अधकचरे प्रयोगों से भारत की आधे से अधिक आबादी निकम्मी और परजीवी हो गई है। यह रेवड़ी बाँटने वाली संस्कृति चुनावी गणित के कारण दुर्दान्त हो गई है। आज कोई राजनेता आरक्षण, मनरेगा, मुफ्त या सस्ता राशन वितरण, लाड़ली बहनों को सहायता के खिलाफ एक शब्द बोलने की हिम्मत नहीं करता।
ऐसे में समाधान क्या हो? इस बारे में चर्चा करेंगे अगले भाग में।
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(नोट : समीर #अपनीडिजिटलडायरी की स्थापना से ही साथ जुड़े सुधी-सदस्यों में से एक हैं। भोपाल, मध्य प्रदेश में नौकरी करते हैं। उज्जैन के रहने वाले हैं। पढ़ने, लिखने में स्वाभाविक रुचि हैं। वैचारिक लेखों के साथ कभी-कभी उतनी ही विचारशील कविताएँ लिखते हैं। डायरी के पन्नों पर लगातार उपस्थिति दर्ज़ कराते हैं। सनातन धर्म, संस्कृति, परम्परा तथा वैश्विक मसलों पर अक्सर श्रृंखलाबद्ध लेख भी लिखते हैं।)
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