मिताली राज के हाथ में ट्रॉफी और रोहित शर्मा की आँखों में ऑसू, इसके पीछे कहानी है!

नीलेश द्विवेदी, भोपाल मध्य प्रदेश

भारत की महिला क्रिकेट टीम ने विश्व कप जीत लिया। भारतीय क्रिकेट के इतिहास में दो नवम्बर, रविवार को यह एक सुनहरा पन्ना दर्ज हो गया। इसीलिए तब से लेकर अब तक तमाम कहानियाँ चल रही हैं। कुछ प्रेरक तो कुछ प्रोत्साहन वाली। कुछ अतीत के संघर्षों की, तो कुछ नए दौर के अहम बदलावों वाली। हर कहानी की एहमियत है। सफलता ही ऐसी है, ऐतिहासिक। लिहाजा, आगे भी दिनों, हफ्तों और शायद महीनों तक भी ये कहानियाँ चलती रहेंगी। किसी को अचरज भी नहीं होगा। सो, दो कहानियाँ हम भी सुनाते हैं। ये बताएँगी कि भारतीय महिला क्रिकेट टीम की पूर्व कप्तान मिताली राज के हाथों में विश्व कप विजेता ट्रॉफी के मायने क्या हैं? साथ ही यह भी कि दर्शक दीर्घा में बैठे भारतीय पुरुष क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान रोहित शर्मा की आँखों में आँसुओं का राज क्या है?  

तो पहले कहानी मिताली राज की। भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने अभी जब विश्व कप जीता, तो तमाम विश्लेषक इस घटना को 1983 जैसी बताने लगे। वह घटना जिसने भारतीय क्रिकेट का कायाकल्प कर दिया था। वह घटना, जिसमें भारतीय पुरुषों ने कपिल देव की अगुवाई में दो बार की विश्व विजेता वेस्टइण्डीज को हराकर विश्व कप खिताब अपने नाम किया था। उसके बाद भारतीय क्रिकेट में ऐसा उभार आया कि आज देश में क्रिकेट खेलने वाला बच्चा-बच्चा किसी न किसी नामी क्रिकेट खिलाड़ी की तरह बनना चाहता है। विश्लेषकों की मानें तो अब ऐसा ही बदलाव महिला क्रिकेट में आ सकता है, भारत के विश्व विजेता बनने के बाद। मगर क्या यह तुलना सही है? 

नहीं, यह तुलना सही नहीं है। क्योंकि अगर किसी को भारतीय महिला क्रिकेट में 1983 जैसी कोई घटना देखनी भी है तो उसे 2005 और 2017 की ओर से रुख करना होगा, न कि 2025 की इस जीत की तरफ। हाँ, साल 2005 ही वह मौका था, जब महिला क्रिकेट की एक खिलाड़ी उसी तरह ‘अपनी जमीन’ तलाश रही थी, जैसे 1983 में कप्तान कपिल देव खोज रहे थे। वह खिलाड़ी थी, मिताली राज, भारतीय महिला क्रिकेट टीम की तब की कप्तान। साल 2005 ही वह मौका था, जब भारत की महिलाओं से क्रिकेट जगत किसी उल्लेखनीय प्रदर्शन की उम्मीद नहीं रख रहा था। पर सिर्फ मिताली राज थीं, जिन्हें लगता था कि उनकी टीम विश्व विजेता बन सकती है। उनका भरोसा कुछ हद तक सही साबित हुआ और उनकी टीम पहली बार फाइनल में पहुँची। हालाँकि खिताब से चूक गई। 

महिला क्रिकेट खिलाड़ियों से कोई ज्यादा आस नहीं थी, इसीलिए तब उन पर पैसे खर्च करना भी गैरजरूरी समझा गया था। जैसा कि मिताली ने खुद एक साक्षात्कार में बताया है (नीचे वीडियो देख सकते हैं) कि महिला खिलाड़ियों को मैच फीस भी नहीं दी जाती थी। वह तो जब फाइनल में पहुँचकर भारतीय टीम उपविजेता तब इनाम के रूप में कुछ रकम मिली थी। कितनी? एक हजार रुपए प्रति मैच, सिर्फ एक हजार। आठ मैचों के आठ हजार रुपए। याद कीजिए, 1983 में उम्मीद, समर्थन और सहयोग की कमोबेश यही स्थितियाँ पुरुषों के साथ भी थीं। लेकिन कप्तान कपिल देव ने अपने ‘भरोसे’ के बलबूते हालात रातों-रात बदल डाले और विश्व कप खिताब जीत लाए। 

