आखिर क्यों बंगाल में जनता-जनार्दन का निर्णय सामान्य नहीं है?

टीम डायरी

बंगाल में विधानसभा चुनाव-2026 में भारतीय जनता पार्टी को अभूतपूर्व जनादेश मिला है। उसमें कई अप्रत्याशित तथ्य ध्यान देने योग्य है। भाजपा को यह मिली जीत नियोजन या निपुणता से मिल सकने वाली संख्या से बहुत बड़ी है। भाजपा ने बंगाल के चुनाव प्रबंधन में दादा-कैडर के तिलिस्म को तोड़ा है, उससे उसे नागरिकों के वास्तविक आकांक्षाओं के वोट मिले। वही तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के पीछे मजबूती से खड़े रहने वाले मुस्लिम वोट बैंक में टूट इस लिहाज से शुभ संकेत रहा कि इसने लोकतंत्र को अल्पसंख्यक निषेधाधिकार से बचा लिया। परंपरागत मीडिया से परे सोशल मीडिया पर ग्रामीण बंगाल के गरीब– पिछड़े लोगों के जीत के बाद के उत्सव, उल्लास और अश्रुओं को देखें तो मीडिया के पूर्वाग्रह से प्रेरित मुहावरे और कृत्रिम वैचारिक से भरे समाचार कार्यक्रम बेमानी साबित हो जाते हैं।

चुनाव के बाद इसे ज्यादातर सांख्यिकी, राजनीति शास्त्र, मीडिया प्रबंधन की पृष्ठभूमि से समझने–समझाने की कोशिश की गई। न्यूयॉर्क टाइम्स, गार्जियन, अलजजीरा जैसे मीडिया हाउसों ने इसे हिंदुत्ववादी ताकत की बढ़ती पैठ समझते हुए इस जीत के कवरेज को लोकतंत्र के लिए शोक संदेश के रूप में प्रचारित किया। जबकि राष्ट्रावाद और भाजपा समर्थक मीडिया इसे ऐतिहासिक सुधार का अवसर बता रहा है। इसलिए यह जीत अपने में अपेक्षाओं का सागर, आकांक्षाओं का हिमालय और दमित अस्मिता की आँधी छिपाए हुए है। यह सब तो है ही, किंतु कुछ ऐसी ऐतिहासिक बातें हैं जिससे ऐसे संकेत मिलते हैं कि बंगाल का निर्णय भारत के भारतीयकरण की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण सोपान साबित होगा। 

इस दृष्टि के पीछे की तर्कणा यह है कि पारिवारिक-सामाजिक स्तर पर आज भी बंग प्रांत सांस्कृतिक और पारंपरिक दृष्टि से भारतीय चेतना में बहुत गहरे से निवेशित है। यह कहने का अभिप्राय है कि आज भी बंगाल में यदि कोई स्वयं को परंपरा या आधुनिकता से जुड़ा बताता है तो वह इन मूल्यों को समझबूझकर, तर्क से ग्रहण किए होता है। यह निज बोध कीमती है। हिंदीभाषी कमोबेश एक गहरी आत्महीनता वाली क्षत-विक्षत पहचान में पले बढ़े हैं। 

इसे समझने के लिए हमें छद्म संवैधानिक सम्मति के नाम पर ऐतिहासिक घटनाक्रम को दबाने के असफल प्रयोग को समझना होगा। इसी के तहत हिंसक-आक्रमक विचारधाराओं की जड़ तक न जाकर उससे खुला संवाद किए बगैर एक सतही भाईचारा बनाने का प्रयास किया जा रहा था। नतीजतन कट्टरपंथी और अधिक उग्र होते जा रहे थे और आम नागरिक हतप्रभ। शुरुआत करें, एक आप-हम में से कितने लोगों को बँटवारे से पूर्व पूर्वी बंगाल में धर्मातरण-नरसंहार के आँकड़ों का अंदाजा है? हजारों हिन्दुओं की हत्याएँ, बलात् धर्मांतरण, बालाओं के अपहरण की घटनाएँ धर्मनिरपेक्षता के नाम पर कुर्बान कर दी गई। सन् 1946 में सुहारवर्दी ने विधायिका में सिर्फ टिपरा (अब कोमिला) 9,895 और जज एडवर्ड स्किनर सिंपसन ने अपनी रिपोर्ट में नाेआखाली में कम से कम 22,550 बलात धर्मांतरण के मामले स्वीकार किए थे। ऐसी हृदय विदारक घटनाओं के जख्म भरे नहीं गए। इन गुनाहों को लेकर इस्लामी विचारधारा में कोई अपराधबोध तक नहीं। ऐसी तमाम बातें जो नेपथ्य में धकेली गई थी, जुड़कर सामने आई।

वैश्विक घटनाक्रम, देश में सनातन चेतना के जागरण, बांग्लादेश में हिन्दुओं पर अत्याचार की घटनाओं और बंगाल में आंतरिक असुरक्षा और सड़क-मुहल्ले पर कानून की दुरावस्था ने बंगाल को उन मुद्दो के प्रति सजग किया । ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण बंगाल में भाजपा को मिला अप्रत्याशित जनादेश इस तुष्टिकरण की आम-सहमति के खिलाफ वोट है, जिसे बँटवारे के बाद कांग्रेस, वामपंथी और तृणमूल ने पोषित कर दोहन किया। भाजपा की इस जीत में उसे पुराने वामपंथी रहे लोगाें के भी वोट मिले जो सड़क और सरकार में अल्पसंख्यक निषेधाधिकार, दादागिरी, भ्रष्टाचार के खिलाफ परिवर्तन के लिए अपना वोट इस्तेमाल करना चाहते थे।

पश्चिम बंगाल में पिछले 70 साल से अधिक पुरानी तुष्टिकरण पर आम-सहमति काे आज की पीढ़ी ढोने को तैयार नहीं दिखती। लेकिन इसका यह भी मतलब है कि बंगाल भाजपा के लिए कसौटी साबित होगा, अब उसे ढुलमुल वाली नीति से ऊपर उठकर एक स्पष्ट नीतिगत स्तर पर कार्य करना होगा।

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