अलबत्ता, बतौर कप्तान मिताली राज का संघर्ष कुछ ज्यादा चला। उन्हें 2017 तक इंतजार करना पड़ा, जब उन्होंने एक बार फिर अपनी टीम को विश्व कप प्रतियोगिता के फाइनल तक पहुँचाया। इस मर्तबा इंग्लैण्ड में इंग्लिश लड़कियों से ही मुकाबला हुआ। बेहद नजदीकी काँटे की टक्कर में नौ रन के अंतर से इस बार भी खिताब भारतीय महिलाओं के हाथ से फिसल गया। लेकिन मिताली राज के जज्बे और उनकी टीम के हौसले ने देश में क्रिकेट के कर्णधारों को बता दिया कि अगर सहयोग, समर्थन थोड़ा और मिले तो वे हवा का रुख मोड़ सकती हैं।

अच्छी बात रही कि उनका सन्देश सही जगह तक पहुँचा। भारतीय क्रिकेट कन्ट्रोल बोर्ड ने कमान हाथ में ली। महिला क्रिकेट खिलाड़ियों को पुरुषों की तरह सुविधाएँ, प्रशिक्षण, फीस, आदि का बन्दोबस्त किया। इसका नतीजा मिला, विश्व कप खिताब के रूप में। यद्यपि भारतीय महिला टीम की मौजूदा कप्तान हरमनप्रीत यह अच्छी तरह जानती थीं कि इस खिताब की असली हकदार मिताली राज और उन्हीं की तरह संघर्ष करने वाली पूर्व भारतीय महिला क्रिकेट खिलाड़ी हैं। इसीलिए उन्होंने उन्हें मैदान पर बुलाकर ट्रॉफी सौंपी और जश्न में आगे रखा। 

अब कहानी रोहित शर्मा की। महिलाओं की टीम ने जैसे ही विश्व कप क्रिकेट का खिताब अपने नाम किया, भारतीय पुरुष क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान रोहित की आँखें नम हो गईं। कैमरों ने बार-बार उन्हें दिखाया और अगले दिन कैमरे की निगाह में कैद उनकी तस्वीरें सुर्खियाँ बनीं। इन सुर्खियों के साथ किसी ने लिखा कि रोहित भावुक व्यक्ति हैं। अपने देश की महिलाओं को जीतते देखकर खुशी से उनके आँसू छलक आए। इसी तरह, किसी ने लिखा कि उनके मन में एकदिवसीय मैचों का विश्व कप न जीत पाने की कसक अब भी बाकी है। वही आँसुओं के रूप में छलक कर बाहर आ गई। वास्तव में ये दोनों ही बातें सही हैं। इनमें भी दूसरी कहीं ज्यादा सही है। 

नीचे दी गई तस्वीर देखिए। यह नवंबर 2023 में हुए पुरुषों के एकदिवसीय विश्व कप के फाइनल मुकाबले के बाद की है। सेमीफाइनल तक सभी मैच जीतकर फाइनल में पहुंची भारतीय टीम आखिरी मुकाबला हार गई और ऑस्ट्रेलिया विश्व विजेता बन गया। रोहित शर्मा विश्व कप जीतने का अधूरा सपना लिए गीली आँखों के साथ मैदान से बाहर निकलते दिखाई दिए। इससे पहले टेस्ट मैचों के विश्व कप के फाइनल मुकाबले में भी उनकी टीम को ऑस्ट्रेलिया के हाथों हार झेलनी पड़ी थी। वह भी 2023 में ही। इस तरह उन्हें दोहरा धक्का लगा था। 

हालाँकि अगले साल यानि 2024 में उन्होंने टी-20 विश्व कप में अपनी टीम को खिताब जिताया। वह भी ऐसे मैच में जो लगभग हाथ से फिसल चुका था। फिर चैम्पियंस ट्रॉफी में भी बतौर कप्तान खिताबी जीत हासिल की। यह उपलब्धि इसी साल यानि 2025 में ही उन्हें मिली। इसके बावजूद उन्हें इस बात का एहसास हमेशा कि हाथ तक आए खिताब को एक नहीं बल्कि दो-दो बार छू न पाने का दर्द क्या होता है। और जब लगातार दो असफलताओं के बाद तीसरी बार सफलता मिलती है, तो उसकी खुशी क्या होती है। यही कारण रहा कि वह महिलाओं की विश्व विजयी उपलब्धि से अपने एहसासों को जल्दी जोड़ सके और उनके आँसू छलक आए।   

बीते लम्हों की कसक है, जो ऐसे अनुभव करा जाती है। एक मशहूर गीत के बोल हैं, जो ऐसे अनुभवों को और बेहतर तरीके से सामने रखता है। लिखा गया है, “बीते हुए लम्हों की कसक साथ तो होगी, ख्वाबों में ही हो जाए मुलाकात तो होगी।” मिताली राज और रोहित शर्मा की कहानियों में यही एक मिलता-जुलता सा फलसफा है। फर्क सिर्फ इतना है कि महिला क्रिकेट टीम के खिताब जीतते ही मिताली की कसक कुछ हद तक मिट चुकी है, लेकिन रोहित की अब तक बनी हुई है। उम्मीद करते हैं कि 2027 में जब पुरुषों का एकदिवसीय विश्व कप होगा तो बीते हुए लम्हों की उनकी भी कसक मिट जाएगी।

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